गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 118, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें८० गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० २ । क० ३
उस पवित्र गन्ध को पाता है जो इसका ओषधि वनस्पतियों में है, वही स्नातक पवित्र गन्ध
वाला होता है ॥ २ ॥
भावार्थः-ब्रह्मचारी राग द्वेष आदि दोषों को छोड़ कर वेदाध्ययन करके ब्रह्मवर्चसी
होता है ॥ २ ॥
कण्डिका ३ ॥
स वा एष उपयंश्चतुर्द्धोपैत्यग्निं पादेनाचार्यं पादेन ग्रामं पादेन मृत्युं
पादेन, स यदहरहः समिध आहृत्य सायं प्रातरग्निं परिचरेत्तेन तं पादमवरुन्धे,
योऽस्याग्नौ भवति । स यदहरहराचार्य्याय कर्म करोति, तेन तं पादमवरुन्धे, यो-
ऽस्याचार्ये भवति । स यदहरहर्ग्रामं प्रविश्य भिक्षामेव परीप्सति न मैथुनन्तेन तं
पादमवरुन्धे, योऽस्य ग्रामे भवति, स यत् क्रुद्धो वाचा न कञ्चन हिनस्ति पुरुषात्
पुरुषात् पापीयानिव मन्यमानस्तेनैव तं पादमवरुन्धे, योऽस्य मृत्यौ भवति ॥ ३ ॥
कण्डिका ३ ॥ ब्रह्मचारी के कर्तव्य, आचार्य की सेवा आदि कर्म ॥
( सः वै एषः उपयन् चतुर्धा उपैति, पादेन अग्निम्--१, पादेन आचार्यम्-
२, पादेन ग्रामम् -३, पादेन मृत्युम्-४, ) वही यह [ ब्रह्मचारी ] पास आता हुआ
चार प्रकार से सेवता है, चौथाई से अग्नि को- १, चौथाई से आचार्य को-२, चौथाई
से ग्राम को-३, और चौथाई से मृत्यु को-४ । ( सः यत् अहरहः समिधः आहृत्य
सायं प्रातः अग्निं परिचरेत्, तेन तं पादम् अवरुन्धे यः अस्य अग्नौ भवति-१ )
वह जो समिधायें लाकर सायं प्रातः अग्नि को सेवे, उससे वह उस पद को पाता है जो इस-
का अग्नि में होता है [ अर्थात् अग्निहोत्र करने से वह अग्नि समान तेजस्वी होता है ] १ ।
( सः यत् अहरहः आचार्याय कर्म करोति, तेन तं पादम् अवरुन्धे यः अस्य आचार्ये
भवति-२ ) वह जो दिन दिन आचार्य के लिये कर्म करता है, उससे वह उस पद को
पाता है जो इसका आचार्य में होता है [ अर्थात् आचार्य की सेवा से वह आचार्य के समान
प्रतिष्ठा पाता है ]-२ । ( सः यत् अहरहः ग्रामं प्रविश्य भिक्षाम् एव परीप्सति न
मैथुनम्, तेन तं पादम् अवरुन्धे यः अस्य ग्रामे भवति-३ ) वह जो दिन दिन ग्राम
में जाकर भिक्षा ही पाना चाहता है और न मैथुन [ स्त्री समागम ] उससे वह उस पद
को पाता है जो इसका ग्राम में होता है [ अर्थात् शुद्ध आचरण रखने से वह ग्राम में प्रतिष्ठा
पाता है ]-३ । ( सः यत् क्रुद्धः वाचा कञ्चन न हिनस्ति [ यतः ] पुरुषात् पुरुषात्
पापीयान् इव मन्यमानः, तेन एव तं पादम् अवरुन्धे यः अस्य मृत्यौ भवति-४ )
वह जो क्रुद्ध होकर वाणी से किसी को नहीं सताता है, [ क्योंकि अपने को ] पुरुष
पुरुष से अधिक पापी के समान वह मानता हुआ है, उससे वह उस पद को पाता है
३-( उपयन् ) समीपे गच्छन् ( चतुर्धा ) चतुष्प्रकारेण ( उपैति ) सेवते
( पादेन ) चतुर्थांशेन ( पादम् ) पदम् । स्थैर्यम् (परीप्सति) परि+आप्नोतेः-सन् ।
परितः प्राप्तुमिच्छति ( मैथुनम् ) मिथुन--अण् । स्त्रीपुरुषसंगमम् ॥