गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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हिय हरषि, वरषि प्रसून निरखति बिबुध-तिय तृन तूरि ।
आनंद-जल लोचन, मुदित मन, पुलक तनु भरि पूरि ॥
सब कहहिं, अबिचल राज नित, कल्यान-मंगल मूरि ।
चिर जिया जानकिनाथ जग तुलसी-सजीवनिमूरि ॥ ६ ॥
अरी आली ! रघुनाथजीके मनोहर हिंडोलेमें झूलनेके लिये
चलो । उसके चारों ओर स्फटिकमणिकी मनोहर भीतें हैं तथा
मणियोंके सुन्दर दरवाजे हैं । उसकी काँचकी गचें देखकर मन मयूर-
के समान नाचने लगता है, मानो वह कामदेवका फंदा ही हो ।
उस हिंडोलेमें जो बंदनवार, वितान, पताका, चमर, ध्वजा तथा पुष्प
और फलोंकी आकृतियाँ बनायी गयी हैं, उनकी परछाँहीं मानो कवि-
की साक्षी देकर अपने बिम्बोंसे [ जिसके अनुरूप उनकी प्रतिछाया
मणि और काँचकी गचमें प्रतिबिम्बित है ] कहती हैं कि हम तुमसे
बड़ी हैं ॥ १ ॥ उस हिंडोलेमें कामदेवके विजयस्तम्भके समान सीधे
और बड़े-बड़े खम्भे बनाये गये हैं । उसमें विचित्र भौरों (आंकड़ों)
में लटकी हुई चन्दनकी पाटी तथा लाल रंगका बेलन है । बेलनमें
जो सोनेकी डंडी लगी हुई है वह ऐसी जान पड़ती है, मानो काम-
देवके माथेपर कुंकुमके तिलककी रेखा हो तथा पटुली, मानो रतिके
वक्षःस्थलपर पदिक तथा सोनेकी कोमल माला हो ॥ २ ॥ सुखदायक
श्रावण मास आरम्भ हो गया है, घनघोर घटाएँ उमड़ी हुई हैं,
जलकी मन्द-मन्द फुहारें पड़ रही हैं, बगुलोंकी पंक्ति और इन्द्रधनुष
शोभायमान है, बिजली चमक रही है, सम्पूर्ण भू-भाग हरे-भरे होरहे हैं,
मेढक बड़े प्रसन्न हैं तथा नदी और तालाबोंमें जल भरा हुआ है, मानो
सम्पूर्ण पृथ्वीमें प्रेमकी बाढ़ आरही है । बाग-बगीचोंमें सब ओर कोयल