गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०७ | उत्तरकाण्ड
कंतुग्रीव, छबि सीव, चिबुक, द्विज, अधर, कपोल, बोल, भय-मोचन
नासिक सुभग, कृपापरिपूरन तरुन अरुन राजीव बिलोचन ॥ ६ ॥
कुटिल भुकुटिबर, भाल तिलक रुचि, सुचि सुंदरता श्रवन-बिभूषन
मनहुँ बारि मनसिज पुरारि दिय ससिहि चाप-सर-मकर अदूषन ७
कुंचित कच, कंचन-किरीट सिर, जटित ज्योतिमय बहुबिधि मनिगन
तुलसिदास रबिकुल रबि-छबि कबि कहि न सकत सुक-
संभु-सहसफन ॥ ८ ॥
अरे मन ! तू तनिक रघुनाथजीको रूप तो देख । यह
श्यामसुन्दर शरीर तो सम्पूर्ण लोकोंके नेत्रोंको सुख देनेवाला और
नखसे सिखतक शोभायमान है ॥ १ ॥ इनके चरणतलके [वज्र,
अंकुश, ध्वजा और कमल—ये] चारों मनोहर चिह्न अपने भक्तजनों-
को पहचानकर उन्हें आग्रहपूर्वक [अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष—ये]
चारों फल देते हैं । प्रभुके नख ऐसे शोभामान हैं, मानो कमल-
दलोंके ऊपर बालसूर्यकी प्रभासे अनुरञ्जित हिमकण हों ॥ २ ॥
इनकी जंघा और जानु कदलीकी याद दिलाती है, कमरमें किंकिणी
तथा सुहावना पीताम्बर है, इनके सुन्दर तूणीर, नाभि, रोमावली
और उदरदेशकी त्रिवलीकी तो कोई उपमा ही नहीं बनती ॥ ३ ॥
इनके वक्षःस्थलमें भृगुजीका चरणचिह्न, पदिक, मोतियोंकी माला
और केसरका अनुलेपन ऐसा शोभायमान है, मानो सूर्य और कमलने
आपसमें मिलकर अपने प्रेम तथा महान् सुयशको प्रकट किया है
॥ ४ ॥ वे अपनी विशाल भुजाओंमें मनोहर धनुष बाण धारण किये
हैं, इनके हाथों महामूल्यवान् कंकण और केयूर हैं तथा इनके
शरीरपर बिजलीकी छटाको छीननेवाला निर्मल दुकूल तथा पवित्र