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सर्वकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 412

ग ीतावली ४०६
सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाले भगवान् रामके मनोहर
चरणकमल मानो साक्षात् तीर्थराज होकर विराजमान हैं। श्रीशंकरके
हृदयकी भक्तिरूप भूमिपर प्रेममय अक्षयवट शोभायमान है॥ १ ॥
चरणोंका पृष्ठभाग श्यामवर्ण है, तलुए अरुण हैं तथा उसमें शुक्लवर्ण
नखावली शोभायमान है, मानो यमुना, सरस्वती और गङ्गाजी—ये
तीनों मिलकर सुन्दर त्रिवेणीके रूपमें बह चली हों ॥ २ ॥ तलुओंमें
जो अंकुश वज्र, कमल और ध्वजाके चिह्न हैं, वे ही सुन्दर भँवर
और तरंगावली हैं। उनमें देवता और साधुजन स्नान करते हैं तथा
वे मुनियोंके सुप्रसन्न चित्तोंके मनोहर निवास-स्थान हैं ॥ ३ ॥
तुलसीदासजी कहते हैं, प्रभुके इस चरणरूप प्रयागमें प्रेम करनेसे
वैराग्य, जप, यज्ञ, योग, व्रत, तप और शरीरत्यागके बिना ही सब
सुख तत्काल सुलभ हो जाते हैं ॥ ४ ॥
राग बिलावल
[ १६ ]
रघुबर-रूप बिलोकु, मन ।
सकल लोक-लोचन-सुखदायक, नखसिख सुभग स्यामसुंदर तन । १।
चारु चरन-तल-चिह्न चारि फल चारि देत परचारि जाति जन ।
राजत नख जनु कमल-दलनिपर अरुन-प्रभा-रंजित तुषार-कन । २।
जंघा-जानु भानु कदली उर, कटि किंकिनि, पटपीत सुहावन ।
रुचिर निषंग, नाभि, रोमावलि, त्रिबलि, बलित उपमा कछु आवत ३
भृगुपद-चिह्न, पदक उर सोभित, मुकुतमाल, कुंकुम-अनुलेपन ।
मनहुँ परसपर मिलि पंकज-रवि प्रगटयौ निज अनुराग, सुजस धन
बाहु बिसाल ललित सायक धनु, कर कंकन केयूर महाधन ।
बिमल दुकूल-दलन दामिनि-दुति, यज्ञोपवीत लसत अति पावन । ५।