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गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 356

गीतावली ३५०
[सीताजी कहती हैं—] त्रिजटे ! बता, वह सुवर्णदिवस
कब आवेगा, जब समुद्रको बँधा सुनकर तू जल्दीसे मेरे पास
आकर वह समाचार सुनावेगी; ॥ १ ॥ संसारको दमन करनेवाला
और देवता तथा साधुओंको पीड़ित करनेवाला रावण अपने कियेका
फल पावेगा, सुवर्णपुरी लंकामें विभीषण राजा हुआ है—यह देखनेके
लिये देवता लोग दौड़े आवेंगे? ॥ २ ॥ आकाशमें दिव्य दुन्दुभियोंका
घोष होगा, मुनिगण प्रशंसा करेंगे, निर्मल आकाश विमानोंसे आच्छा-
दित हो जायगा, जिनसे सूर्यकुलशिरोमणि भगवान् रामपर पुष्पोंकी
वर्षा होगी और उसी समय पवनपुत्र हनुमान्‌जी मुझे प्रभुके पास
ले जायँगे ॥ ३ ॥ जिस समय भगवान्‌राम भाई लक्ष्मणके सहित
वानरोंमें विराजमान होंगे और अपने शरीरकी शोभासे करोड़ों
कामदेवोंका लज्जावश संतप्त करेंगे, उससमय प्राणपतिको इननेत्रोंसे
देखकर मेरा हृदय आनन्दमें फूला न समायेगा ॥ ४ ॥ क्या कुशल
विधाता अपने समाज, स्वामी और लक्ष्मणके सहित अयोध्याको
फिरसे सकुशल दिखावेगा; उस समय गुरु, पुरजन, सास और
दोनों देवरोंसे मिलकर मेरे हृदयकी दुःखह ज्वाला शान्त हो जायगी
॥५॥ उस समय घर-घरमें मंगल कलश सजाये जायँगे और बधाइयाँ
बजेंगी; याचकोंमेंसे जिसे जो अच्छा लगेगा वही मिलेगा तथा
तुलसीदास राजाधिराज महाराज रामकी विजयका पवित्र यश
गान करेगा ॥ ६ ॥
[ ५१ ]
सिय ! धीरज धारिये, राघौ अब ऐहैं ।
पवन पूतपै पाइ तिहारी सुधि, सहज कृपालु, बिलंब न लै हैं ॥१॥

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