गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ३२०
राम छाम, लरिका लषन, बालि-बालकहि
घालि को गनत ? रीछ जल ज्यों न घनमैं ।
काजको न कपिराज, कायर कपिसमाज,
मेरे अनुमान हनुमान हरिगनमैं ॥ २ ॥
समय सयानी मृदु बानी रानी कहै पिय !
पावक न होइ जातुधान बेनु-बनमैं ।
तुलसी जानकी दिए, स्वामीसों सनेह किये
कुसल, नतरु सब ह्वै हैं छार छनमैं ॥ ३ ॥
रावणके दूत भगवान्की सेनाको देख आये थे । दूतोंसे उनका
समाचार सुन वह मनमें सोच रखकर ऊपरसे गाल बजाने लगा
कि 'अहो ! कालके वशीभूत होकर ये रीछ और वानर युद्धमें मुझ-
जैसे वीरसे लड़कर विजय प्राप्त करना चाहते हैं ! ॥ १ ॥ राम तो
[सीताके वियोगमें] बहुत दुर्बल हैं; लक्ष्मण अभी लड़का ही है;
बालिका पुत्र अपने ही कुलका घातक है, उसे तो गिनता ही कौन
है ? और जाम्बवान् जलहीन मेघकी भाँति निस्सार है । सुग्रीव
किसी भी अर्थका नहीं है और सारा ही वानरसमाज कायर है ।
हाँ, मेरे अनुमानसे इन वानरोंमें एक हनूमान् अवश्य ही शूरवीर है'
॥ २ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, इसी समय परम चतुर महारानी
मंदोदरीने मधुरस्वरसे कहा—'प्रियतम ! आप राक्षसकुलरूप बाँसोंके
वनमें अग्नि न बनें, इस समय जानकीको देने और प्रभुसे प्रेम
करनेमें ही कुशल है; नहीं तो एक क्षणमें ही सब नष्ट हो
जायगा' ॥ ३ ॥