गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१६ सुन्दरकाण्ड
नेत्रोंके भारसे व्याकुल हो गया ॥ ६ ॥ बहुतसे सरोवर धूलसे
भर गये और अत्यन्त भयसे [पर्वतोंके उखड़ जानेसे उनके स्थानमें
जल भर जानेके कारण] अनेकों पहाड़ी प्रदेश समुद्रवत् हो गये ।
आकाशमें देवताओंके ढोल और हनूमान्जीकी गर्जनाका कोलाहल
सुनकर कोई अपने कथनको भी नहीं समझ सकता था ॥ ७ ॥
दिग्गज, कूर्म, वराह और शेषनाग जैसे-तैसे धीरज धरकर पृथिवीको
धारण करते थे । उनके शरीरोंमें बोझको सहते-सहते हड्डियाँ कड़क
उठी हैं, इसलिये वे बारम्बार झुंझलाकर उसे तानते थे ॥ ८ ॥ इस
प्रकार जब वानरोंकी सेनाने कूच किया तो चारों ओर कोलाहल छा
गया । उसभीड़का कुछ वर्णनकरते नहीं बनता । वानरगण किलकिलाते
थे और वे एक दूसरेसे ठसे हुए थे । इस प्रकार उस समय समुद्रतट-
पर बड़ा कोलाहल हो रहा था ॥ ९ ॥ इसी समय राक्षसको कालके
अधीन देख विभीषणजी भगवान्से आकर मिले; तब शरणागतवत्सल
प्रभुने उनका वहीं अभिषेक करके अपना लिया ॥ १० ॥ फिर
कौतुकसे ही समुद्रपर पुल बाँधकर वे सुबेल पर्वतके पास जाकर
ठहर गये । तुलसीदास कहते हैं, वहाँ पहुँचकर वानरगण लंकाका
किला देखकर प्रभुके आगमनकी सूचना देकर लौट आये ॥ ११ ॥
रावणकी मन्त्रणा
राग आसावरी
[ २३ ]
आये देखि दूत, सुनि सोच सठ-मनमैं ।
बाहर बजावै गाल, भालु-कपि कालबस
मोसे बीरसों चहत जीत्यो रारि रनमैं ॥ १ ॥