गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली २७२
देखत खग-निकर, मृग रवनिन्हजुत, थकित बिसारि
जहाँ तहाँकी भँवनि ।
हरि-दरसन-फल पायो है ग्यान बिमल, जांचत भगति, मुनि
चाहत जवनि ॥४॥
जिन्हके मन मगन भए हैं रस सगुन, तिन्हके लेखे अगुन मुकुति
कवनि।
श्रवन-सुखकरनि, भवसरिता-तरनि, गावत तुलसिदास कीरति
पवनि ॥५॥
हे राघव ! मुझे आपका वनकी वीथियों दौड़ना बड़ा प्रिय
जान पड़ता है, जिससे वहाँकी पृथिवी आपके अरुणकमलवर्ण शोक-
हारी चरणोंके अंकुश, वज्र एवं ध्वजा आदि चिह्नोंसे अङ्कित हो
रही है ॥ १ ॥ अति सुन्दर श्याम शरीरपर रँगीला पीताम्बर धारण
करना, कमरमें तरकस और फेंटा बाँधना, सुवर्णमृगके साथ हाथमें
धनुष-बाण लिये दौड़ना, नेत्रकमलोंसे इधर-उधर निहारना ॥ २ ॥
तथा सिरपर पुष्प और लताओंके सहित जटाजूटके मुकुटकी
रचना—ये सब बड़े ही शोभायमान जान पड़ते हैं । इसी
प्रकार आपके मनोहर मुखारविन्दपर पसीनेके बूँदें शोभाय-
मान हैं और उसी तरह मनोहर भ्रुकुटियोंका झुकाव भी
है ॥ ३ ॥ उस समय पक्षिसमूह तथा मृगियोंके सहित मृग
प्रभुकी सुन्दरता देखकर थकित हो जाते हैं और जहाँ-के-तहाँ भ्रमण
करना छोड़ देते हैं। इन्हें प्रभुके दर्शनोंका फलस्वरूप निर्मल ज्ञान
तो मिल गया है, अब जिसे मुनिजन भी चाहते हैं, उस अहैतुकी
भक्तिकी याचना और करते हैं ॥ ४ ॥ भला जिनके चित्त सगुण-
स्वरूपके रसमें डूबे हुए हैं, उनके लिये गुणहीन मुक्ति क्या चीज