गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७१ अरण्यकाण्ड
भुज बिसाल, कमनीय कंध-उर, श्रम-सीकर सोहैं साँवरे अंग।
मनु मुकुता मनि मरकतगिरिपर लसत ललित रबि-किरनि प्रसंग ॥२॥
नलिन नयन, सिर जटा-मुकुट, बिच सुमन-माल मनु सिव-सिर गंग।
तुलसिदास ऐसी मूरतिकी बलि, छबि बिलोकि लाजैं अमित अनंग ॥३॥
प्रभुके हाथमें धनुष-बाण हैं और कमरमें मनोहर तरकस है।
प्रियाकी प्रीतिसे प्रेरित होकर वे वन्यमार्गोंमें कपटमय कनकभृगके
साथ-साथ डोल रहे हैं ॥ १ ॥ उनकी भुजाएँ विशाल हैं, कन्धे और
वक्षःस्थल सुन्दर हैं तथा साँवले शरीरपर पसीनेकी बूंदें शोभायमान
हैं। मानो मरकतमणिके पर्वतपर मनोहर सूर्यकिरणोंका संग पाकर
मोती सुशोभित हो रहे हैं ॥ २ ॥ प्रभुके कमलके समान नेत्र हैं,
सिरपर जटाओंका मुकुट है और उसके बीचमें पुष्पोंकी माला गूंथी
हुई है, जैसे शिवजीके मस्तकपर गङ्गाजी विराजमान हों। तुलसी-
दास ऐसी मूर्तिपर बलिहारी है, जिसकी छविको देखकर अनन्त
कामदेव भी लज्जित हो जाते हैं ॥ ३ ॥
राग केदारा
[ ५ ]
राघव, भावति मोहि बिपिनकी बीथिन्ह धावनि।
अरुन-कंज-बरन चरन सोकहरन, अंकुस-कुलिस-केतु-अंकित अवनि ॥१॥
सुंदर स्यामल अंग, बसन पीत सुरंग, कटि निषंग परिकर मेरवनि।
कनक-कुरंग संग, साजे कर सर-चाप, राजिवनयन इत उत
चितवनि ॥२॥
सोहत सिर मुकुट जटा-पटल-निकर, सुमन-लता सहित
रची बनवनि।
तैसेई श्रम-सीकर रुचिर राजत मुख, तैसिए ललित भृकुटिन्हकी
नवनि ॥३॥