गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली १६८
सुखमा सुरभि सिगार-छीर दुहि मयन अमियमय कियो है दही, री।
मथि माखन सिय-राम सँवारे, सकल भुवन छबि मनहु मरी, री ॥ ३ ॥
तुलसिदास जोरी देखत सुख सोभा अतुल, न जाति कही, री।
रूप-रासि बिरची बिरंचि मनो, सिला लवनि रति-काम लही री ॥ ४ ॥
राम दूलह हैं और सीता दुलहिन हैं। दोनोंका मेघ और
बिजलीके समान सुन्दर वर्ण है तथा नखसे लेकर शिखापर्यन्त मनको
चुरानेवाली सुन्दरता छायी हुई है ॥ १ ॥ इन्हें विवाहके वस्त्रा-
भूषणोंसे अलंकृत देख सारा सखीसमाज ठगा-सा रह गया है।
वास्तवमें जीनेका और जन्मका लाभ तथा नेत्रोंका फल तो इतना
ही है, जो आज पूरा-पूरा प्राप्त कर लिया ॥ २ ॥ कामदेवरूप
ग्वालेने मानो शोभारूप सुरभीसे शृङ्गाररूप दुहकर जो अमृतमय
दही तैयार किया था उसे मथकर ही मक्खनरूप राम और सीता
रचे हैं तथा सारे लोकोंकी शोभा उससे रहा-सहा मट्ठा है ॥ ३ ॥
तुलसीदास कहते हैं, उस जोड़ीको देखनेसे बड़ा सुख होता है; उसकी
अतुलित शोभा कही नहीं जाती। उन्हें विधाताने मानो रूपकी
राशि ही बनाया है तथा रति और कामको तो उनका केवल सीला¹
और लवनी² ही मिला है ॥ ४ ॥
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जैसे ललित लषन लाल लोने।
तैसिये ललित उरमिला, परसं पर लखत सुलोचन कोने ॥ १ ॥
१. जो दाने खेत काटनेके अनन्तर पृथ्वीमें पड़े रह जाते हैं।
२. अन्नका वह थोड़ा-सा भाग जो खेत काटनेवालोंको मजदूरीमें
दिया जाता है।