गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६७ बालकाण्ड
शरीरकी है ॥ १ ॥ विवाहके समय वे मण्डपके नीचे शोभायमान
हैं। इस समय मेरी बुद्धिको कहींपर उनकी उपमा नहीं मिलती,
मानो कामदेवके मण्डपमें छबि और शृङ्गाररसकी शोभा ही एकत्र
हो गयी हो ॥ २ ॥ दोनों ही परम मङ्गलमय और मनोहर अङ्गोंवाले
हैं तथा चूनरी और पीताम्बरके ग्रन्थि बन्धनके सहित सुवर्णमय
कलशकी भाँवरी दे रहे हैं। उस रूपमाधुरीको देखकर शारदाकी
बुद्धि भी चकरा गयी ॥ ३ ॥ इधर वसिष्ठजी और उधर मुनिवर
शतानन्द—ये दोनों ओरसे शाखोच्चार कर रहे हैं। इधर अयोध्या-
पति दशरथजी और उधर मिथिलाधिपति जनक आनन्दसिन्धु
हिलोरकर अपनी गोदमें भर रहे हैं ॥ ४ ॥ इस समय जनकजी परम
प्रसन्न हैं, रनिवास स्नेहविवश हो रहा है तथा चतुर नारियाँ (नजर
न लग जाय, इसलिये) तिनका तोड़कर निहार रही हैं उस समय
गान, निसान और वेदोंकी ध्वनि सुनकर देवतालोग फूलोंकी वर्षा
करते हैं। उस हर्षका भला कौन बखान कर सकता है ! ॥ ५ ॥
इस प्रकार नेत्रोंका फल पाकर सब नर-नारी प्रेमवश श्रीमहादेवजी
का निहोरा देकर आशीर्वाद देते हैं। तुलसीदास कहते हैं, जिस
सुखमें मन भी आनन्दमें डूब जाता है उसका जिह्वा भला कैसे वर्णन
कर सकती है ! ॥ ६ ॥
[ १०६ ]
दूलह राम, सीय दुलही री !
घन-दामिनि बर बरन, हरन-मन सुंदरता नखसिखनि बही, री ॥ १ ॥
ब्याह-बिभूषन-बसन-बिभूषित, सखिअवली लखि ठगि सी रही, री।
जीवन-जनम-लाहु, लोचन फल है इतनोइ, लह्यो आजु सबँही, री ॥ २ ॥