गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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श्रितकमलाकुचमण्डल ! धृत कुण्डल !
कलित-ललित-वनमाल !
जय जय देव हरे ॥१॥ ध्रुवम् ॥
अन्वय-[इदानीं परव्योमनाथत्वेन धीरललितत्वमाह-हे
श्रितकमलाकुचमण्डल (श्रितं धृतं कमलाया लक्ष्म्याः कुचमण्डलं
स्तनयुगलं येन तत्सम्बुद्धौ) अनेन विदग्धत्वपरिहासविशारदत्व-
प्रेयसीवशतत्वनिश्चिन्तत्वानि सुचितानि] हे धृतकुण्डल (धृते
कुण्डले तत्सम्बुद्धौ) हे कलितललितवनमाल (कलिता धृता
ललिता सुन्दरी वनमाला येन तत्सम्बुद्धौ); [एतेन विशेषणद्वयेन
नवतारुण्यत्वं सूचितम्, तेनैव वेशविन्याससिद्धेः] हे देव, हरे,
जय जय (उत्कर्षमाविष्कुरु) [“विदग्धो नव-तारुण्यः परिहास-
विशारदः। निश्चिन्तो धीरललितः स्यात् प्रायः प्रेयसीवशः ॥”] ॥१॥
अनुवाद-हे श्रीराधाजीके स्तन मण्डलका आश्रय लेनेवाले !
कानोंमें कुण्डल तथा अतिशय मनोहर वनमाला धारण
करनेवाले हे हरे ! आपकी जय हो ॥
अथवा हे देव ! हे हरे ! हे कमला कुचमण्डल बिहारी !
हे कुण्डल भूषण धारि ! हे ललित मालाधर ! आपकी जय
हो ॥१॥
पद्यानुवाद-
धृत कमला कुच मण्डल श्रुतिकुण्डल हे।
कलित ललित वनमाल जय जय देव हरे॥
बालबोधिनी-कवि श्रीजयदेवजी श्रीकृष्णको सबके उपास्य
रूपमें वर्णितकर अब दूसरे गीति-प्रबन्धमें एकमात्र चिन्तनीय
स्वरूप ध्येयरूपमें वर्णन हेतु धीरोदात्त, धीरोद्धत, धीरशान्त
और धीरललित आदि नायकत्व गुणोंसे समन्वित समस्त
नायक-चूड़ामणि श्रीकृष्णकी सर्वश्रेष्ठताको प्रकटित करते
हुए प्रार्थना करते हैं।
श्रित कमला कुचमण्डल हे-इस पदका विग्रह है-श्रित
कमलायाः कुचमण्डलं येनाऽसौ तत्सम्बुद्धौ श्रितकमलाकुचमण्डल