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घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 5

१२ / घट रामायण
मर्जी के ख़िलाफ़ पिता ने उनका विवाह कर दिया पर वह जवान होने पर भी ब्रह्मचर्य के पक्के और
अपनी स्त्री से अलग रहे। इनकी स्त्री जिसका नाम लक्ष्मीबाई था, पूरी पतिव्रता थी और पति की सेवा
दिलजान से बराबर करती थी।
आखीर को एक दिन जब कि उनके पति किसी भारी सेवा पर प्रसन्न हुए और उनसे वर मांगने को
कहा तो उन्होंने अपनी सास की सीख के अनुसार यह वर मांगा कि मुझे एक पुत्र हो। साहब जी ने
कहा, बहुत अच्छा और दस महीने पीछे बेटा हुआ।
साहिब जी के पिताजी भी बड़े भक्त थे और उनकी इच्छा हुई कि उनको राजगद्दी देकर आप
एकान्त में रहकर मालिक की बंदगी करें, परन्तु उनको हजार समझाया, वह किसी तरह राजी न हुए
और अपने पिता से वैराग्य और मुक्ति की ऐसी चर्चा की, उनको जबाब न आया, फिर भी, वह उनके
राजगद्दी पर बैठने की तैयारी करते रहे। जब गद्दी पर बैठने को एक दिन बाकी रहा तो साहिब जी अपने
पिता से मिलने बाग को थोड़े से सवारों के साथ जो उनकी निगरानी के लिए तैनात थे, गये और वहाँ
से आगे हवा खाने के बहाने एक तेज तुर्की घोड़े पर सवार होकर निकल गये। जब शहर-पनाह के पास
पहुँचे तो मौज से ऐसी आँधी उठाई कि घोर अंधकार छा गया जिसकी ओट में वह घोड़ा भगाकर अपने
साथियों से अलग हो गए। राजा ने खबर सुनकर उनकी खोज के लिए चारों ओर देश विदेश आदमी व
सवार दौड़ाये पर अब कहीं पता न लगा तो अति उदास व निराश होकर राज्य को त्याग दिया और
अपने छोटे कुँवर बाजीराव पेशवा को गद्दी पर बैठाया।
तुलसी साहब कितने ही बरस तक जंगलों, पहाड़ों और दूर-दूर शहरों में घूमे और हजारों आदमियों
को उपदेश देकर सत्य मार्ग में और कई बरस पीछे जिला अलीगढ़ के हाथरस शहर में आकर पक्के
तौर पर ठहरे और वहाँ अपना सत्संग जारी किया।
घर के निकलने से बयालीस बरस पीछे वह अपने छोटे भाई राजा बाजीराव पेशवा से बिठूर
(जिला-कानपुर) में मिले थे, जहाँ कि बाजीराव गद्दी से उतारे जाने पर संवत् 1876 में भेज दिये गये
थे। इसका हाल सुरति विलास ग्रन्थ में इस तरह लिखा है कि साहब जी गंगा के तट पर रम रहे थे कि
एक शूद्र और ब्राह्मण में झगड़ा होते देखा। ब्राह्मण गंगाजी के तट पर संध्या करता था और शूद्र नहा
रहा था। शूद्र की देंह से जल का छीटा ब्राह्मण पर पड़ा जिससे वह क्रोध में भर आया और उठकर शूद्र
को गाली देने और मारने लगा। साहब जी के पूछने पर उसने सब हाल कहा और बोला कि इस शूद्र के
जल की छीटें अपने बदन से उड़ाकर मुझे अपवित्र कर दिया और अब मेरे पास कोई दूसरी धोती भी
नहीं है कि फिर नहा कर पहनूँ और पूजा खत्म करूं। साहब जी ने समझाया कि तुम्हारे ही शास्त्र के
अनुसार गंगा और शूद्र दोनों एक ही पद से याने विष्णु के चरण से निकले हैं फिर क्यों एक को पवित्र
और दूसरे को अपवित्र मानते हो। यह सुनकर ब्राह्मण लज्जित हुआ।
घाट पर जो लोग जमा थे, उनमें राजा बाजीराव के एक पंडित ने साहब जी को पहचान लिया
क्योंकि उनका अति सुन्दर और मोहिनी रूप का जिस किसी ने भी इक बार दर्शन किया, उसकी आँखों
में समा जाता था। उसने तुरन्त राजा को खबर भेजी कि आपके भाई आये हैं। राजा नंगे पाँव दौड़े और
साहब जी के चरणों पर विलाप करते हुए गिरे और बड़े आदरभाव से सुख पाल पर बैठाकर घर लाए
और चाहा कि उनको वहीं रखें किन्तु वह एक दिन वहाँ से भी चुपचाप चलते हुए।
सुखविलास में तुलसी साहब के देशाटन समय के कितने चमत्कार लिखे हैं, जैसे, रोगियों को
आरोग्य कर देना, मुर्दों को जिला देना, अंधों को आँख, निर्धन को धन और बाझ को सन्तान देना
इत्यादि।
एक साहूकार ने आपका बड़ा सत्कार किया और भोग लगाते समय, यह वरदान मांगा कि मुझे
दया से एक पुत्र बख्शा जाए। तुलसी साहब ने अपना सोंटा उठाया और यह कहकर चलते हुए कि
लड़का अपने सगुंन इष्ट से माँग-संतों की दया तो यह है कि उनके दास के औलाद मौजूद भी हों तो
उठा लें और अपने दास को निर्बन्ध कर दें।