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सर्वकोश
गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

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पृष्ठ 119

( ११८ ) गणेशगीता अ० ११,
नानावस्तुक्रयो भूमेः कर्षणं रक्षणं गवाम् ॥
त्रिधाकर्माधिकारित्वंवैश्यकर्म समीरितम् ३२॥
अनेक प्रकारकी वस्तुओंका क्रय, विक्रय, पृथ्विकर्षण
अर्थात् खेती आदि करना, गायोंकी रक्षा करना, इन तीन प्रका-
रके कर्मोंमें वैश्यका अधिकार है, यही वैश्यके कर्म हैं ॥३२॥
दानं द्विजानां शुश्रूषा सर्वदा शिवसेवनम् ॥
एतादृशं नरव्याघ्र कर्म शौद्रमुदीरितम् ॥ ३३ ॥
दान, ब्राह्मणोंकी सेवा, सदाशिवजीकी सेवा, हे राजन् ।
यह शूद्रोंका स्वकर्म वर्णन किया ॥ ३३ ॥
स्वस्वकर्मरता एते मय्यर्प्याखिलकारिणः ॥
मत्प्रसादात्स्थिरं स्थानं यान्ति ते परमं नृप३४
यह सब वर्ण अपने अपने कर्म यथावत् करते हुए और
सम्पूर्ण कर्म मुझे अर्पण करते हुए मेरी कृपासे निश्चल
परम स्थानको गमन करते हैं ॥ ३४ ॥
इति ते कथितो राजन्प्रसादाद्योग उत्तमः ॥
सांगोपांगःसविस्तारोऽनादिसिद्धो मया प्रिय३५