गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत । ( ११७ )
अन्तर्बाह्येन्द्रियाणां च वश्यत्वमार्जवं क्षमा ॥
नानातपांसि शौचं च द्विविधं ज्ञानमात्मनः २८
बाह्य और अन्तर इन्द्रियोंका वश करना, सरलता, क्षमा,
अनेक प्रकारके तप,पवित्रता,दोनों प्रकार आत्माका ज्ञान २८॥
वेदशास्त्रपुराणानां स्मृतीनां ज्ञानमेव च ॥
अनुष्ठानं तदर्थानां कर्म ब्राह्ममुदाहृतम् ॥ २९ ॥
वेद शास्त्र पुराण और स्मृतियोंका ज्ञान होना और उनके
अर्थोंका अनुष्ठान करना, यह ब्राह्मणके कर्म हैं ॥ २९ ॥
दार्ढ्यं शौर्यं च दाक्ष्यं च युद्धे पृष्ठाप्रदर्शनम् ॥
शरण्यपालनं दानं धृतिस्तेजः स्वभावजम् ३०
दृढता, शूरता, चतुरता, युद्धसे पलायन न करना, शरणा-
गतकी रक्षा, दान, धैर्य, स्वाभाविक तेज ॥ ३० ॥
प्रभुता मन औन्नत्यं सुनीतिर्लोकपालनम् ॥
पञ्चकर्माधिकारित्वं क्षात्रं कर्म समीरितम् ३१॥
प्रभुता,मनकी उदारता,अच्छीनीति, लोकपालन इन पांच-
कर्मोंमें अधिकार यह क्षत्रियोंका स्वाभाविक कर्म है ॥ ३१ ॥