गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अकामता और श्रद्धासे जो तप किया जाता है,वह सात्त्विक
है,ऐश्वर्य सत्कार पूजाके निमित्त और दम्भ सहित जो किया
जाता है वह राजसी तप है ॥ ५॥
तदस्थिरं जन्ममृती प्रयच्छति न संशयः ॥
परात्मपीडकं यच्च तपस्तामसमुच्यते ॥ ६ ॥
रजोगुणी तप जन्म मृत्यु और अस्थिरताका देनेहारा है
और जिसमें दूसरेको पीडा हो वह तमोगुणी तप है ॥ ६॥
विधिवाक्यप्रमाणार्थं सत्पात्रे देशकालतः ॥
श्रद्धया दीयमानं यद्दानं तत्सात्त्विकं मतम् ॥७॥
विधियुक्त प्रमाणपूर्वक देशकालमें श्रद्धापूर्वक जो दान दिया
जाता है वह सात्त्विक दान है ॥ ७ ॥
उपकारं फलं वापि काङ्क्षद्भिर्दीयते नरैः ॥
क्लेशतो दीयमानं वा भक्त्या राजसमुच्यते ॥८॥
और जो उपकार वा फलकी कामनासे मनुष्य दान करते
हैं ऐसा दान जो क्लेश अथवा भक्ति किसी प्रकारसे दिया
वह राजसी दान कहाता है ॥ ८ ॥
अकालदेशतोऽपात्रेऽवज्ञया दीयते तु यत् ॥
असत्काराच्च यद्दत्तं तद्दानं तामसं स्मृतम् ॥९॥