गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ११० ) गणेशगीता अ० ११.
श्रीगणेशजी बोले हे राजन्! कायवचनमन इनभेदोंसे तपभी
तीन प्रकारकाहै ऋजुता, आर्जव, पवित्रता, ब्रह्मचर्य, अहिंसा १
गुरुविज्ञद्विजातीनां पूजनं चासुरद्विषाम् ॥
स्वधर्मपालनं नित्यं कायिकं तप ईदृशम् ॥२॥
गुरु, पण्डित, ब्राह्मण देवतोंका पूजन करना, नित्य स्वधर्म
पालन करना, यह कायिक तप कहा है ॥ २ ॥
मर्मास्पृक्च प्रियं वाक्यमनुद्वेगं हितं ऋतम् ॥
अधितिर्वेदशास्त्राणां वाचिकं तप ईदृशम् ॥३॥
हृदयग्राहक प्रिय वचन बोलना, उद्वेग रहित हितकारी और
सत्य भाषण करना, वेदशास्त्रोंका पढना यह वचनका तप
कहा है ॥ ३ ॥
अन्तःप्रसादःशान्तत्वं मौनमिन्द्रियनिग्रहः ॥
निर्मलाशयता नित्यं मानसं तप ईदृशम् ॥४॥
अन्तःकरण प्रसन्न, शान्ति, मौन, जितेन्द्रियता, सदा
निर्मल भाव रखना, यह मानसिक तप है ॥ ४ ॥
अकामतः श्रद्धया च यत्तपः सात्त्विकं च तत् ॥
ऋद्धयै सत्कारपूजार्थं सदम्भं राजसं तपः ॥५॥