गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ११२ ) गणेशगीता अ० ११.
जो देश काल रहित अपात्रमें दिया जाता है, अथवा जो
दान अवज्ञासे दिया जाता है, वह तमोगुणी दान है ॥९॥
ज्ञानं च त्रिविधं राजञ् शृणुष्व स्थिरचेतसा ॥
त्रिधा कर्म च कर्त्तारं ब्रवीमि ते प्रसंगतः ॥१०॥
हे राजन् ! मन लगाकर सुनो,ज्ञानभी तीनही प्रकारका है,
कर्म और कर्त्ताभी तीनही प्रकारकेहैं,सो मैं प्रसंगसे कहताहूं १०
नानाविधेषु भूतेषु मामेकं वीक्षते तु यः ॥
नाशवत्सु च नित्यं मां तज्ज्ञानं सात्त्विकंनृप ११
जो अनेक प्रकारके प्राणियोंमें एक मुझहीको देखता,भूतों-
को नाशवान् और मुझे नित्य जानता है, हे राजन् ! वह
सात्त्विक ज्ञान है ॥ ११ ॥
तेषु वेत्ति पृथग्भूतं विविधं भावमाश्रितः ॥
मामव्ययं च तज्ज्ञानं राजसं परिकीर्तितम् १२॥
और उन भूतोंसे मुझे पृथक् देखकर जो अनेक भावका
आश्रय करते हैं और अव्यय जानते हैं, इस ज्ञानका नाम
राजसी है ॥ १२ ॥
हेतुहीनमसत्यं च देहात्मविषयं च यत्॥
असदल्पार्थविषयं तामसं ज्ञानमुच्यते ॥ १३ ॥