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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 360, कुल 869 में से

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पृष्ठ 360

३४४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
वाला मैं तथा मेरी सर्वव्यापकता तुम्हें प्राप्त होगी। मन में तिलमात्र भी अभिमान रखकर मेरी शरण में आओगे तो
मेरी प्राप्ति नहीं होगी क्योंकि अभिमान ही मेरी प्राप्ति में आने वाली बाधा है। कुत्ता जब पकवान को स्पर्श करता
है तो ब्राह्मण जिस प्रकार उसे स्पर्श नहीं करता, उसी प्रकार मन में अभिमान रहने पर मैं भी साधक को स्पर्श
नहीं करता। रजस्वला स्त्री की आवाज सुनकर जिस प्रकार पुरश्चरण करने वाला दूर भाग जाता है, उसी प्रकार
अहंकार पास रहने पर मैं पास होते हुए भी दूर चला जाता हूँ। धोबी का स्पर्श किया जल जिस प्रकार सज्जन
ग्रहण नहीं करते उसी प्रकार हे उद्धव ! हृदय में अभिमान होने पर मैं उससे नहीं मिलता। आँख कंकड़ को नहीं
सहती, घाव पर शूल अधिक चुभता है, मोती में जोड़ नहीं लगता या खीर में इमली नहीं जँचती, उसी प्रकार हे
उद्धव ! मुझमें अभिमान प्रवेश नहीं करता यह ध्यान में रखो। त्याग का यह लक्षण मैंने तुम्हें पूरी तरह बताया।
अपनी पत्नी को परपुरुष के साथ सहवास करते देख जिस प्रकार पति उसे त्याग देता है, उसी प्रकार अभिमान में
लिपटे हुए भक्तों को यह श्रीकृष्ण स्वीकार नहीं करता। इसलिये यदि अभिमान छोड़ कर तुम मुझ हृदयस्थ की
शरण में आओगे तो देवकी की सौगन्ध मैं तुम्हारा उद्धार करूँगा। इस पर तुम कहोगे "तुम्हारी तो दो माताएँ हैं तो
किस माता की शपथ को सच माना जाय ?'' तो मुझे सचमुच तुम्हारी ही शपथ है। तुम्हें मेरे ही कारण निर्भयता
प्राप्त होगी। "लेकिन तुम शब्दों में तो फँसते नहीं और तुम्हारे लिये क्रिया कुछ भी नहीं है। तो तुम्हारी शपथ को
सच कैसे माना जाय ?'' यदि तुम्हारे मन में ऐसी कल्पना आ रही हो और तुम सोचो कि तुम्हारे शब्दों पर
विश्वास करके कोई अपना स्वधर्म छोड़ दे और कहीं तुम्हारी शपथ झूठ सिद्ध हुई तो तुम्हारे जैसे समर्थ से कौन
झगड़ा करेगा ? तो हे उद्धव ! ऐसा मत कहो। मैंने तुम्हें जो शपथ दी है वह परमात्मा की शपथ है। उसे पूरी तरह
सच समझो। उद्धव ! तुम मेरी परिपूर्ण आत्मा हो। मुझ में और तुम में द्वैतभाव नहीं है। तो तुम्हारे सामने मैंने जो
शपथ ली उसका साक्षी परमात्म तत्त्व ही है। लेकिन मैंने बताये सिद्धान्त का प्रमाण जब साक्षात् वस्तुस्थिति ही है
तो इसमें शपथ की क्या आवश्यकता है ? सर्वभाव से तुम मेरी शरण में आये हो तो तुम अभी के अभी तर
जाओगे। प्रेम से मेरी शरण आने पर कलिकाल भी तुम्हारे चरण छुएगा। फिर संसार का भय कैसा ? तुम्हारी ओर
वक्रदृष्टि से देखने का किसमें साहस है ? मेरी शरण में आते ही तुम्हें तत्काल मेरा सामर्थ्य प्राप्त होगा। तब
संसार का सारा भय समाप्त हो जाएगा और कलिकाल तुम से काँपने लगेगा। घास में आग की चिनगारी गिरते
ही वह सुलग उठती है और वह अग्नि अनेक जंगलों के वृक्ष जला देता है, उसी प्रकार यदि तुम शुद्ध अंतःकरण
से मेरी शरण में आओगे तो संसार का जंगल तुम जला डालोगे। "हृदयस्थ की शरण में जाना चाहिये यह ठीक
है लेकिन वह हृदयस्थ हमारी समझ में नहीं आता।'" ऐसा यदि तुम कहोगे तो उद्धव ! उसका भी स्वरूप तुम्हें
बताता हूँ, सुनो। नाम, रूप आदि का अभिमान छोड़ कर उद्धव का रूप शेष रहता है वही मुझ हृदयस्थ का
स्वरूप है। इस प्रकार हृदयस्थ प्राप्त हो जाने के बाद सभी प्राणिमात्र में ईश्वर ही दिखायी देने लगता है। वहाँ
उद्धव के रहने के लिये कोई अलग स्थान दिखायी ही नहीं देता। उस समय सभी प्राणियों में मैं ही दिखायी देता
हूँ। आँखों से अनेक लोग देखने पर भी उन सब में अकेला मैं ही दिखायी देता हूँ। इस प्रकार हृदयस्थ से एकता
प्राप्त कर लेने पर तुम मद्रूप हो कर मुझे प्राप्त करोगे। उद्धव ! इस प्रकार मेरी प्राप्ति निर्भय तथा अटल है। यह
गुप्त बात बताकर जब भगवान उद्धव की पीठ थपथपाने लगे तो उसने भी भगवान के चरण पकड़ लिये। कृष्ण
उसे उठाने लगे लेकिन वह उठ नहीं रहा था। उसने कहा, "तुमने अपनी जो गुप्त बात बतायी वह मैंने सहज ही
मान्य कर ली। अब केवल एक ही बात का सन्देह है, उसे मैं तुमसे अवश्य पूछूँगा।'"