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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 359, कुल 869 में से

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पृष्ठ 359

बारहवाँ अध्याय ३४३
अविद्या ही है। उस अविद्या के कारण ही देहबुद्धि उत्पन्न होकर वह मनुष्य को विधि निषेध में भटका देती है।
इसलिये हे उद्धव ! तुम पहले अविद्या को त्याग दो और अविद्या का सम्बन्ध छोड़ देने से सहज ही वेद विधि का
त्याग हो जाता है। "लेकिन पहले 'अविद्या' क्या है यही हमारी समझ में नहीं आता। फिर उसका निराकरण
कैसे करें?" इसका उत्तर यही है कि हमारी कल्पना का जो बोध है, वही स्वतःसिद्ध अविद्या है। उसी कारण से
विधिनिषेध की बाधा होती है। उसका त्याग करने से वह शुद्ध ब्रह्म हो जाता है। समरांगण में सेनापति का पतन
होने पर सेना अपने आप ही भाग जाती है। उसी प्रकार अविद्या का त्याग करने से विधि और विधान से सहज
ही छुटकारा प्राप्त हो जाता है। यदि मूल धुरा ही तोड़ दी जाय तो घोड़े जुते होने पर भी रथ नहीं चल पाता। एक
ही घाव से जड़ काटने पर शाखाएँ और पल्लव अपने आप टूट जाते हैं। उसी प्रकार अविद्या को शीघ्रता से नष्ट
करने पर विधि-निषेध सहज ही अपनी जगह नष्ट हो जाते हैं। वेदों का सारांश यही है कि मुझ भगवान को
भजना चाहिये। शास्त्रों में वेदान्त श्रवण का वही अर्थ बताया गया है। उस वेदांत श्रवण का फल यही है कि
अविद्या को निर्मूल किया जाय। उस अविद्या को निरस्त कर देने से फिर श्रवण नहीं करना पड़ता। गंतव्य स्थान
तक पहुँचने पर जिस प्रकार आगे नहीं जाना पड़ता, उसी प्रकार अविद्या नष्ट होने के बाद श्रवण और मनन की
आवश्यकता नहीं रह जाती। अब तुम कहोगे कि यह अविद्या किस प्रकार नष्ट हो ? यह बहुत कठिन है। लेकिन
यह संकट भी कैसे दूर किया जाय यह मैं तुम्हें बताऊँगा। वेद, शास्त्र अथवा कर्म विधान का साधन अविद्यात्मक
ही है। उस अविद्या को दूर करने के लिये मेरी ही शरण में जाना चाहिये।
मामेकमेव शरणमात्मानं सर्वदेहिनाम्।
याहि सर्वात्मभावेन मया स्या ह्यकुतोभयः ॥ १५॥
स्त्री पुत्रादि विषयों का ध्यान छोड़ तथा योग, योग्यता, बुद्धि, कर्मठता तथा कर्म का अभिमान त्याग कर
मेरी शरण में आना चाहिये। वेदाध्ययन छोड़कर, शास्त्रश्रवण छोड़ कर, प्रवृत्ति और निवृत्ति को त्याग कर मेरी
शरण में आना चाहिये। धन और सम्मान के लिये परिश्रम करना छोड़, ज्ञान और प्रतिष्ठा को छोड़ अनेक प्रकार
की निष्ठाओं को छोड़ मुझ श्रेष्ठ ईश्वर की शरण में आना चाहिये। वैदिक और लौकिक आचार छोड़ कर,
पुराणोक्त तथा तांत्रिक आचार छोड़कर मेरी शरण में आने से मेरा आत्मसुख प्राप्त करोगे। कुल की श्रेष्ठता
छोड़कर, जाति का अभिमान छोड़कर, आश्रम की उच्चता का विचार छोड़ कर मेरी शरण में आओ। ज्ञान और
ध्यान छोड़ कर, विधि और विधान छोड़ कर, देह का अभिमान छोड़ कर मेरी शरण में आओ। मेरा नाम
अंतर्यामी है क्योंकि मैं मुख्यरूप से हृदय के भावों को जानता हूँ। शब्दों के योग से मैं कभी अलग नहीं होता।
लेकिन ममत्त्व छोड़ कर परब्रह्म के प्रति श्रद्धा अवश्य रखनी चाहिये। उद्धव ! त्याग को ही त्याग करने का लक्षण
तुम्हें बताता हूँ। सभी प्रकार के अभिमान को छोड़ना यही त्याग का प्रमुख लक्षण है। सारा अभिमान छोड़कर
मेरी शरण में आने पर फिर जन्म-मरण कैसा ? मेरे प्रताप से ही तुम तर पाओगे यह ध्यान में रखो। "तुम्हारी
शरण में आने के लिये क्या पहाड़ों और गुफाओं में जाकर बैठना चाहिये, या किसी झोपड़ी में रहना चाहिये या
दसों दिशाओं में भटकना चाहिये ? तुम्हारा रहने का कोई निश्चित गाँव नहीं है। तुम्हारे रहने का निश्चित स्थान
कौन सा है ? तुम्हारी शरण में आने के लिये कोई कहाँ जाये ?" इस प्रकार की कल्पना तुम अपने मन में करोगे ?
तो उसका उत्तर है, "मैं तुम्हारे हृदय में हूँ। उस हृदय में रहने वाले की ही शरण में जाना चाहिये। सम्पूर्ण भाव
से और अपने सर्वस्व सहित मुझ हृदयस्थ की शरण में आओगे, तभी समस्त प्रणिमात्र में तथा हृदय में रहने