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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 358, कुल 869 में से

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पृष्ठ 358

३४२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
अपूर्व थी। मन के अन्दर की भावना केवल मैं ही जानता हूँ। यही बात मन में लाकर वे जीवभाव से मुझे प्राप्त
कर सकीं। अंग-प्रत्यंग का उपभोक्ता मैं ही हूँ, अंतर्बाह्य सर्वांग को शान्त करने वाला मैं ही हूँ यह जानकर वे मेरे
साथ कामासक्त होती थीं। हावभाव, कटाक्ष आदि गुण तथा उसका गुप्त उद्देश्य मैं ही जानता हूँ। किस समय
कौन-सा लक्षण समझना चाहिये, किस समय कैसे और कहाँ मिलना चाहिये यह भी मैं भी जानता हूँ। जिस
समय वह अपने बिस्तर पर मेरी इच्छा करती रहती तभी मैं अपने सहवास से उसे सन्तुष्ट करता था। मुझे कभी
छिप कर नहीं जाना पड़ता था और न दरवाजे पर कोई गुप्त संकेत ही देना पड़ता था। वह जीवभाव से मुझे वश
हुई, उसे मैं उसकी शय्या पर ही तृप्त करता था। इस प्रकार सारे मनोरथों को पूरा करने वाले पुरुषों में एक मैं ही
हूँ यह जानकर गोपियों ने मेरे ही प्रति शुद्ध भक्ति की थी। जिस पर निष्काम तपस्वी भी मोहित हो गये हैं, जिस
पर योगी और संन्यासी भी अनुरक्त हुए हैं, उसी पर देह और घर-बार भूलकर गोपियाँ लुब्ध हुई थीं। अँधेरे में
गुड़ खाने पर वह कडुआ नहीं लगता उसी प्रकार मेरा सच्चिदानन्द स्वरूप जाने बिना भी मेरी सेवा करते-करते
वे मत्स्वरूप हो गयीं। पारस पत्थर है यह जानकर उसे लोहे के हथौड़े से तोड़ने का प्रयास करने पर लोहे का
हथौड़ा भी सुवर्ण का हो जाता है। वैसी ही अवस्था गोपियों की हुई। विष समझ कर अमृत ग्रहण करने से मृत्यु
टल कर अमरत्व प्राप्त होता है उसी प्रकार जार बुद्धि से मेरा भजन करने पर भी उन्होंने सायुज्यता प्राप्त की। मैंने
गोपियों से कामविलास किया था उनका काम नष्ट किया इस पर विचार करने से यही निष्कर्ष निकलता है कि
उन्हें मेरे प्रति कामवासना से मोक्ष की ही प्राप्ति हुई। जिनका मेरे साथ संग हुआ ऐसी एक नहीं, दो नहीं असंख्य
गोपियों ने आत्मपद प्राप्त कर लिया। वैरागर नाम के रत्न का यदि कंकड़ से स्पर्श होता है तो कंकड़ भी हीरा हो
जाता है। उसी प्रकार मेरी संगति से कितनी गोपियों का उद्धार हुआ उनकी संख्या भी मैं नहीं जानता। मैं परब्रह्म
की सुन्दर मूर्ति हूँ। मुझसे व्यभिचार करने के कारण गोपियों की अविद्या और पापों की राशि धुल गयी और उन्हें
प्रत्यक्ष मूर्ति प्राप्त हो गयी। मैं अथवा मेरे संत इनमें से जिसकी भी संगति प्राप्त होगी वे निश्चित रूप से मुझे
प्राप्त होंगे इसमें सन्देह नहीं है। कितने ही लोग विकल्प के कारण मेरे स्वरूप पर अनेक प्रकार के दोषारोपण
करते हैं। किन्तु मेरे संत निर्दोष होने के कारण, उनकी संगति से निर्मल सुख प्राप्त होता है। हे उद्धव ! तुम भी
अधिक विचार-विमर्श न करो और सत्संग करते हुए सांसारिक उलझनों से मुक्ति पा लो।
तस्मात्त्वमुद्धवोत्सृज्य चोदनां प्रतिचोदनाम्।
प्रवृत्तं च निवृत्तं च श्रोतव्यं श्रुतमेव च॥ १४॥
उद्धव ! मेरा स्वरूप शुद्ध निर्मल है। वेद त्रिगुण हैं इसलिये उन वेदों की जो प्रेरणा है वह मुझे प्राप्त करने
में असमर्थ है, यह जान लो। उन वेदों से श्रुति-स्मृति अनेक प्रकार के कर्म लोगों से कराते हैं। उस कर्म की
कर्मगति निश्चित रूप से किसी को भी नहीं मालूम होती। कर्म स्वरूप से अत्यन्त गूढ़ है। विधि और निषेध के
कारण वह और भी कठिन हो गया है। महान ज्ञानी भी शास्त्रों के आधार से सूक्ष्म विचार करते हुए कर्म का
निर्णय नहीं कर पाता। कोई कर्म प्रवृत्तिमूलक होता है तो कोई निवृत्तिमूलक। उसी प्रकार कोई सकाम रहता है तो
कोई निष्काम। कर्म का स्वरूप अद्भुत है। वह साधक के ही शरीर पर आ गिरता है। कर्म के नाम से जो भी
कुछ है वह सब अविद्यात्मक है और वेद त्रिगुणात्मक हैं। तत्संबंधी साधनरूप वेद में यही श्रवण करने योग्य है।
तमोगुण से कर्मकाण्ड उत्पन्न हुआ है, रजोगुण से उपासनाकाण्ड उत्पन्न हुआ है और सत्त्वगुण से ज्ञानकाण्ड
उत्पन्न हुआ है। इस प्रकार वेद त्रिकांडात्मक तथा त्रिगुणात्मक है। वेद, शास्त्र, विधान एवं विधि इनका मूल