श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबारहवाँ अध्याय ३४१
काल के असह्य दुःख से पाषाण भी पिघल जाते। इस प्रकार मुझसे दूर होने पर भी मेरी ही कथा, मेरे ही
गुणानुवाद तथा सदैव मेरा ही स्मरण करते-करते वे मत्स्वरूप तक पहुँच गयीं। चक्की पर अनाज पीसते समय वे
जोर-जोर से मेरा ही गुणवर्णन करतीं अथवा दही मथते समय भी मेरा ही चरित्रगायन करतीं। छिड़काव समार्जन
करते समय उन गोपियों को मेरा ही ध्यान लगा रहता था। इतना ही नहीं बल्कि मेरा स्मरण करते हुए बालकों को
झूला झुलाती थीं। गाय का दूध निकालते समय भी मेरे ही स्मरण पर उनकी आसक्ति रहती थी। सारांश, सारा
काम करते समय मुझे भूलने की बात ही वे भूल गयी थीं। कहीं आते-जाते समय भी उनका मन अखण्ड मेरी
ही ओर लगा रहता था। बैठे रहने पर, खाना खाते समय, पीते समय उनका ध्यान मेरी ही ओर लगा रहता था।
सारांश मेरे जाने के बाद उन्हें मुझसे अधिक प्रेम हो गया था। उनकी आँखें एकटक मेरी ही ओर लगी हुई थीं। वे
हमेशा मेरी ही बातें किया करती थीं। इस प्रकार की अनन्य और सर्वत्र गोपियों और मेरे बीच प्रेम था। अपने
घरबार में विचरण करते हुए भी वे मुझ में ही तल्लीन रहती थीं। इस प्रकार उनकी बुद्धि ही मत्स्वरूप हो गयी
थी इसलिये वे अपना घरबार भी भूल गयीं। वे अपने पुत्र तथा पति को भूल गयीं और अपना कामधंधा भी वे
भूल गयीं। वे शीत-उष्ण आदि द्वंद्व दुःख भी भूल गयीं। वे भूख-प्यास भूल गयीं। जिस देह के कारण उन्होंने
पति और पुत्र को सगा मान लिया था उस देह को भूलकर उनका मन मुझ में ही रम गया। वे इहलोक और
परलोक भूल गयीं। वे पूरा कार्यकारण ही भूल गयीं। जरा देखो! मेरा ध्यान करते रहने के कारण होने वाले
आनन्दसुख का उपभोग लेते लेते वे अपना नाम और रूप भी भूल गयीं। चौबीस तत्त्वों के सारे विकार भूलकर
मुनिश्रेष्ठ समाधि लगाता है। वह जिस प्रकार उस समाधि में सारे संसार को भूलता है, उसी प्रकार गोपियाँ भी
सारा संसार भूलकर मत्स्वरूप ही हो गयीं या जिस प्रकार अनेक नदियाँ समुद्र में मिलते हुए उससे एकरूप
होकर अपना नाम और रूप भूल जाती हैं, उसी प्रकार गोपियाँ भी अनन्यप्रीति से मेरे स्वरूप में मिलने के कारण
नामरूप की भाषा ही भूल गयी। उन्हें इनमें से किसी भी बात की स्फूर्ति नहीं हो रही थी। सच्चिदानंद के स्वरूप
के प्रभाव का क्या वर्णन किया जाय? सचमुच, मेरा स्वभाव न जानते हुए भी उन गोपियों का अनन्यभाव मेरे ही
प्रति था। इसीलिये वे परब्रह्मस्वरूप तक पहुँच पायीं।
मत्कामा रमणं जारमस्वरूपविदोऽबलाः ।
ब्रह्म मां परमं प्रापुःसङ्गाच्छतसहस्रशः ॥ १३॥
वे गोपियाँ केवल अबला थीं लेकिन मेरी संगति से उन्हें अत्यन्त प्रेम था और वह संगति भी कामासक्ति
की अर्थात् शास्त्रप्रवृत्ति के विरुद्ध थी। शास्त्र के अनुसार मैं उनका पति नहीं था। लेकिन रूप के अनुसार देखा
जाय तो मैं साक्षात मदन को भी मोहित करने लायक सुन्दर था। जो स्त्रियाँ शास्त्र सम्मति के विरुद्ध जाट बुद्धि से
तथा व्यभिचार के लिये मुझसे रममाण हुई थीं वे चार प्रकार की स्त्रियाँ थीं—हस्तिणी, शंखिणी, चित्रिणी तथा
पद्मिनी। उन चारों को मैं चार मुक्ति के स्थानों पर काम के मोह में रमा रहा था। अन्य किसी पुरुष की संगति में
स्त्रियाँ क्षणभंगुर सुख भोगती हैं। लेकिन मेरी कामसक्ति से कभी विनष्ट न होने वाले निजसुख की प्राप्ति होती
है। अपने पति की संगति से क्षणभर का आनन्द प्राप्त होता था, लेकिन मेरे सुख का आनन्द प्राप्त होने के कारण
वे स्वानंदकंद परमानन्द का सर्वकाल उपभोग करती थीं। इसीलिये वे चंचल स्त्रियाँ अपने पति का सुख छोड़कर
पूरी तरह मुझसे ही रममाण हुईं। मेरी कामकला ऐसी अपूर्व है। नौ रसों का रस जानने वाला, नित्य नये रंग
उत्पन्न करने वाला एक मैं ही हूँ। इसीलिये गोपियाँ मुझ पर लुब्ध हुई थीं। उन गोपियों की भक्ति भी उतनी ही