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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 353, कुल 869 में से

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पृष्ठ 353

बारहवाँ अध्याय ३३७
दी, वैकुण्ठ मार्ग की ओर देखते हुए उसने एक सुन्दर कमल उठा कर कहा, "हे परमेश्वर ! अत्यन्त शीघ्रता से
आओ। गजेन्द्र की वह उत्कंठा देखकर मैं गरुड़ पर से कूद पड़ा और हाथी का बन्धन खोला। उसका जन्म पशु
योनि में हुआ था किन्तु अंतकाल में उसने मेरा स्मरण किया इसलिये वह मेरे निजधाम तक पहुँच गया। इसीलिये
पुराणों ने उसका गुणगान किया है। तराजू में तौल कर बेचने वाला एक बनिया था। वह सच बोलता था और
सामान ईमानदारी से बेचता था। उसने सत्यव्रत से ही मुझे प्राप्त किया इसलिये उसका नाम सत्यतोलना प्रसिद्ध
था। अंत्यजों में धर्मव्याध ने भी मेरा निजपद प्राप्त किया। जराव्याध तो प्रसिद्ध ही है। उसके अपराध करने पर
भी मैंने उसका उद्धार किया। पैर पर बाण के आघात से ही कृष्ण का प्राणांत हुआ। हे परीक्षिति ! वही जराव्याध
था जिसका श्रीकृष्ण ने स्वयं ही उद्धार किया। मछियारों में गुहक को देखो। वह राम के सामने आया तभी उसके
सम्पूर्ण कर्मों का नाश हुआ और वह निजधाम पहुँच गया। कुब्जा तो तीन जगह से टेढ़ी थी लेकिन भक्तिभाव में
वह शुद्ध और सरल थी। उसके चंदन की पवित्र माधुरी का क्या वर्णन किया जाय ? उसने चन्दन से मेरा विलेपन
किया और मन मुझे अर्पण किया इसलिये मैं उसके अधीन हो गया। वह निजधाम पहुँच गयी। देखो। गोकुल की
गोपिकायें संसार से परावृत्त होकर शरीर, मन और प्राण से मुझ पर आसक्त होने के कारण उन्होंने भी आत्मसुख
प्राप्त कर लिया। गोपिकाओं को मुझसे बहुत प्रेम था या यों कहो कि मुझे ही गोपिकाओं से प्यार था। लेकिन हम
दोनों के इस प्रेम की बराबरी की योग्यता प्राप्त करने में सारे साधन दुर्बल सिद्ध हुए। गृहस्थी की परवाह न कर,
पति या पुत्रों का प्रेम छोड़ यज्ञपत्नियों को मुझसे ही प्रेम हुआ। भाविकों के मन में भक्ति के कारण परमेश्वर पर
ही दृढ़ श्रद्धा रहती है। मुझे अन्न समर्पण कर वे मेरे निजधाम पहुँच गयीं। लेकिन जिन्हें कर्म का अभिमान था वे
ब्राह्मण मुझ तक नहीं पहुँच पाये। एक ब्राह्मण अपने शास्त्राभिमान के बल पर अपनी स्त्री को मेरे पास नहीं आने
दे रहे थे। वह लोगों से कहता था कि वे लोग वेदशास्त्र से भ्रष्ट हो गये हैं। गोरक्ष और ग्वालों की कैसी पूजा ?
अन्य स्त्रियों को मेरे पास आते देख वह स्त्री मुझसे मिलने के लिये बेचैन हो उठी। लेकिन वह ब्राह्मण अत्यन्त
कर्मठ तथा कठोर अंतःकरण का था। उसने उसे रोक रखा। बोला, "तुम्हारे पिता ने जब तुम्हें मुझे सौंपा तभी मैं
तुम्हारे देह का पति बन गया हूँ। मुझे छोड़ तुम ग्वाले के पास कैसे जा रही हो ?'' तब वह बोली, "तुम इस देह
के पति हो। '' यह कह उसने अपना देह उसके सामने रख दिया और अपने प्राणों के साथ मुझसे मिलने के
कारण उसे सायुज्यमुक्ति प्राप्त हुई। मेरी जिस प्राप्ति के लिये साधक तरह-तरह के प्रयत्न कर थक जाते हैं उन्हें
किये बिना ही उन स्त्रियों ने अनायास मुझे प्राप्त कर लिया।
ते नाधीतश्रुतिगणा नोपासितमहत्तमाः ।
अव्रतातप्ततपसः सत्सङ्गान्मामुपागताः ॥ ७॥
उन्होंने वेदपठन नहीं किया और न ही शास्त्रविद गुरु ही किये, व्रत, तप आदि अनेक प्रकार के साधनों का
भी उन्होंने प्रयोग नहीं किया। अरे ! केवल सत्संगति से ही कितनी ही स्त्रियाँ मेरे स्वरूप को प्राप्त कर सकीं। जो
एकनिष्ठा से मेरी भक्ति करते हैं उनके लिये मैं श्रीकृष्ण सदा सुलभ हूँ।
केवलेन हि भावेन गोप्यो गावो नगा मृगाः ।
येऽन्ये मूढधियो नागाः सिद्धा मामीयुरञ्जसा ॥८॥
जो संत केवल आत्मस्वरूपी थे उन्हें मेरी संगति प्राप्त हुई। भावार्थ से ही मुझसे मिलने के बाद तप, व्रत
आदि की क्या आवश्यकता है ? मुझे प्राप्त करने के लिये उनके पास भावार्थ यही एक पूँजी है। गोपियाँ भक्ति के