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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 352, कुल 869 में से

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पृष्ठ 352

३३६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
वैसे देखा जाय तो केवल जड़, मूढ़ और शुद्ध रजतम योनि में जन्म लेने पर भी वे दृढ़ सत्संग के कारण
मुझे प्राप्त कर सके। दैत्य, दानव, निशाचर, पक्षी, पशु, गन्धर्व, अप्सरा, सिद्ध, चारण, विद्याधर, नाग, विषैले
सर्प, गुह्यक वे सभी मेरे पद तक पहुँच गये। इस प्रकार जब पक्षी, पशु, सर्प इन सबने मुझे प्राप्त कर लिया तो
मनुष्य तो सहज ही उन सबमें श्रेष्ठ है। सत्संग से वैश्य, शूद्र, स्त्रियाँ आदि ने मुझे प्राप्त कर लिया। इतना ही
क्यों? लेकिन जिनको वर्णाश्रम धर्म से बाहर कर दिया गया है और जिनका कोई नाम भी नहीं लेता, जिनकी
छाया से ही संसार दूर भागता है ऐसे मलिन अंत्यज लोगों ने भी सत्संग कर मुझे प्राप्त कर लिया है। इतना ही
नहीं बल्कि देवता और ब्राह्मण भी उनका वंदन करते हैं। ऐसे संतों की कीर्ति अपूर्व है। सत्संग करने से निंद्य भी
वंद्य हो जाते हैं। उद्धव! तुम सचमुच निष्पाप हो इसलिये तुम सत्संग करो। पहले से ही शुद्ध सोना जब रत्न की
संगत करता है तो उसका मूल्य बढ़ता ही जाता है और वह राजा के मुकुट की शोभा बढ़ाता है। उसी प्रकार पुण्य
के बल पर सत्संगति प्राप्त होने पर लोग अनंत सुख भोगते हैं, देवाधिदेव उनका वंदन करते हैं और शंकर आदि
भी उनकी भेंट करने आते हैं। यमधर्म उनके चरणों में लग जाते हैं और तीर्थ उनका चरणतीर्थ माँगते हैं।
भक्तिभाव से संगत करने से पुरुष को इतना लाभ मिलता है। दैत्य, राक्षस, स्त्रियाँ, शूद्र तथा अंत्यज की ही क्या
बात करते हो, अरे, उन युगों में वहाँ और भी कईयों का उद्धार हुआ है।
बहवो मत्पदं प्राप्तास्त्वाष्ट्रकायाधवादयः ।
वृषपर्वा बलिर्बाणो मयश्चाथ विभीषणः ॥ ५ ॥
सुग्रीवो हनुमानृक्षो गजो गृध्रो वणिक्पथः ।
व्याधः कुब्जा व्रजे गोप्यो यज्ञपत्न्यस्तथापरे ॥ ६ ॥
जो वृत्तासुर इन्द्र के साथ युद्ध कर रहा था उसका वर्णन वेदों ने भी किया है। युद्ध में भी उसकी बुद्धि
विषमभाव रहित थी इसलिये उसने मुझे प्राप्त कर लिया। नारद की कथाएँ सुनकर जो गर्भ में ही मुझसे गले
मिला वह भक्तराज शिरोमणि प्रह्लाद ने कयापु के पेट से जन्म लिया था। महापराक्रमी वृषकमी दैत्य मेरे पद में
प्रविष्ट हुआ। बलि के द्वार पर भिक्षा माँगने के लिये मैंने बटु वामन का अवतार लिया। कपट से बलि को बन्दी
करने पर छलने वाला ही छला गया। मेरे जिम्मे ही द्वारपाल का काम सौंपा गया और बली मेरे अधीन हुआ।
उसी बली का पुत्र बाणासुर शिव के वरप्रसाद से उन्मत्त हो गया था। उसने मेरे ही पुत्र के पुत्र को (प्रद्युम्न का
पुत्र अनिरुद्ध) चुरा लिया और उसमें दोनों का जासूस था नारद। उस चोर बाणासुर को मैंने युक्ति से पकड़ा और
उसे अत्यंत जर्जर किया। उसकी सहस्र भुजाओं को काट डाला। शंकर ने बीच बचाव कर उसके प्राण बचा
दिये। उसने कहा, "कहीं अपने भक्त के पुत्र का संहार न कर देना।" मुझे भी बलि के प्रति प्रेम उमड़ पड़ा
इसलिये मैं अखण्ड उसके द्वार पर रहता हूँ, अतः बाण का भी मैंने उद्धार कर दिया। फिर शंकर को सन्तुष्ट करने
के लिये मैंने अपने हाथ में बाण उठाकर ऐक्य से शिव पद पर पट स्थापित किया तब कहीं उसे सुख प्राप्त हुआ।
अर्जुन ने खांडव वन अग्नि के हवाले किया, उसमें मयासुर जलने लगा तो मैंने ही उसका उद्धार किया। शत्रु का
भाई विभीषण राक्षस कुल में पैदा हुआ था वह अनन्यभाव से मेरी शरण में आया इसलिये वह मेरा परममित्र बन
गया। सुग्रीव, मारुति तथा जामवंत के महान पराक्रम प्रसिद्ध ही हैं। रावण ने जंगल में जटायु को छिन्न-भिन्न कर
दिया था, उसका मैंने उद्धार किया। गजेन्द्र सरोवर में ग्रहग्रस्त था। उसकी पत्नी और लड़कों ने भी उसे उसी
अवस्था में त्याग दिया था। अन्त समय में वह दीनवाणी से मेरा स्तवन करने लगा। उसने समस्त की आशा छोड़