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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 351, कुल 869 में से

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पृष्ठ 351

बारहवाँ अध्याय ३३५
करने से भक्त मेरी योग्यता प्राप्त करते हैं और अन्त में मेरे लिये भी वे पूज्य बन जाते हैं। उनकी महिमा का क्या
वर्णन किया जाय ? उद्धव ! मेरा स्थान तत्काल प्राप्त करने के लिये सचमुच संतों की संगत के सिवा अन्य कोई
साधन नहीं है। पहले तो साधन बताये हैं वे सब भी अहंकार के कारण मलिन ही हुए हैं। उनके लक्षण तुम्हें
बताऊँगा, सुनो। अष्टांग योग में वायु को जीतना अत्यन्त कठिन है, वह पूरी तरह कभी सिद्ध नहीं होता। साधने
पर भी परेशान करता है। नित्यानित्य विचार का ज्ञान रहता है लेकिन वहाँ पांडित्य का अहंकार बाधक सिद्ध होता
है और मन में धन और सम्मान की प्रबल इच्छा रहती है। वहाँ ज्ञान ही ज्ञानी पण्डित के लिये विघ्न बन जाता है।
लोग अहिंसा धर्म का पालन करते समय पानी छान कर लेते हैं लेकिन उसे छानते समय ही हजारों जीव मर जाते
हैं। तो इस प्रकार अधर्म से वह धर्म व्याप्त रहता है। अगर वेदाध्ययन किया जाय तो मुख्य विषय के प्रति वेद
मौन ही रहते हैं। इसलिये उनके पठन से भी मैं प्राप्त नहीं होता। यज्ञ और दानधर्म का शौक पालने पर भी मैं प्राप्त
नहीं होता। देह से तप करने पर तप करने वाले के शरीर में क्रोध उत्पन्न होता है। वह तापसी क्रोध को पीछे नहीं
जाने देता जिससे क्रोध दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जाता है। सर्वस्व का त्याग कर संन्यास ग्रहण करने से भी
देहाभिमान नष्ट नहीं होता। बिरजा होम करने पर वह भी व्यर्थ हो जाता है क्योंकि मानाभिमान की बाधा होती है।
श्रौतस्मार्त कर्म यथासांग करने पर अथवा इष्टापूर्त यज्ञ करने पर भी वहाँ स्वर्ग के नानाप्रकार के भोग बाधा उत्पन्न
करते हैं। इसलिये साधकों के लिये कर्म क्षयरोग की तरह विनाशकारी बन जाते हैं। नाना प्रकार के दान करने पर
भी वासना उस दान के प्रतिफल की इच्छा करती है अथवा दाता होने का अहंकार उत्पन्न होता है और वह किसी
प्रकार भी कम नहीं होता। कोई साधक अनंतव्रत करता है और चौदह गांठों में देवता को बांधता है, फिर भी अन्त
में वह अनन्त को ही भूल जाता है और हाथ में जो देवता था उसे भी खोदता है। अनेक प्रकार के यज्ञ करने पर
उस प्रत्येक यज्ञ के विधि, मंत्र, तंत्र, पात्रशुद्धि आदि की झंझट के कारण वह याग पूरी तरह सिद्ध नहीं होता और
यदि सिद्ध हो भी गया तो उससे होने वाले फलभोग की पीड़ा पीछा नहीं छोड़ती। अनेक प्रकार के वेदमंत्र और
गुप्तमंत्र पढ़ते समय उनका उच्चार अव्यवस्थित नहीं होना चाहिये क्योंकि उन मंत्रों की रचना मंत्रवाद्यों से ही की
जाती है। उसमें चूक होने के कारण अनेक मंत्रवादी पागल हो गये हैं। लाल वस्त्रों को भगवा बना कर अभिमान
से तीर्थाटन पर चल पड़ते हैं। लेकिन उन बेचारों को भीख माँगनी पड जाती है और क्षणभर का भी विश्राम नहीं
मिल पाता। बारह-बारह यमनियमों का अखण्ड परिश्रम करने में चौबीस तत्त्वों में ही इनका कल्पना संसार फैला
रहता है। पच्चीसवाँ तत्त्व अर्थात् सबसे सगा सम्बन्धी जो परमात्मा है उसका किसी को पता ही नहीं रहता। इस
प्रकार जो भी साधन बताये गये हैं उन्हें यदि अपने मन से किया जाय तो उन सबमें जो बाधा है वह मैं तुम्हें बता
चुका हूँ। लेकिन यदि उन्हें साधुओं के निर्देश के अनुसार किया जाय तो वे सबके सब सिद्ध हो जाते हैं। हर
साधन का विधि विधान क्या है, उसके क्या प्रकार हैं इसका पता अपने मन से कभी समझ में नहीं आता। लेकिन
बिना किसी प्रकार के साधन का प्रयोग किये, केवल सत्संग से मुझे प्राप्त करने वाले लोगों की संख्या कल्पनातीत
है। उसके सम्बन्ध में तुम्हें बताऊँगा।
सत्सङ्गेन हि दैतेया यातुधाना मृगाः खगाः।
गन्धर्वाप्सरसो नागाः सिद्धाश्चारणगुह्यकाः ॥ ३॥
विद्याधर मनुष्येषु वैश्याः शूद्राः स्त्रियोऽन्त्यजाः ।
रजस्तमः प्रकृतयस्तस्मिंस्तस्मिन् युगेऽनघः ॥ ४॥