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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

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परिशिष्ट दूसरा
गीताके चौथे अध्यायमें कर्म-योगकी परंपरा बताते समय
कुछ राजाओंका नाम आया है। इस परिशिष्टमें उनका
कुछ जीवन परिचय है।

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परिशिष्ट दूसरा
पहले सूर्यसे मैंने कहा था योग अव्यय ।
मनुसे वह बोला था वह इक्ष्वाकुसे फिर ॥
गीता अ० ४. श्लो० १-
विवस्वत—गीतामें सूर्यके लिये विवस्वत शब्द आया है । ऋग्वेदमें इसको अश्विनी तथा
यमका पिता कहा गया है । कहीं कहीं सभी देव विवस्वतके संतान होनेकी बात भी कही
गयी है । इसके विषयमें कहा गया है "यह आयु बढाता है ।" "यह आरोग्य देता है !"
"यही विश्व निर्माण करनेवाला है !" "यह देवोंका पुरोहित है !" ऋग्वेदके अनेक वर्णन
सूर्य बिंबका वर्णन करनेवाले हैं । किंतु यहां विशेष रूपमें, मानवोचित वर्णन ही दिये गये हैं ।
ऋग्वेदमें कहा गया है "इसके कारण जगत जीता है !" अग्निको विवस्वतका दूत कहा गया है ।
आदित्य, सूर्य, विवस्वत्, पूषन्, अर्यमन्, आदि सूर्यके ही भिन्न भिन्न रूप माने गये हैं। देव
भी सूर्योदयके समय इसकी प्रार्थना करके कहते हैं "हम निष्पाप हैं यह सभी देवोंसे कहो !"
इसकी तीन पत्नियां हैं । त्वष्टाकी पुत्री संज्ञा रैवतकी पुत्री राज्ञी और प्रभा । कहीं कहीं
इनकी पत्नियोंके नाममें द्यौ, राज्ञी, पृथ्वी, निक्षुभा ऐसे नाम भी आते हैं ।
विवस्वत्से संज्ञाको तीन पुत्र हुए । (१) श्रुति सवस्ः सावर्णिमनु (२) श्रुतिकर्मन्ः
शनि (३) तपती-यमुना । मत्स्यपुराणमें अश्विनी कुमार और विष्णुको सूर्यका पुत्र माना गया है
और प्रभासे प्रभात, राज्ञीसे रेवत ये विवस्वत्के पुत्र हैं । इनमें यम और यमी-यमुना, तथा
अश्विनी कुमार जुड़वे बच्चे हैं ।
और एक मत ऐसा है कि विवस्वतकी पत्नी संज्ञा-द्यौः उसकी छाया निक्षुभा पृथ्वी और
इनकी संतति जल और धान्य-वनस्पति-है । गरमीके दिनोंमें सूर्य पानी खींच लेता है और वर्षाके
रूपमें वह पृथ्वी पर बरसाता है इस लिये वह जगत्पिता है । यह ब्राह्मण ग्रंथोंका कहना है ।
वह इतना अधिक तेजस्वी था कि जिससे विश्व जलने लगा तब इसके तेजसे विष्णुने
सुदर्शनचक्र, शंकरने अपना त्रिशूल, अष्टवसु देव (१) ध्रुव (२) घोर (३) सोम (४) आप
(५) नल (६) अनिल (७) प्रत्यूष (८) प्रभास, कार्तिकेयकी शक्ति, कुबेरकी पालकी
आदिका निर्माण किया गया । तब कहीं इसका तेज कुछ सहने योग्य हुआ ।
.४१ परिशिष्ट २
(4)

इसके १४०० किरणे हैं। चंद्र नक्षत्र आदि इसीसे बने हैं।
मनु—सावर्ण मनु अथवा वैवस्वत मनु। विवस्वतका पुत्र। ऋग्वेदमें दो बार इसका वर्णन
आया है। यह अत्यंत उदार था। इसने जो दक्षिणा दी उसकी अत्यंत प्रशंसा की गयी है। यह
विवस्वतकी पत्नी संज्ञाका पुत्र है। इसको वैवस्वतमत्त मनु भी कहा गया है। इसको मानव-जातिका पिता
माना गया है। पुराणोंमें जितने वंश कहे गये हैं उन सब वंशोंका मूल पुरुष यह है। इसे "पहला
यज्ञकर्ता" कहा गया है। यदु, तुर्वसु वंशके राजाओंने इसको अनेक उपहार दिये थे। वैवस्वत
मनु राजा था। प्रलयके समय मत्स्यने मनुका संरक्षण किया था, मत्स्य-पुराणमें विस्तार पूर्वक
इसका तथा इसके तपका सुंदर वर्णन किया गया है। अलग अलग पुराणोंमें इसके अलग अलग
नाम मिलते हैं। भागवतमें इसको द्रविड़ाधिपति कहा गया है। यज्ञ-कर्मसे इसका वैभव बढ़ता गया।
वसिष्ठको इसने ब्रह्मविद्या सिखाई, इससे वसिष्ठ ब्रह्मनिष्ठ बना। यह धर्म-नियमोंका प्रवर्तक था।
इसी मनुको भारतीय धर्म-शास्त्रका मूलपुरुष माना जाता है। "बड़े बड़े ऋषियोंने इसके पास आकर
धर्म-संबंधी अपने प्रश्न पूछे। अपनी समस्याएं इसके सामने रखीं। इसने उन सबका उत्तर दिया और
उन उन ऋषियोंने अपने शिष्य प्रशिष्योंको यह विद्या दी," ऐसा उल्लेख मिलता है। मेक्समुलर जैसे
आधुनिक विद्वान भी यह मानते हैं "मूल मानव-धर्म सूत्रोंके आधारसे आजकी मनुस्मृति लिखी
गयी है।" वैवस्वत मनु अपने समयका अत्यंत विद्वान राजा था। विद्वानोंकी ऐसी मान्यता है
कि संभव है जब मनुस्मृतिकी रचना हुई होगी तब वैवस्वत मनुके नाम पर पर्याप्त साहित्य
उपलब्ध रहा होगा। वैदिक विद्वानोंकी यह भी मान्यता है कि उपलब्ध मनुस्मृतिको देख कर
लगता है कि वह बुद्धोत्तर रचना है। आद्य शंकराचार्यने मनुस्मृतिको मान्यता दी है। ई० स०
५७१ में लिखे गये एक शिलालेखमें "मनुस्मृतिके आदेशानुसार शासन करने वाले एक राजा"
का उल्लेख है। ई० स ५०० से भी पहले जो श्री शबर स्वामी हो गये उन्होंने उपलब्ध
मनुस्मृतिका उल्लेख किया है। वैसे ही ई० स० दूसरी सदीके कुछ लेखकोंने मनुके विचारोंको
ग्राह्य माना है! इससे ऐसे लगता है "मनुके प्राचीन धर्मशास्त्रमें, समय समय पर कुछ वृद्धि
होती गयी है ! संभव है कि तीसरी सदीसे पूर्व ही इसमें ऐसी वृद्धि होना प्रारंभ हुवा हो !!"
सामान्यतः विद्वानोंकी ऐसी राय है कि "ई० स० पू० १००-४०० से ई० स० २०० तक यह
स्मृति बनी होगी।"
इक्ष्वाकु—वैवस्वत मनुके दस पुत्रोंमें एक। सबसे ज्येष्ठ पुत्र। एक राजकुलका प्रथम
पुरुष। मनुने इक्ष्वाकुको दंडनीति सिखाई। "दंडसे प्रजा पालन करना किंतु अकारण दंडका
प्रयोग नहीं करना!" यह इस नीतिका सार है। इक्ष्वाकु वंशका कुलगुरु वसिष्ठ। इक्ष्वाकु
अयोध्याका पहला राजा। इक्ष्वाकु वंशमें इक्ष्वाकुसे कुरुयुद्धके समय राज्य करनेवाले बृहद्वल तक ८८
पीढियां हो चुकी थीं। कुछका मत ९१ है। इस कुलमें दिलीप, रघु, सगर, भगीरथ हरिश्चंद्र, राम
आदि अनेक महापुरुष हो गये हैं। इसलिये सभी पुराणोंमें इस वंशके विषयमें कुछ न कुछ
जानकारी मिलती है।
ॐ
ज्ञानेश्वरी ४२

परिशिष्ट तीसरा
गीताके दसवे अध्यायमें भगवानने अपने ७५ विभूतियां
कहीं हैं । उनमेंसे कुछ समझमें नहीं आनसे छोड दी हैं ।
जिसके विषयमें जो जानकारी मिली वह यहां दी है ।

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परिशिष्ट तीसरा
गीता अ० १०, श्लो० २१-आदित्योंमें महाविष्णु—
आदित्य १२ हैं। आदित्यका अर्थ है सूर्य। सूर्यके १२ नाम हैं। ये नाम भिन्न भिन्न हैं।
सूर्य-नमस्कारके लिये (१) मित्र (२) रवि (३) सूर्य (४) भानु (५) खग
(६) पूषा (७) हिरण्यगर्भ (८) मरीचि (९) आदित्य (१०) सविता (११) अर्क
(१२) भास्कर हैं। किंतु द्वादशादित्योंमें (१) धाता (२) मित्र (३) अर्यमा (४) शुक्र
(५) वरुण (६) अंशु (७) भग (८) विवस्वान् (९) पूषा (१०) सविता
(११) त्वष्टा (१२) विष्णु हैं।
विष्णु—ऋग्वेदमें "विष्णुने तीन पगमें त्रिलोक जीत लिया" ऐसा वर्णन आया है।
ऋग्वेदमें "सब दो लोक जानते हैं तो ये तीन लोक जानता है। सब पर इसकी कृपा रहती है।
यह सबका उत्पादक और आधार है। यह सदैव सबको संकट-मुक्त करता है। पृथ्वी जीव-
मात्रको रहने योग्य हो इसीलिये इसने तीन पगसे इसका आक्रमण किया" आदि वर्णन है।
उपनिषदोंमें भी इसी प्रकारका वर्णन देखनेको मिलता है। ॐकारमें "उ" विष्णु-निदर्शक मात्रा
है यह "नृसिंहोत्तरतापिनी"में कहा गया है। यह आदित्योंमें प्रमुख है।
वैष्णव पुराणोंमें विष्णु-तत्त्वको आख्यान रूपसे समझाया गया है। इसके दस अवतार माने
गये हैं। विष्णु-तत्त्वको सर्व-सामान्य लोगोंको समझानेके लिये पुराणोंमें आख्यान रूपसे-कथा
कहानियोंके रूपमें-बहुत कुछ कहा गया है।
भारतमें गीताकी भांति "विष्णु सहस्र नाम" स्तोत्र महत्त्वका है। महाभारत, हरिवंश,
भागवत, ब्रह्मपुराण, मत्स्यपुराण, विष्णुपुराण, आदि पुराणोंमें विष्णुके आख्यान हैं।
गीता अ० १०, श्लो० २१-सूर्य मैं ज्योतिमानमें—
द्युतः प्रकाशना इस धातुसे ज्योतिष प्रकाशनेवाले ऐसा शब्द बना है। प्रकाशनेवालेमें
रवि-अंशुमान सूर्य।
गीता अ० १०, श्लो० २१-मरीचि मुख्य वायुमें—
मरुद्गण देवताओंका संघ है। ये ७-७ के टुकड़ियोंमें रहते हैं।
४५ परिशिष्ट ३ ०

पहले गणमें ( १ ) चित्रज्योतिस् ( २ ) चैत्य ( ३ ) ज्योतिष्मान् ( ४ ) शक्रज्योति
( ५ ) सत्य ( ६ ) सत्यज्योतिस् ( ७ ) सुतपस् ।
दूसरे गणमें-( १ ) अमित्र ( २ ) ऋतजित् ( ३ ) सत्यजित् ( ४ ) सुतमित्र
( ५ ) सुरमित्र ( ६ ) सुषेण ( ७ ) सेनजित् ।
तीसरे गणमें-( १ ) उग्र ( २ ) धनद ( ३ ) धातु ( ४ ) भीम ( ५ ) वरुण । और
दो नाम नहीं मिले ।
चौथे गणमें-( १ ) अभियुक्तशिक्र ( २ ) साह्य । और नाम नहीं मिले ।
पांचवे गणमें-( १ ) अन्यादृश ( २ ) ईंदृश ( ३ ) तुम ( ४ ) मित ( ५ ) वृक्ष
( ६ ) समित् ( ७ ) सरित् ।
छठे गणमें-( १ ) ईदृश् ( २ ) नाभ्यादृश् ( ३ ) पुरुष ( ४ ) प्रतिहर्त्तृ ( ५ ) समचेतन
( ६ ) समवृत्ति ( ७ ) संमिति ।
सातवे गणके-नाम नहीं मिले । प्रत्येक गणमें सात मरुत् होने चाहिए । किंतु कुछ नाम नहीं
मिलते । पहला गण पृथ्वीसे मेघ तक, दूसरा मेघसे सूर्य तक, तीसरा सूर्यसे सोमके निम्न भाग तक,
चौथा सोमके ऊपर नक्षत्रों तक, पांचवा नक्षत्रोंके ऊपरसे ग्रहों तक, छठा ग्रहोंके ऊपरसे ऋषियों
तक, सातवा ऋषियोंसे ध्रुव तक भ्रमण करते हैं । इनके अधिकार स्थान पृथ्वी, सूर्य, सोम,
ज्योतिर्गण, ग्रह, सप्त ऋषि मंडल, ध्रुव है ।
इनका रथ हरिण खींचते हैं । ये जब वेगसे दौडते हैं तब पर्वत कांपते हैं। वृक्ष जड-मूलसे
उखड पडते हैं । सारा विश्व डांवाडोल होता है ।
इनके हाथमें धनुष्य बाण और भाला होता है । वज्र और सोनेकी कुल्हाडी होती है ।
ये इंद्रके मित्र हैं । वर्षा गिराना इनका मुख्य कार्य है
ये कुल ४९ हैं । वेदादिका सारा वर्णन देखनेसे लगता है कि आंधी बवंडर आदिका इनसे
गहरा संबंध है । इनका पिता रुद्र और माता पृश्नी है । कहीं कहीं ये दिति और कश्यपके पुत्र
माने गये हैं । पुराणोंमें इन्हे "वायुके सात प्रवाहोंमें संचार करनेवाले दिति-पुत्र" कहा गया है ।
इन सात प्रकारके वायुमंडलोंकी ( १ ) आवह-पृथ्वीसे मेघमंडल तक (२) प्रवह - मेघ-
मंडलसे सूर्यमंडल तक ( ३ ) उद्वह - चंद्र और सूर्यमंडल तक ( ४ ) संवह - चंद्रमंडलसे नक्षत्र-
मंडल तक ( ५ ) विवह - नक्षत्रमंडलोंमें- ( ६ ) परिवह - शनिमंडलसे सप्तऋषि मंडल तक ( ७ )
परावह - ऋषिमंडलसे ध्रुव तक कार्य सीमा है ।
मरीचि - विशेष जानकारी नहीं मिली ।
गीता अ० १०, श्लो० २१-नक्षत्रोंमें शशांक मैं-
आकाशके पूर्व-पश्चिम परिवर्त्तमें जो तारा पुंज झिलमिलाता है उन्हे नक्षत्र कहते हैं । पाणिनीने
"जो क्षति नहीं होता" उसे नक्षत्र कहा है। वेदोंमें नक्षत्रोंकी प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष चर्चा है ।
कहीं कहीं क्षीरसागरके मंथनके समय चंद्रोत्पत्ति होते हुए जो सागर तुषार उछले या छलके
उससे नक्षत्र बने ऐसा काव्यमय वर्णन है । तो कहीं नक्षत्रोंको सूर्यकी चिनगारी माना गया है ।
ज्ञानेश्वरी ५३

इन नक्षत्रोंमें २७ विशिष्ट नक्षत्रोंका उल्लेख है जिनका ज्योतिष-शास्त्रमें महत्त्वपूर्ण स्थान है। इन
नक्षत्रोंमें मृग नक्षत्रका स्वामी चंद्र है।
शशांक—पौराणिक आख्यानोंके अनुसार यह समुद्र-मंथनसे उत्पन्न हुआ। इसको सोम
भी कहा गया है। नक्षत्रोंको चंद्रकी पत्नियां कहा गया है। इन सत्ताईस स्त्रियोंमेंसे रोहिणी पर
इसका विशेष प्रेम था। इस ईर्ष्यासे अन्य स्त्रियोंने प्रजापतिसे शिकायत की। प्रजापतिने क्षयरोगी
होनेका शाप देकर पुनः वृद्धि होनेका उद्धशाप दिया। इससे प्रति मास क्षय पक्ष और वृद्धि पक्ष
माने जाने लगे। चंद्रके विषयमें अन्यान्य पुराणोंमें अनेक कथायें हैं।
चंद्रको "आह्लाद देनेवाला" कहा जाता है। क्यों कि चंद्र शब्द "चदि" आह्लाद दायक
धातुसे बना है। ज्योतिष शास्त्रमें यह ग्रह है। यह पृथ्वीका उपग्रह माना जाता है। यह पृथ्वीसे
२३९००० मील पर है। इसकी परिधि २१६० मील है। २७ दिन, ७ घंटे, ४३ मिनिट १४
सेकंडमें यह पृथ्वी प्रदक्षिणा करता है।
यह पर प्रकाशित है। सूर्यके प्रकाशसे चमकता है। शतपथ ब्राह्मणमें लिखा है "चंद्र किरण
वास्तवमें सूर्य किरण ही हैं।" अमावास्याके दिन सूर्य और चंद्र पृथ्वीकी एक ही ओर आते हैं।
ऋग्वेदके पुरुष सूक्तमें "चंद्रमा विराट पुरुषके मनसे हुआ" ऐसा कहा गया है। कुछ प्राचीन
ग्रंथोंमें चंद्रमाको "पानीका पुष्प" अथवा "पानीसे बना हुआ" कहा गया है। भारतीय
धर्म ग्रंथोंमें अनेक प्रकारसे चंद्र-लोककी कल्पना की गयी है। गीताके आठवे अध्यायके पच्चीसवे
श्लोकमें भी दक्षिणायनकी रातके समय मृत्यु पानेवाला चंद्र-लोक जा कर पुनः जन्म पाता है ऐसा
कहा गया है। उपनिषदोंमें भी यह कल्पना है।
प्राचीन भारतीय साहित्यमें "चंद्र सोमरस है।" "चंद्रमा प्राण है" "चंद्रमा मन है"
"चंद्रमा प्रजापति है!" "चंद्रमा मनुष्य लोक है!" "चंद्रमा अन्न है!" ऐसा वर्णन मिलता
है। इस प्रकार चंद्रमाका पृथ्वीके साथ घनिष्ठ तम संबंध बताया गया है।
फल ज्योतिषमें चंद्रमाको चंचल, मनका प्रतीक माना गया है।
गीता अ० १०, श्लो० २२-मैं सामवेद वेदोंमें—
वेद-वेद भारतके ही नहीं विश्वके प्राचीनतम ग्रंथ हैं। वेद काव्य हैं। धर्म-ग्रंथ हैं। प्रेरणा
ग्रंथ हैं। वेद भारतीयोंका जीवन सूत्र है। वेद भारतीय जन-जीवनका मूल स्रोत है।
वैदिक वाङ्मय विपुल है। जितनां है उससे अधिक नष्ट हुआ है। वैदिक वाङ्मयके चार
विभाग हैं। (१) जो श्रुति कहाते हैं वे हैं-ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्वणवेद। श्रुतिका अर्थ
सुनकर पाठकुंठ-किया हुआ। बडोंसे सुना और कंठ कर रखा गया, वह श्रुति।
ऋग्वेद-ऋग्वेदमें- जो आज उपलब्ध है- १० मंडल, ८ अष्टक प्रत्येक अष्टकमें ८ अध्यायके
अनुसार ६४ अध्याय, उनके २०७ वर्ग और परिशिष्टके साथ १०२८ सूक्त हैं। इन सूक्तोंमें
१०५७० ऋचाएं हैं। इन्हें मंत्र कहते हैं। इन मंत्रोंमें १,५३,८२८ शब्द और पूर्ण उच्चार
होनेवाले ४,३२,००० अक्षर हैं।
ऋग्वेद-आज जो भाग उपलब्ध हैं उसको शाकलशाखा कहते हैं।
३७ परिशिष्ट ३

प्रत्येक वेदके ब्राह्मण, आरण्यक, तथा उपनिषद् ऐसे अलग अलग भाग हैं। ब्राह्मण वेदका
कर्मकांड है। इसमें यज्ञ-यागादि विधि-विधान कैसे करना चाहिए इसका सविस्तर और सूक्ष्माति-
सूक्ष्म, विवरण है और आरण्यक उपासना कांड है। इसमें आध्यात्मिक चिंतनका विवेचन है।
और उपनिषद् इस विश्वके मूलमें जो तत्त्व है उसको जाननेका प्रयासरूप ज्ञानकांड है।
ऋग्वेदके ऐसे ५ ब्राह्मण ९ आरण्यक और ४ उपनिषद हैं।
ऋग्वेदका रचनाकाल विद्वानोंके अनुसार ६००० से ८००० वर्ष प्राचीन है।
यजुर्वेद-यजुर्वेद यज्ञ संबंधि अधिक है। यजन विषयक ज्ञान-यजुर्वेद है। ऐसा माना जाता
है कि प्राचीन कालमें इसकी १२२ शाखायें थीं। "यजन पद्धतिके भिन्नताके कारण ही ये शाखायें
हुईं" ऐसे विद्वानोंकी मान्यता है। आज, यजुर्वेदकी पांच संहिताएँ उपलब्ध हैं। (१) काठक-
संहिता (२) कठ-संहिता (३) मैत्रायणी-संहिता (४) तैत्तिरीय-संहिता (५) वाजसेनीय-
संहिता। वाजसेनीय संहिताकी काण्व और माध्यंदिन ऐसी दो शाखाएं हैं। तैत्तिरीय संहिताको
कृष्णयजुर्वेद कहते हैं। धनुर्वेद यजुर्वेदका उपवेद माना जाता है।
यजुर्वेद गद्य पद्यात्मक है। यजुर्वेदके दो ब्राह्मण, दो आरण्यक, और ७ उपनिषद हैं। प्रसिद्ध
ईशावास्योपनिषद् शुक्ल यजुर्वेदका अंतिम ४० वां अध्याय है।
सामवेद-प्राचीन ग्रंथोंको देखनेसे ऐसा लगताहै कि प्राचीन-कालमें इसकी अनेक संहितायें
थीं। अब केवल एक ही संहिता उपलब्ध है। पुनरुक्ति छोड़ दी जाय तो उसमें १५४९ ऋचायें
हैं। इनमेंसे ७५ को छोड़ कर अन्य सभी ऋचाएं ऋग्वेदमें आई हैं।
सामवेद-का अर्थ गानेका वेद ! विद्वानोंका ऐसा एक मत है कि भारतीय संगीतका
प्रारंभ सामवेदसे हुवा है। यज्ञादिमें वेद गानेवालोंको उद्गाता कहनेकी परिपाठी थी। वैसे सामका
प्रस्ताव-प्रारंभ-प्रस्तोता करता है। इसका मुख्य भाग-उद्गीथ-उद्गाता गाता है। और प्रतिहर्ता
उसकी समाप्ति करता है। प्रत्येक ऋचा पर अनेक प्रकारके साम स्वर होते हैं। इन स्वरोंको यदि
वर्तमान भाषामें 'स्वरलिपि' कहा जाय तो संभवतः अत्युक्ति नहीं होगी।
सामवेदमें अनेक छंद हैं। पुरानी पोथियोंको देखनेसे पता चलता है कि सामवेदकी कई
शाखाएँ थीं। किंतु आज केवल दो शाखाएँ उपलब्ध हैं। इन वेद-मंत्रोंको गानेके ३६ प्रकार आज
उपलब्ध हैं। इन वेद-मंत्रोंको गानेके ८ प्रकार हैं। इन्हे (१) जटा (२) माला (३)
शिखा (४) रेखा (५) ध्वज (६) दंड (७) रथ (८) घन ऐसे कहते हैं।
संभव है कि गीता-कालमें सामवेद सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण रहा हो। तभी भगवानने
वेदोंमें साम वेद मैं ऐसे कहा।
अथर्ववेद-यह सामान्य लोगोंका वेद है। इसमें उतनी उदात्तता नहीं जितनी ऋग्वेदादिमें
है। इसमें अभिचार-मंत्र और अभिचार विधि भी है। इसका प्राचीन नाम अथवांगिरस ऐसा
है। इसका अर्थ है अंगिरस-वंशीय अथर्वा-ऋषिका कहा हुवा है। इसका और एक नाम
भृग्वंगिरस भी है। भृगु ऋषि अंगिरस ऋषिके शिष्य थे। अथर्ववेदके प्रचारमें इन भृगु
ऋषियोंका बडा महत्व है।
साथ साथ अथर्ववेदको क्षात्र-वेद कहनेकी भी परिपाठी है। अथर्व वेदमें यज्ञोपयुक्त भाग
अत्यंत अल्प है। अथर्व-वेदको पुरोहितोंका वेद भी कहते हैं। पहले अथर्ववेदके अध्ययन किये
ज्ञानेश्वरी ४५

हुए ब्राह्मणको ही पुरोहित बनानेका नियम था । प्राचीन पोथियोंमें लिखा है "जिस राज्यमें
अथर्ववेत्ता रहता है उस राज्यमें सभी उपद्रव शांत होते हैं।" राजनीति और युद्धोंमें ऐसे
पुरोहितोंका बड़ा महत्त्व रहता था । अथर्व-वेदमें "राजकर्माणि" ऐसा एक बड़ा सूक्तसंग्रह है।
इन सबका कर्माधिकार राजपुरोहितका होता है।
इस वेदकी नौ शाखाएँ आज उपलब्ध हैं। अथर्व-वेदमें २० कांड और करीब ६०००
मंत्र हैं । अलग अलग शाखाओंकी मंत्र-संख्या अलग अलग है। इसका एक बड़ा अंश
ऋग्वेदसे लिया गया है।
यह अग्नि उपासकोंका वेद ? है। इसमें आयुर्वेदके बीज भी देखनेको मिलते हैं।
इसमें कुछ रोग और उसकी चिकित्साका विधान है। इसमें राष्ट्रीयता, सेना, शस्त्रास्त्र, सेना
संचालन आदिका भी विवेचन है। साथ साथ कृषि गोपालन आदिका भी वर्णन या नियमादि हैं ।
अथर्व-वेदका एक ब्राह्मण और तीन उपनिषद हैं। आयुर्वेद, सर्पवेद, पिशाचवदे, असुरवदे
आदि इसके उपवेद माने गये हैं ।
गीता अ० १०, श्लो० २२-देवों में देवराज मैं-
देवराज-इंद्र ऋग्वेदका प्रधान देवता है। ऋग्वेदमें इंद्र पर सबसे अधिक सूक्त हैं। इंद्रके
तीन रूप हैं । आकाशस्थ इंद्र देवता । शरीरस्थ इंद्र बुद्धि । इंद्रका मानवी रूप-सामाजिक-राजा ।
वैदिक ऋषियोंका यह राष्ट्रीय देवता है । इंद्र दस्युओंका शत्रु है।
इंद्रका जन्म-वेदमें इंद्रके माता-पिताका पर्याप्त वर्णन होने पर भी उसका स्पष्ट उल्लेख नहीं
मिलता। एक स्थान पर इंद्रके पिताका नाम "द्यु" मान कर माताका नाम "पृथ्वी" कहा है ।
एक स्थान पर इंद्र-जन्मके विषयमें अलंकारिक भाषामें कहा गया है । कहीं कहीं "बवंडर आया
और जन्म हुवा !" ऐसे कहा गया है। जहां आकाशको इंद्रका पिता कहा गया है वहीं इंद्रके
जन्मके साथ आकाश कांप उठनेका उल्लेख है। इंद्रके क्रोधसे आकाश कांप उठता है । पृथ्वी कांप
उठती है । एक मंत्रमें कहा गया है "इंद्र अपने माता-पिताकी पर्वाह नहीं करता ।" "वह अपने
माता-पिताको त्रस्त करता है।" बवंडरके समय भी तो पृथ्वी और आकाश त्रस्त होते हैं ! संभवतः
इसीका यह वर्णन है। सभी ऋचाओंका सर्व-सामान्य अर्थ लिया तो बवंडरका सुंदर और भीकर
वर्णन देखनेको मिलता है । इंद्र-जन्मका जितना अधिक अध्ययन किया जाय उतना वह अधिक
दुर्बोध होता जाता है ।
एक स्थान पर इंद्रका मानवी स्वरूप देखनेको मिलता है। "इंद्रके जन्म-समयमें उसके
चारों ओर चार दासियां एकत्र हुईं !" "इंद्रने जन्मते ही सोमपान किया !" "देवियोंने उसको
पालनेमें झुला झुला कर उसके पराक्रमको जगाया !" एक स्थान पर इंद्र स्वयं कहता है "मेरे पिताने
मुझे अशत्रु निर्माण किया।" "एक वीर-पत्नीके गर्भसे एक वीर पुत्रका जन्म हुवा" इंद्र सोमपानसे
मत्त होकर झूमता हुवा बड़बड़ाता जाता है। फिर भी वेदके गहरे अध्ययन करनेवाले कहते हैं कि
इंद्र बवंडरकी देवता है।
इंद्रके शत्रुगण-इंद्रके साथ लड़नेवाले सबके सब "वर्षा चुराने वाले" हैं । (१)
अर्बुद-एक मंत्रमें कहा गया है । "तूने उस गंदे अर्बुदको कुचल डाला ।" अर्बुदके पहाड़ोंसे
४९ परिशिष्ट ३

गायोंको मुक्त किया।” (२) अहि-अहिका अर्थ दैत्य अथवा सर्प है। अनेक विद्वानोंने अहिको
वृत्र कहा है जो इंद्रका सबसे बड़ा शत्रु है। (३) श्वघ्न-दो तीन बार इसका वर्णन आया है।
कहा गया है “इंद्रने इसका निवासस्थान उध्वस्त किया।” “इंद्रने सूर्यको उदय होनेको कह
कर इस लोभीका संहार किया।” (४) इलीविश-केवल एक बार इसका उल्लेख है। “इंद्रने
इसको धूलमें मिला दिया।” इसको “पानीको रोकनेवाला” कहा है। (५) कांरज-यह सदैव
वृत्रके साथ रहता है। इंद्रने इसका दो बार पराजय किया। (६) कुयव-यह शब्द विशेषण
बनकर कई बार आया है। कुछ विद्वानोंने इसका अर्थ “बुरा बोलनेवाला” ऐसा किया है। तो
कुछ विद्वानोंने इसका अस्वीकार किया है। (७) निमुचि-पाणिनीने इसका अर्थ वर्षा न होने देने
वाला ऐसा किया है। इंद्रने इसका सिर उड़ाया था। (८) नववास्त्व-कई बार इस का नाम आया
है। “जिसका वसति-स्थान नया वह” एक स्थान पर इसका उल्लेख “बृहद्रथ” इस नामसे आया
है। इंद्रने इसके रथ और इसके टुकड़े टुकड़े कर दिये। (९) पणि-सदैव यह गायोंको भगाकर
छिपा देता है। अथर्वन् अंगीरसकी प्रेरणासे इंद्रने इसको मारा। (१०) विमृ-इसको “कानून
तोड़नेवाला” कहा गया है। साथ साथ यह विशालकाय है। शुष्ण और शंबरके साथ लड़ने आता
है। इंद्रने इसको मारा है। (१०) वर्षिन्-यह सदैव शंबरके साथ है। इसके साथ इसकी एक
खास सेना है। इसको भी इंद्रने मारा है। (११) वल-वलका अर्थ गुफा है। यह सदैव गुफामें
रहता है। इंद्रने इसको तोड़कर पणीका संहार किया। एक स्थान पर “बृहस्पतिने वलका स्थान
दिखाया” ऐसा उल्लेख है। (१२) शंबर-वाजसेनीय संहितामें इसको दैत्याधिपति कहा गया है।
वेदमें इसको दास कहा गया है। इसको कौलीत्तर अथवा कुलत्तरका लड़का कहा गया है। पाश्चात्य
विद्वानोंका मत है कि यह किसी आर्येतर जाति-कुलका नाम होगा। इंद्रने “दूसरे राक्षसके साथ
शंबरका वध किया” है। “शंबर पर्वत पर रहता है चाहे वह पृथ्वी पर रहता हो अथवा अंतरिक्षमें
बादलों पर रहता हो !” एक स्थान पर लिखा गया है “शंबर अपनेको देव मानता था !”
पर्वतों पर इस शंबरके १०० किले थे। इसका अंतिम किला रातको गिरा। शंबरको
मारनेके लिये इंद्रको ४० वर्ष लगे। इतने दिन तक इंद्र शंबरको खोजता रहा। कई विद्वानोंने
इसका ऐसे अर्थ किया “४० वर्ष तक बवंडर चलता रहा।” वस्तुतः शंबरका मुख्य शत्रु
दिवोदास है। दिवोदास इंद्रका भक्त है। अश्विनीने इस काममें सहायता की है। १३ शुष्ण,
१४ स्वर्भानु आदि ४० इंद्र-शत्रुओंका नाम मिलता है जिन्हें इंद्रने मारा है। वैदिक ऋषि पुनः
पुनः प्रार्थना करके इंद्रको “पराक्रम करनेकी प्रेरणा” देते हैं। इंद्रसे लड़नेवाले सभी “वर्षाको
रोकते हैं गायको छिपा देते हैं!” इंद्रसे जब जो युद्ध हो कर इंद्र शत्रुको मारता है तब
“सदैव उषा और सूर्य आकाशमें प्रस्थापित होते हैं!” विद्वानोंकी यह मान्यता है “वातावरणके
नैसर्गिक संघर्षको मानवी-युद्धका रूप देकर अवकर्षणायदि राष्ट्रीय आपत्तियोंको दूर करनेवाले इंद्रको
राष्ट्र-पुरुष मानकर आर्योंने राष्ट्रीय भावनाका उदय और पोषण किया है।” इससे “राष्ट्र-हितके
लिये अपना जीवन उत्सर्ग करनेका भाव भर दिया है।” “वृत्र” इंद्रका महान् शत्रु है।
इंद्र-वृत्र-युद्ध मानो सृष्टि चमत्कारोंका सुंदर सजीव वर्णन माना जाता है। इसमें ऋषियोंकी
काव्य-प्रतिभाका सजीव दर्शन होता है। (१) वृत्र गायोंको भगाने (२) सूर्यको छिपाने
(३) सूर्योदय रोकने (४) वर्षाको रोकनेका “पराक्रम” करता है। वृत्र वराह-भक्षी है।
शीघ्रगामी है। त्रसका वर्णन बादलोंके आकारोंका वर्णन है। मत्र कुहरेमें छिपकर बैठ जाता है।

  • ज्ञानेश्वरी ५०

कुहेरेको लपेट कर आक्रमण करता है। गडगडाहटसे इंद्रको डरानेका प्रयास करता है। इससे
देव भाग जाते हैं किंतु इंद्र अपना स्थान नहीं छोड़ता। इंद्रके वज्र प्रहारसे विश्व कांप उठा। वृत्र
मर गया। ऊपरका वर्णन इंद्रका स्वरूप समझनेके लिये पर्याप्त है। इंद्र आर्योंके आत्म-विश्वासकी
जीती जागती मूर्ति है। इंद्रके पराक्रमका फल प्रकाश है। इंद्रके युद्धारंभ सदैव अंधकारमें होते
हैं। तमावरणमें वह शत्रुको मारता है। उसके बाद आकाशमें उषा और सूर्यकी प्रस्थापना होती
है ! इस लिये “ इंद्र शिवः सखा” है। वैदिक ऋषि उससे “न्याय, सामर्थ्य, तेज, दिगंतकीर्ति,
और ऐश्वर्य” मांगते हैं।
इंद्र भी कहता है “मैंने ही यह भूमि आर्योंको दी है।” इसलिये वह आर्योंका राष्ट्र-
पुरुष है। इस पर १९९ सूक्त हैं।
ऊपर वैदिक इंद्रका वर्णन है। पुराणोंमें प्रत्येक मन्वंतरोंमें एक इंद्र होता है। सौ यज्ञ सांग
करनेवाला इंद्र-पद पाता है। प्रजा-संरक्षण इसका मुख्य कार्य है। असुरोंमेंसे हिरण्य-कश्यपु, प्रल्हाद,
और बलि इन तीनोंने इंद्र-पद प्राप्त किया है। इससे इंद्र-पदकी राजनैतिक स्थितिका बोध
होता है। त्रिशंकु, वसिष्ठ, विश्वामित्र, वामदेव, रोहित, गौतम, गृत्समद, भारद्वाज, सोम, इंदुल,
अर्जुन आदिके जीवनमेंसे भी इंद्र-पदका राजनैतिक रूप स्पष्ट होता है।
इंद्र कश्यप और अदितिका पुत्र। देवोंका राजा। वर्षाका देव। इंद्र-पद प्राप्तिके लिये किये
जानेवाले यज्ञ नष्ट करना तपोभंग करना इसका काम। हिरण्यपुत्र महाशलिने इसको जीता है।
वरुणने इसको बंधन-मुक्त किया। ऐरावत, कल्पवृक्ष, अमृत आदि पर इसका स्वामित्व। गरुडने
एक बार इससे लडकर अमृत ले लिया। फिर गरुडके कहनेसे इंद्रने चालाकीसे यह पुनः
पालिया। नहुष-मानव-भी एकबार इंद्र बना था! पुराणोंमें इंद्र प्रथम-स्थानका देवता नहीं है।
यह अंतरिक्षमें पूर्व दिशाका स्वामी है। इंद्रने कई बार कई लोगोंसे मार खाई है। कई लोगोंके
शापसे भ्रस्त हुआ है। इसका निवासस्थान स्वर्ग। अमरावती इसकी राजधानी। इसका राजप्रासाद
वैजयंत। बाग नंदनवन। वाहन ऐरावत। हत्यार वज्र। घोडा उच्चैः श्रवा। रथ विमान। सारथी
मातली। धनुष्य शक्र। तलवार परंज।
गीता अ० १०, श्लो० २२-मन हूं मैं इंद्रियोंमें-
अपने अपने विषयोंको ग्रहण करना इंद्रियोंका काम है। त्वचा, चक्षु, श्रोत्र, जिव्हा, घ्राण,
ये पांच ज्ञानेंद्रिय हैं। इनके विषय हैं स्पर्श, रूप, शब्द, रस, गंध। बिना इंद्रियोंके अन्य किसी
साधनसे विषयोंका ज्ञान होना असंभव है। इन्ही इंद्रियोंसे शीतोष्ण सुख दुःखादिका बोध
होता है। इंद्रिय शरीरसे संयुक्त अतींद्रिय और ज्ञानका कारण है। इन पांच ज्ञानेंद्रियोंको
बहिरिंद्रियां कहते हुए मनको अंतरिंद्रिय कहा गया है। मनको अणुपरिमाण और हृदयके भीतर
रहनेवाला अर्थात् अंतःकरण कहा गया है। बाह्य पांच ज्ञानेंद्रियोंके साथ पांच कर्मेंद्रियां भी
होती हैं। हाथ, पैर, गुदा, शिश्न, और वाचा ये पांच कर्मेंद्रिय हैं। ये पांच अपना अपना कर्म
करती हैं। इन पांच ज्ञानेंद्रिय और पांच कर्मेंद्रियों पर मनका स्वामित्व है। ये इंद्रिय मनुष्यको
बाह्य विषयोंका ज्ञान कर देती हैं। बाह्य कर्म करती हैं किंतु अंतर्विषयको ज्ञानके लिये आंतरिक
कर्मके लिये इनकी आवश्यकता नहीं होती। अंतःकरण या मनके द्वारा आंतरिक ज्ञान सुख दुःखादि
होता है। वेदांतियोंके मतानुसार वह दर्पणके समान होता है।
५१ परिशिष्ट ३

सांख्यमतके अनुसार इंद्रिय ग्यारह हैं। पांच ज्ञानेंद्रिय, पांच कर्मेंद्रिय, एक मन। मन
इंद्रियोंसे अलग न माननेसे इंद्रियोंमें मन कहा गया है।
गीता अ० १०, श्लो० २२-चेतना भूत मात्रमें-
जो कुछ चराचर पदार्थ है उसमें जो स्मृति, बोध, सुख, या संज्ञा है, वह चेतना है।
प्रकृतिमें जो कुछ है उसमें जो तत्त्व है, जिस तत्वसे जिस किसीका अस्तित्व है वह चेतना है।
चेतना अथवा चैतन्यका केवल अस्तित्व है। आकार प्रकार रंग रूप नहीं। केवल एक बोध है,
जो इंद्रियातीत है, उसको दिखा नहीं सकते। बता नहीं सकते। कह नहीं सकते। जिसमेंसे
"मैं" का स्फुरण होता है "मैं" का बोध होता है और स्मृति रहती है, वह चेतना है।
वह चैतन्य सर्व-व्यापी है। भूतमात्रोंमें है।
गीता अ० १०, श्लो० २३-रुद्रोंमें मैं सदाशिव-
रुद्र-एक वैदिक देवता। ऋग्वेदमें इस पर तीन सूक्त हैं। वेदका रुद्र बडा शक्तिशाली,
पराक्रमी, शत्रुओंको मारनेवाला है। वह अत्यंत भयप्रद है। जटाधारी है। बलिष्ठोंमें बलिष्ठ है।
वज्रबाहु है। चिर-तरुण है। त्रिशूल इसका आयुध है। यह त्रिनेत्र है। इसका पेट काला और
पीठ लाल है। इसका धनुष्य शक्तिशाली होता है। ऋग्वेदमें इसको क्रूर कहा है। यह संहारक
है। ज्वर पैदा करनेवाला है।
रुद्र रोग हरणमें कुशल है। श्रेष्ठ वैद्य है। देवोंसे भी रक्षा करनेके लिये ऋषि इससे
प्रार्थना करते हैं। ऋग्वेदके रुद्र-सूक्त देखनेसे "सदैव प्रेम-वर्षा करनेवाली माँकी लाल आंखें
देख कर- "माँ ! आंख मत दिखा, प्यार कर" कहनेवाले बालकका दर्शन होता है।
किंतु पौराणिक रुद्र कश्यप और सुरभिके पुत्र हैं। अलग अलग पुराणोंमें इनके विषयमें
अलग अलग बातें हैं। रुद्र ग्यारह हैं। इनको एकादश रुद्र कहा जाता है। इनके नामके
विषयमें भी एक-वाक्यता नहीं है। अलग अलग पुराणोंमें अलग अलग नाम हैं। महाभारतके
आदि पर्वमें : (१) मृगव्याध (२) सर्प (३) निर्ऋति (४) अजैकपाद (५) अहिर्बुध्न्य
(६) पिनाकी (७) दहन (८) ईश्वर (९) कपाली (१०) स्थाणु (११) भव ऐसे
नाम दिये हैं। किंतु महाभारतके शांति पर्वमें (१) अजैकपाद (२) अहिर्बुध्न्य, (३) विरूपाक्ष
(४) रैवत (५) हर (६) बहुरूप (७) त्र्यंबक (८) सुरेश्वर (९) सावित्र (१०)
जयंत्य (११) पिनाकी है। किंतु ये नाम प्रसिद्ध हैं। (१) भूतेश (२) नीलरुद्र (३) कपाली
(४) वृषवाहन (५) त्र्यंबक (६) महाकाल (७) भैरव (८) मृत्युंजय (९) कामेश
(१०) योगेश (११) शंकर।
शंकर-कश्यप और दनुका पुत्र। कैलासवासी, त्रिनेत्र। दक्षने इसे अपनी कन्या दी थी।
दक्ष यज्ञमें इसने दक्षका संहार किया। समुद्रमंथनसे जो हलाहल विष निर्माण हुआ उसको इसने
लोक-कल्याणार्थ पी लिया। इससे इसका गला नीला हो गया। इसीलिये इसको नीलकंठ कहते
हैं। हालाहल विषके तापसे बचनेके लिये इसने जटामें चंद्र धारण किया। इस शंकरको शिव भी
कहते हैं। शिवकी उपासना करनेवाले शैव। भारतीय संस्कृतिमें शैव-दर्शनका अत्यंत महत्त्वका
स्थान है। अनेक पुराणोंमें शंकरकी कथाएँ हैं अथवा अनेक शैव-पुराण हैं। यह सदैव देवोंकी
ओरसे दैत्योंसे लडने आया है !
ज्ञानेश्वरी ५२

गीता अ० १०. श्लो० २३-कुबेर यक्ष-रक्षोंमें—
यक्ष—देवयोनिकी एक जाति। विद्याधरोंके निवासके निम्न भागमें मेरु पर्वत तक, जहां तक
हवा चलती है यक्षोंका वास है। इन यक्ष-गणोंका स्वामी कुबेर है।
कुबेर—पिताका नाम विश्रवा ऋषि। माताका नाम इडविडा अथवा मंदाकिनी। मांके
नामके विषयमें मतभेद है। इडविडा विश्रवा ऋषिकी पत्नी है या माता ऐसा भ्रम होता है।
ब्रह्माने इसको राक्षसगणोंके साथ लंका, पुष्पक विमान, यक्षोंका आधिपत्य, धनेशत्व, लोकपालत्व
और रुद्रकी मित्रता दी थी।
रावण इसका सावत्र बंधु। रावणने इससे लड़कर लंका और पुष्पक विमान छीन लिया
फिर यह उत्तराधिपति बना। अलका इसकी राजधानी। मणिग्रीव और नलकूबर इसके पुत्र।
इसको उत्तराधिपति कहा गया है। यह उत्तरके यक्ष लोगोंमें रहता है। ऋद्धि और सिद्धि इसकी
शक्तियां हैं। मणिभद्र, पूर्णभद्र, मणिमत्, मणिकंधर मणिमूस, मणिस्रग्विन्, मणिकामुखधारक
ये यक्ष इसके सेनापति हैं। कुबेर-सभा इसकी राज्यसभा है। गंधमादन पर्वतकी संपत्तिका
चौथा हिस्सा इसके आधीन है और केवल सोलहवा हिस्सा मनुष्योंको मिला है। मेरु पर्वतके
उत्तरमें विभावरी इसका वसति-स्थान है। इसका वन सौगंधिक है। जिस किसी राज्यमें ब्राह्मण
और क्षत्रियोंकी एकता रहती है उस राज्यका विकास होता है। ऐसा राज्य सुखी रहता है। यह
कुबेरका राजनैतिक सिद्धांत है जो इसने मुचकुंदको कहा था !
गीता अ० १०. श्लो० २३-अग्नि मैं वसु वर्गमें—
वसु—वैवस्वत मन्वंतरकी दक्ष-कन्या वसुके आठ पुत्र वसु संज्ञक देव हैं। इन अष्ट-वसु
ओंका नाम अलग अलग पुराणोंमें अलग अलग है।
पद्मपुराणमें—धर, ध्रुव, सोम, आप, अनिल, अनल, प्रत्यूष, प्रभास। भागवत पुराणमें—
द्रोण, प्राण, ध्रुव, अर्क, अग्नि, दोष, वसु, विभावसु ऐसे दिये हैं इसमें पावक।
अग्नि—अग्निका अर्थ करते समय ॥ सदैव ऊपर उठता है वह ॥ ऐसे किया गया है। अग्नि
वैदिक देवता भी है किंतु यहां वसुके अग्निका विचार करना है। धर्म-और वसुका पुत्र अग्नि,
इसकी पत्नी वसोर्धारा। द्रविणक पुत्र।
अग्नि अनेक मिलते हैं किंतु अष्टवसुओंमें जो अग्नि है उसकी इससे अधिक जानकारी नहीं।
गीता अ० १०. श्लो० २३-मेरु मैं गिरिमालामें
भारतके प्राचीन ग्रंथोंमें जगह जगह पर मेरु पर्वतका वर्णन आता है। किंतु इसकी भौगोलिक
जानकारी नहीं मिली।
किंतु स्वर्गारोहणपर्वमें लिखा गया है कि पांडव मेरु-पर्वत पर जाने निकले। वे हस्तिनापुरसे
पूर्वकी ओर चले। अनेक देशोंसे प्रवास करते करते समुद्रके किनारे गये। वहां समुद्र पार करके
हिमवत् पर्वतके उस पार जो मेरु शिखर था वह चढ़नेके लिये उसके पास आये। मेरु शिखरको
वंदन करके उस पर चढ़ने लगे। मेरु शिखर पर चढ़ते समय प्रथम द्रौपदीका पतन हुआ।
५३ परिशिष्ट ३

धर्मराज युधिष्ठिर और उसका एक कुत्ता छोड़कर और सबका पतन मेरुशिखर चढ़ते
समय ही हुवा ।
मेरुशिखर चढ़नेपर स्वर्ग आया ।
इस वर्णनसे भी मेरुशिखरके विषयमें-उसकी भौगोलिक स्थितिके विषयमें कहने जैसी कोई
जानकारी नहीं हुई ।
गीता अ० १०. श्लो० २४-बृहस्पति मुझे जान पुरोहित प्रधान जो—
पुरोहित—प्राचीन कालमें राजाके राजकाज और धर्मकार्यमें आवश्यक सहायता और
पथप्रदर्शन करनेवाले प्रमुख ब्राह्मणको पुरोहित कहा जाता था । यह पुरोहित राजाका शिक्षक,
अंतरंग-मित्र, तथा पथप्रदर्शक होता था । ऋग्वेदमें ऐसे अनेक पुरोहितोंका उल्लेख मिलता है ।
दिवोदास भरत-वंशका प्रसिद्ध राजा । ग्रीकके इतिहासमें फिलिप और अलेक्झांडरका जो
स्थान है वही स्थान भारतके प्राचीन इतिहासमें दिवोदास और सुदासका है ।
भरद्वाज दिवोदासका महान और कुशल राजपुरोहित था । शंबर दिवोदासका शत्रु ।
भरद्वाजने शंबरके विरुद्ध इंद्रकी शक्ति दिवोदासके पीछे खड़ी की ।
वैसे ही वरशिखाभोंसे पराजित, साधन हीन अभ्यवर्तिन् और प्रस्तोक भरद्वाजको पुरोहित
बननेकी प्रार्थना करते हैं। भरद्वाज पुरोहित बन कर पथ-प्रदर्शन करता है। दोनो शक्तिसंपन्न
होकर वरशिखाभोंको पराजित करते हैं।
ऋग्वेदमें भरद्वाजकी भांति, श्रुतबंधु, कवष, प्रियमैध, वामदेव, कक्षीवान आदि पुरोहितोंके
कर्तृत्वका उल्लेख है ।
वैसे ही विश्वामित्र और वसिष्ठ । दोनों सुदासके पुरोहित । सुदास दिवोदासका पुत्र ।
विश्वामित्रके पथ-प्रदर्शकत्वमें अश्वमेध यज्ञ करता है। इसमें अनेक राजा पराजित हो जाते हैं।
पराजित राजा सब एक होकर सुदास पर आक्रमण करते हैं । तब पुरोहित वसिष्ठ ! वसिष्ठके
पथप्रदर्शकत्वमें नौ राजाओंसे - जो एक साथ संगठित होकर आक्रमण करते हैं-लड़कार जीतता है ।
दोनों ओरकी सैन्य शक्ति देख कर आश्चर्य होता है । वेदमें “मेढने सिंहकी शिकार किया" इन
शब्दोंसे इस युद्धका वर्णन किया है ।
आगे, न्यायदानमें भी पुरोहित सहायता देता था । कौटिलीय अर्थशास्त्रमें भी
राज-पुरोहितके कर्तव्य, योग्यता, अधिकार आदिका उल्लेख है। कौटिलीय स्वयं एक प्रकारसे
पुरोहित था ।
शुक्र जैसे दैत्योंका पुरोहित था वैसे बृहस्पति देवोंका पुरोहित था। राजा, मान्य, विद्वान, व
नीतिसंपन्न ब्राह्मणोंको सम्मानपूर्वक बुलाकर अथवा उनके पास जा कर पौरोहित्य स्वीकार करनेकी
प्रार्थना करते थे ।
बृहस्पति- बृहस्पति इस पुरोहित-वर्गका श्रेष्ठतम पुरोहित थे। बृहस्पति शब्दका अर्थ
वाचस्पति-वाचाका पति अथवा महान तपोघन । बृहस्पति सूक्त द्रष्टा ऋषि हैं । बृहस्पति युद्ध
विशारद भी हैं। धनुष्य, बाण, स्वर्ण, परशु इसके हत्यार हैं । ये अत्यंत पराक्रमी थे। इनके
रथके घोडे लाल होते थे । ये अत्यंत चरित्रवान् सुद्याचरणी तथा परोपकारी थे। बृहस्पतिने इंद्रको
ज्ञानेश्वरी ५४

राज-धर्म सिखाया था। प्राचीन धर्मशास्त्र, नीतिशास्त्र तथा अर्थशास्त्र पर इनके ग्रंथ हैं। अन्य
अनेक शास्त्र ग्रंथोंमें इनके नाम देखनेको मिलते हैं।
गीता अ० १०, श्लो० २४—स्कंद सेनाधियोंमें मैं—
स्कंद—देवोंका सेनापति । शंकर-पार्वतीका पुत्र । स्कंदके जन्मके विषयमें अनेक प्रकारकी
जनश्रुतियां हैं। इसकी स्त्री देवसेना। महादेवके वरप्रसादसे डम्पत्त बने हुए तारकासुरका इसने
वध किया। तारकासुरने देवोंको अत्यंत कष्ट दिये थे। केवल तारकासुरके नाशके लिये इसका जन्म
था। तारकासुरसे युद्ध करनेसे पूर्व देवोंने क्रौंच पर्वत पर इसका सेनापत्याभिषेक किया था। इसने
विश्वकी स्त्री अपनी माताके समान मान कर व्रत लिया। विश्वामित्रने इसका उपनयन संस्कार किया।
विष्णूने इसको वाहन दिया। वायुने ध्वज दिया। सरस्वतीने वीणा दी।
गीता अ० १०, श्लो० २५—भृगु मैं ऋषिवृंदमें—
ऋषि—इस शब्दकी उत्पत्तिका विचार किया जाय तो “उत्तमतापूर्वक गतिमान होना”
ही ऋषि शब्दका अर्थ है। “दैवी स्फुरणसे स्फूर्त” अर्थात् ऋषि। यह अत्यंत प्राचीन शब्द है।
वैदिक युगका शब्द है।
ऋग्वेदमें सौसे अधिक बार इस शब्दका उल्लेख आया है। किंतु ऋग्वेदके सभी भाष्यकारोंने
ऋषिका अर्थ “मंत्रदृष्टा” ऐसा किया है। ऋग्वेदमें एक जगह “ज्ञानघन अग्नि अत्युत्तम
नियामक ऋषि” होनेकी बात कही है। ऋग्वेदमें जिन्हे ऋषि कहा गया है उनकी ओर देखनेसे
ज्ञानी, प्रतिभा संपन्न, कवि, तथा तप-सामर्थ्य भी इनका लक्षण दीखता है।
किंतु कोई भी ऋषि संन्यासी नहीं दीखता। सभी संसारी हैं। उद्देश्य पूर्वक-विश्वहितार्थे
राजनीतिमें भी वे उतरते हैं। वे योद्धा भी होते हैं। इनमें कई धनुर्वेदके अर्थात् धनुर्विद्याके अच्छे
जानकार हैं। सर्वत्र सामाजिक तथा राजनैतिक उथल पुथलमें ऋषि-प्रेरणा और कर्तृत्व दीखता है।
वे सभी प्रकारके कौटुंबिक सुखकी अपेक्षा भी करते हैं।
वेदकाल, ब्राह्मणकाल, उपनिषदकालमें ऋषि-जीवनका जो दर्शन होता है, जो स्वभाव धर्म
दीखता है उसमें भिन्नता है। वेदकालसे लेकर जनमेजयके कालतक ऋषि दीखते हैं। किंतु नंद,
गुप्त, शृंग आदि कालमें ऋषि नहीं दीखते। संभवतः जनमेजयके कालमें ही ऋषि परंपरा समाप्त हुई।
इन प्राचीन ऋषियोंमें (१) भृगु (२) मरीचि (३) अत्रि (४) अंगिरा (५) पुलहः
(६) क्रतु (७) मनु (८) दक्ष (९) वसिष्ठ (१०) पुलस्ति इनको महर्षि कहा गया है।
कुरुयुद्धके कालमें व्यास महर्षि थे।
भृगु—सर्व प्रथम भृगुको अग्नि मिला। प्रजापतिके रेतसे आदित्य, भृगु और अंगिरस
उत्पन्न हुए। दक्ष-यज्ञमें भृगु था। यज्ञ-विध्वंसमें भृगुकी दाढी जली! दक्षकन्या-ख्याती भृगुकी
पत्नी। शंकर इसका साडू। धातृ, विधातृ इसके दो लडके और लक्ष्मी लडकी। भृगु दैत्य गुरु।
भृगु-पत्नीने देवोंसे युद्ध किया था। विष्णुने सुदर्शनसे भृगु-पत्नीका वध किया और भृगुने
विष्णुको “गर्भजन्म दुःख भोग” का शाप दिया। नहुषने जब सप्त-ऋषियोंको अपने रथको जोडा
तब भृगुने ही उसको शाप देकर इंद्र पदसे पदभ्रष्ट किया था।
५५ परिशिष्ट ३

दिव्या भृगुकी दूसरी पत्नी । दिव्यासे १२ देव बने । इनके नाम पर भृगुस्मृति, भृगुगीता,
भृगुसंहिता, भृगुसिद्धांत, भृगुसूत्र आदि ग्रंथोंका उल्लेख है। यह गोत्रकार ऋषि है ! भृगुकुलोत्पन्न
सब भार्गव कहलाते हैं ।
गीता अ० १०, श्लो० २५-मै एकाक्षर वाणीमें—
उपनिषदोंमें ब्रह्मको प्रणव अर्थात् ओं अथवा ॐ कहा है ।
गीता अ० १०, श्लो० २५-जप हूं सब यज्ञोंमें—
यज्ञ—अपनी इच्छानुसार अग्नि-प्रज्वलित करनेका शोध मानवी इतिहासमें अत्यंत
महत्त्वका शोध है । संभव है कि यही मानवी-बुद्धिका सर्व-प्रथम सफल प्रयोग हो । इसलिये विश्व-
संस्कृतिके इतिहासमें, विश्वकी प्रत्येक संस्कृतिके साहित्यमें अग्निकी उत्पत्तिकी कहानियां देखनेको
मिलती हैं । अग्निके विषयमें कृतज्ञता प्रकाशन है ।
अग्नि-स्तवनसे ही भारतीय साहित्यका उगम है “ अग्निमीळे पुरोहितं ” भारतीय साहित्यका
आद्य-चरण है। ऋग्वेदमें अग्निके करीब २०० सूक्त हैं। इन सूक्तोंको देखनेसे लगता है “ देवोंमें
अग्नि मृदुहृदय ” है । वह अन्य सभी देवोंका प्रतिनिधि है । वह देवोंके पास मानवोंका प्रतिनिधि
है । ऋषि अग्निद्वारा अन्य देवोंको आवाहन करते हैं । अग्निद्वारा अन्य देवोंका यजन करते हैं ।
वहां “ अग्निर्वै सर्वे देवताः ” है । इसलिये “ सभी देवताओंके संतोषके लिये अग्निमें आहुति
देना यज्ञ ” माना जाने लगा । ऋग्वेदमें अनेक जगह पर ऐसे विचार मिलते हैं । “ अग्निकी
सहायताके बिना मनुष्यको किसी भी प्रकारका सुख नहीं मिल सकता !” इसलिये “ यज्ञ-मानव-
कुलके सभी सुखका साधन ” बन गया ।
यज्ञ जब मानव-कुलके सभी सुखका साधन बन गया तब यज्ञ-संस्थाका विकास और
विस्तार होना स्वाभाविक था । पुराने ग्रंथोंको देखनेसे ऐसे लगता है कि “ यज्ञको केंद्र बनाकरही
वैदिक संस्कृतिका विकास और विस्तार किया गया !”
इन यज्ञोंमें नित्य, दिनमें दो बार करनेके अग्नि-कार्यसे लेकर साल साल चलनेवाले यज्ञ-सत्र
तक अनेक कारणोंसे, अनेक प्रकारके यज्ञ कहे गये हैं । जैसे—प्रजाकी वृद्धिके लिये, प्रजाके सुखके
लिये, युद्धमें जीतनेके लिये, एकछत्र सम्राट होनेके लिये, सामर्थ्य-वृद्धिके लिये, आयुष्य-वृद्धिके
लिये, शक्ति-प्राप्तिके लिये, समाजमें प्रतिष्ठा प्राप्त करनेके लिये, किसी भी महान्-सिद्धांतकी
प्रतिष्ठाके लिये, प्रायश्चित्तके लिये, शत्रु-नाशके लिये, शांतिके लिये, रोगोंसे बचनेके लिये,
दीर्घायुष्यके लिये, सभी इच्छाओंकी पूर्तिके लिये, संतान प्राप्तिके लिये, ऐश्वर्य प्राप्तिके लिये, ग्रह-
शांत्यर्थ, वर्षाके लिये, अन्न प्राप्तिके लिये, षोडश संस्कारों में, ऐसे अनेकानेक कारणोंसे अग्निष्टोम,
सोमयाग, पंचमहायज्ञ, अश्वमेध, राजसूय, साकं प्रस्थाइयज्ञ, दाक्षायणयज्ञ, अनेक प्रकारके कामेष्टि-
काम्ययज्ञ-पुत्र कामेष्टि-धन कामेष्टि, यश कामेष्टि, आदि-वाजपेययज्ञ, आप्तोर्याम यज्ञ, पंचशारदेय
यज्ञ, विद्यापराधयज्ञ, ऐसे कुछ ४०-४१ प्रकारके यज्ञ हैं ।
यह यज्ञ-प्रक्रिया वेद-कालसे लेकर अर्थात् ई. पू० चार छ हजार वर्ष से लेकर आज तक अखंड
चली आ रही है। इन यज्ञोंमें, विधि विधानोंमें की जानेवाली व्यवस्थामें, यज्ञ-संस्थाके “ अनुशासनका
परमोच्च आदर्श ” का दर्शन होता है । यज्ञके कर्म-कांडके विधि-विधानोंमें पाये जानेवाले छोटी
ज्ञानेश्वरी ५६

छोटी बातोंका ब्यौरा उनकी सूक्ष्म-दृष्टिका तथा स्पष्ट विचारोंका परिचायक है। वहां दर्भोके
टुकडे, हवन सामग्री, आहुति देनेवाले चम्मच, आचमनादिके उपकरण, कहां, कैसे, किस ओर,
किस वस्तुके, कितनी दूर रखना चाहिए आदिका भी स्पष्ट संकेत है। वैसे ही किस यज्ञकी आहुतिके
लिये कौनसा हवि चाहिए, ? वह, कहां, कैसे, किसके, किस आकार प्रकारके बर्तनमें, किस
प्रकारकी अग्नि पर, किन मंत्रोंको कहते हुए पकाना चाहिए इसका भी विवेचन है। किस प्रकारके
यज्ञमें कैसी समिधायें होनी चाहिए ? यज्ञमें घीकी आहुति देनेवाले चम्मच कैसे होने चाहिए ?
वह किस धातुके अथवा किस लकडीके होने चाहिए ? आदि सविस्तर जानकारी वेदोत्तर
कालमें लिखे गये ब्राह्मण-ग्रंथोंमें देखनेको मिलती है। आजकलके कुछ विद्वान विचारक
ब्राह्मण ग्रंथोंके विषयमें "अलग अलग यज्ञोंके विधिविधानोंका विस्तार पूर्वक वर्णन करनेमें ब्राह्मण-
कालीन बुद्धिमत्ताका दुरुपयोग" मानकर "उनके विषयमें जुगुप्सा भरी दया" दिखाकर भी इंग्लंडके
राजा अथवा रानीके सिंहासनारोहणके निःसार विधि-विधान देखकर "वंडरफुल डिसिप्लीन"
कहनेमें अपनेको धन्य मानते हैं। वस्तुतः यज्ञ संस्कृति निर्माणका साधन थे। वैदिक संस्कृति
यजन-संस्कृति थी। बिना अनुशासनके कोई समाज, संस्था, सभ्यता या संस्कृति अधिक समय तक
टिक नहीं सकती। अनुशासन ही सातत्य और स्थायित्वका प्राण है। जिस समाज अथवा सभ्यतामें,
संस्था अथवा संगठनमें अनुशासन जितना सुव्यवस्थित है वह उतने ही अधिक काल टिकेगा।
भारतीय जीवनमें अनुशासनका अत्यंत महत्व रहा है। यहां अनेक प्रकारका अनुशासन चला है।
धर्म के विषयमें कहते समय 'अथातो धर्म-जिज्ञासा' कहते ही धर्मानुशासनम् आया। राजनीतिकी
बात आते ही दंडानुशासन आया। केवल अध्यात्म ज्ञान कहनेवाली गीता भी "आज्ञा मानके
शास्त्रकी आज्ञा कर तू सब कर्मको"-कहती है। अर्थात् संस्कृतिके प्राणभूत प्रथाको अनुशासन
बद्ध रखना अत्यंत स्वाभाविक था। साथ साथ यज्ञ वैदिक आर्योंकी अर्थ-वितरण व्यवस्था
भी थी। ब्राह्मण नित्य-यज्ञ करते थे। उनके यज्ञ व्यक्तिगत थे। किंतु राजाओंके, वैश्योंके
जो यज्ञ थे वे सामूहिक थे। उनके कोशमें इतना धनसंचय होते ही यह यज्ञ करना ऐसी अलिखित
परंपरा-सी थी। इस यज्ञके द्वारा वह संचित-धन समाजके अनेक प्रकारके लोगोंके पास पहुंच
जाता था। महाभारतमें राजसूय-यज्ञका वर्णन पढ़ते समय, तथा यज्ञ-व्यवस्थाको पढ़ते समय
लगता है कि कथाकथनकला-पुराण अर्थात् आख्यान कहना, नृत्यकला, नाटककला, संगीतकला,
वाद्यकला, चित्रकला, शिल्पकला, बढ़यी, कुम्हार, बर्तन बनानेकी कला, आदि अनेक कलायें यज्ञ
द्वारा विकसित हुई हैं। साथ साथ कोई भी एक बड़ा यज्ञ करनेका अर्थ संचित धन अनेक प्रकारके
कार्य करके उदर निर्वाह करनेवालोंमें बंट जाना था। धन वितरणकी इस व्यवस्थाकी दृष्टिसे भी
कई प्रकारकी व्यवस्थाएँ-अनुशासन-आवश्यक था।
साथ साथ केवल अग्नि-मुखमें आहुति देना ही यज्ञ नहीं रहा। आगे चल कर यज्ञके रूप
बदले। अग्निके तीन रूप हैं। उसमें शरीरस्थ अग्नि वैश्वानर है। वाक् शक्ति भी अग्नितत्त्वसे
संबंधित है। हम कोई भी श्रमका कार्य करते समय श्वास निरोध करते हैं। ऐसी स्थितिको
उपनिषदोंमें आंतर-अग्निहोत्र कहा है। उपनिषदमें कहा है "मनुष्य जब बोलता है तब वह
श्वासोच्छ्वास नहीं करता, "अपना प्राण-वायु वाचामें हवन" करता है। जब वह श्वासोच्छ्वास
करता तब बोल नहीं सकता अर्थात् "वाणीका प्राणमें हवन" करता है। प्रातर्दन ऋषि इसको
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