ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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गीता अ० १०, श्लो० २१-आदित्योंमें महाविष्णु—
आदित्य १२ हैं। आदित्यका अर्थ है सूर्य। सूर्यके १२ नाम हैं। ये नाम भिन्न भिन्न हैं।
सूर्य-नमस्कारके लिये (१) मित्र (२) रवि (३) सूर्य (४) भानु (५) खग
(६) पूषा (७) हिरण्यगर्भ (८) मरीचि (९) आदित्य (१०) सविता (११) अर्क
(१२) भास्कर हैं। किंतु द्वादशादित्योंमें (१) धाता (२) मित्र (३) अर्यमा (४) शुक्र
(५) वरुण (६) अंशु (७) भग (८) विवस्वान् (९) पूषा (१०) सविता
(११) त्वष्टा (१२) विष्णु हैं।
विष्णु—ऋग्वेदमें "विष्णुने तीन पगमें त्रिलोक जीत लिया" ऐसा वर्णन आया है।
ऋग्वेदमें "सब दो लोक जानते हैं तो ये तीन लोक जानता है। सब पर इसकी कृपा रहती है।
यह सबका उत्पादक और आधार है। यह सदैव सबको संकट-मुक्त करता है। पृथ्वी जीव-
मात्रको रहने योग्य हो इसीलिये इसने तीन पगसे इसका आक्रमण किया" आदि वर्णन है।
उपनिषदोंमें भी इसी प्रकारका वर्णन देखनेको मिलता है। ॐकारमें "उ" विष्णु-निदर्शक मात्रा
है यह "नृसिंहोत्तरतापिनी"में कहा गया है। यह आदित्योंमें प्रमुख है।
वैष्णव पुराणोंमें विष्णु-तत्त्वको आख्यान रूपसे समझाया गया है। इसके दस अवतार माने
गये हैं। विष्णु-तत्त्वको सर्व-सामान्य लोगोंको समझानेके लिये पुराणोंमें आख्यान रूपसे-कथा
कहानियोंके रूपमें-बहुत कुछ कहा गया है।
भारतमें गीताकी भांति "विष्णु सहस्र नाम" स्तोत्र महत्त्वका है। महाभारत, हरिवंश,
भागवत, ब्रह्मपुराण, मत्स्यपुराण, विष्णुपुराण, आदि पुराणोंमें विष्णुके आख्यान हैं।
गीता अ० १०, श्लो० २१-सूर्य मैं ज्योतिमानमें—
द्युतः प्रकाशना इस धातुसे ज्योतिष प्रकाशनेवाले ऐसा शब्द बना है। प्रकाशनेवालेमें
रवि-अंशुमान सूर्य।
गीता अ० १०, श्लो० २१-मरीचि मुख्य वायुमें—
मरुद्गण देवताओंका संघ है। ये ७-७ के टुकड़ियोंमें रहते हैं।
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