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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 1001

राज-धर्म सिखाया था। प्राचीन धर्मशास्त्र, नीतिशास्त्र तथा अर्थशास्त्र पर इनके ग्रंथ हैं। अन्य
अनेक शास्त्र ग्रंथोंमें इनके नाम देखनेको मिलते हैं।
गीता अ० १०, श्लो० २४—स्कंद सेनाधियोंमें मैं—
स्कंद—देवोंका सेनापति । शंकर-पार्वतीका पुत्र । स्कंदके जन्मके विषयमें अनेक प्रकारकी
जनश्रुतियां हैं। इसकी स्त्री देवसेना। महादेवके वरप्रसादसे डम्पत्त बने हुए तारकासुरका इसने
वध किया। तारकासुरने देवोंको अत्यंत कष्ट दिये थे। केवल तारकासुरके नाशके लिये इसका जन्म
था। तारकासुरसे युद्ध करनेसे पूर्व देवोंने क्रौंच पर्वत पर इसका सेनापत्याभिषेक किया था। इसने
विश्वकी स्त्री अपनी माताके समान मान कर व्रत लिया। विश्वामित्रने इसका उपनयन संस्कार किया।
विष्णूने इसको वाहन दिया। वायुने ध्वज दिया। सरस्वतीने वीणा दी।
गीता अ० १०, श्लो० २५—भृगु मैं ऋषिवृंदमें—
ऋषि—इस शब्दकी उत्पत्तिका विचार किया जाय तो “उत्तमतापूर्वक गतिमान होना”
ही ऋषि शब्दका अर्थ है। “दैवी स्फुरणसे स्फूर्त” अर्थात् ऋषि। यह अत्यंत प्राचीन शब्द है।
वैदिक युगका शब्द है।
ऋग्वेदमें सौसे अधिक बार इस शब्दका उल्लेख आया है। किंतु ऋग्वेदके सभी भाष्यकारोंने
ऋषिका अर्थ “मंत्रदृष्टा” ऐसा किया है। ऋग्वेदमें एक जगह “ज्ञानघन अग्नि अत्युत्तम
नियामक ऋषि” होनेकी बात कही है। ऋग्वेदमें जिन्हे ऋषि कहा गया है उनकी ओर देखनेसे
ज्ञानी, प्रतिभा संपन्न, कवि, तथा तप-सामर्थ्य भी इनका लक्षण दीखता है।
किंतु कोई भी ऋषि संन्यासी नहीं दीखता। सभी संसारी हैं। उद्देश्य पूर्वक-विश्वहितार्थे
राजनीतिमें भी वे उतरते हैं। वे योद्धा भी होते हैं। इनमें कई धनुर्वेदके अर्थात् धनुर्विद्याके अच्छे
जानकार हैं। सर्वत्र सामाजिक तथा राजनैतिक उथल पुथलमें ऋषि-प्रेरणा और कर्तृत्व दीखता है।
वे सभी प्रकारके कौटुंबिक सुखकी अपेक्षा भी करते हैं।
वेदकाल, ब्राह्मणकाल, उपनिषदकालमें ऋषि-जीवनका जो दर्शन होता है, जो स्वभाव धर्म
दीखता है उसमें भिन्नता है। वेदकालसे लेकर जनमेजयके कालतक ऋषि दीखते हैं। किंतु नंद,
गुप्त, शृंग आदि कालमें ऋषि नहीं दीखते। संभवतः जनमेजयके कालमें ही ऋषि परंपरा समाप्त हुई।
इन प्राचीन ऋषियोंमें (१) भृगु (२) मरीचि (३) अत्रि (४) अंगिरा (५) पुलहः
(६) क्रतु (७) मनु (८) दक्ष (९) वसिष्ठ (१०) पुलस्ति इनको महर्षि कहा गया है।
कुरुयुद्धके कालमें व्यास महर्षि थे।
भृगु—सर्व प्रथम भृगुको अग्नि मिला। प्रजापतिके रेतसे आदित्य, भृगु और अंगिरस
उत्पन्न हुए। दक्ष-यज्ञमें भृगु था। यज्ञ-विध्वंसमें भृगुकी दाढी जली! दक्षकन्या-ख्याती भृगुकी
पत्नी। शंकर इसका साडू। धातृ, विधातृ इसके दो लडके और लक्ष्मी लडकी। भृगु दैत्य गुरु।
भृगु-पत्नीने देवोंसे युद्ध किया था। विष्णुने सुदर्शनसे भृगु-पत्नीका वध किया और भृगुने
विष्णुको “गर्भजन्म दुःख भोग” का शाप दिया। नहुषने जब सप्त-ऋषियोंको अपने रथको जोडा
तब भृगुने ही उसको शाप देकर इंद्र पदसे पदभ्रष्ट किया था।
५५ परिशिष्ट ३