ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 932, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंचकोरको कर निमित्त । त्रिभुवनको जो संतप्त ।
शांत करता कलावंत । चंद्रमा जैसे ॥ ८७ ॥
अथवा गौतमको बनाके साधन । मिटाते कलिकाल ज्वरका पीड़न ।
नीचे छोड़ दिया शंकरने महान । गंगा-प्रवाह ॥ ८८ ॥
वैसे गीताका यह पय । बनाके वत्स धनंजय ।
देती श्रीकृष्ण रूप गाय । विश्वको बहु ॥ ८९ ॥
श्रद्धासे यदि यहां डूबेंगे । आप तद्रूप बन जायेंगे ।
पाठसे यदि-जीभ करेंगे । गीली तो भी ॥ १६९० ॥
एक अंशसे यदि पारस । लोहको कर देता है स्पर्श ।
तो भी वह होता है सरस । सुवर्ण जैसे ॥ ९१ ॥
वैसे पाठ रूपसे यह कटोरा । होंठोंको लगायेंगे ये श्लोक सारा ।
ब्रह्म-प्रेमसे होगा शरीर सारा । सतेज पुष्ट ॥ ९२ ॥
उस ओर करके यदि टेढ़ा मुख । लेंगे यदि थोड़ा श्रवण सुख ।
उससे भी मिलेगा वहां देख । होगी वही प्राप्ति ॥ ९३ ॥
इसका श्रवण पाठ और अर्थ । नहीं देता है मोक्षसे अन्य बात ।
नहीं न कहता है दाता समर्थ । किसीको जैसे ॥ ९४ ॥
पा लेनेमें यों संपूर्ण । पूर्ण है गीताका सेवन ।
अन्य शास्त्रोंका कारण । रहता है फिर ॥ ९५ ॥
कृष्णार्जुनकी खुली । गोष्ठी जो ऐसी निराली ।
व्यासने की करतल- । में आए ऐसी ॥ ९६ ॥
शिशुको ले बैठती लाड़से । माता भोजनके निमित्तसे ।
कौर बना देती है वह उसे । जैसे चाहता वह ॥ ९७ ॥
अथवा जो असीम पवन । करनेमें अपना आधीन ।
बनाते हैं पंरवासा साधन । शयाने जैसे ॥ ९८ ॥
वैसे शब्दसे न हो लाभ । उसके बनाके अनुष्टुभ ।
सम हो स्त्री शूद्रकी प्रतिभा । कहा ऐसे ॥ ९९ ॥
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