ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्वर्गके लिये नहीं आदर । न नरकका तिरस्कार ।
जला है यह वासनांकुर । उनके मनमें ॥ १६ ॥
केवल खोडा-रूप यह शरीर । गंदे पानीका बुल्ला-सा बनकर ।
विषय-कीचमें उठ फूटकर । मिट जायेगा ॥ १७ ॥
नासने होते जब जल चर । वहां पहुंचते तब धीवर ।
या गिरना होता जब शरीर । उदय होते रोग ॥ १८ ॥
उदय होना धूमकेतुके जैसे । जगके अहित हेतु होना वैसे ।
जनमते ये असुर-लोग वैसे । लोक-क्षय हेतु ॥ १९ ॥
उदय होने पर अशुभ । उसमें फूटते जैसे कोंभ ।
वैसे पापका ये कीर्ति-स्तंभ । चलते फिरते हैं ॥ ३२० ॥
जो मिलता वह सब जलाना । आगका अन्य कुछ भी न जानना ।
वैसे सबका विरोध ही करना । इनका स्वभाव ॥ २१ ॥
इसका कारण यही है अर्जुन । आरंभ करते उत्साहसे जान ।
कहता इस उत्साहका कारण । सुन तू अब ॥ २२ ॥
काममाश्रित्य दुष्पूरं दंभमानमदान्विताः ।
मोहाद् गृहीत्वासद्ग्राहान् प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः ॥ १० ॥
आसुरी-वृत्ति धर्म-धेनूका आहार तोड़ती है —
पानीसे न भरता धीवरका जाल । ईंधन पर्याप्त न माने अग्नि ज्वाल ।
वैसे अतृप्त रहता काम कराल । सदैव भूखा ही ॥ २३ ॥
ऐसे कामका ले आश्रय । जीव भावसे धनंजय ।
दंभ मानका समुदाय । जुटाता है ॥ २४ ॥
काम दुर्भर जो सेके मानी दांभिक मत्त हो ।
हठके बलसे मूढ करते पाप निर्घृण ॥ १० ॥
ज्ञानेश्वरी ६५४