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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 725

किंतु परत्र औ' देव न दीखता । इसीलिये वह सब होता वृथा ।
तथा कर्त्ता जब है मर जाता । भोगेगा कहां कौन ॥ ७ ॥
सुखी है इंद्र उर्वशीके संगमें । रहता है जैसे अमरावतीमें ।
वैसे मानता है कीडा कीचडमें । अपनेको भी ॥ ८ ॥
इसलिये है नरक स्वर्ग । नहीं है पाप-पुण्यका भाग ।
दोनों स्थानमें है सुख-भोग । कामका ही ॥ ९ ॥
इसी कारणसे काम । रत स्त्री-पुरुष युग्म ।
मिलने लेता है जन्म । जग संपूर्ण ॥ ३१० ॥
तथा जो जो अभिलाषा करता । स्वार्थके लिये उसको पोसता ।
जिससे परस्पर द्वेष होता । काम करता नाश ॥ ११ ॥
तमी काम बिन कुछ भी नहीं । जगके मूलमें कुछ भी कहीं ।
इसभांति बोलते हैं जो यही । आसुरी लोग ॥ १२ ॥
रहने दो यह व्यर्थ भाषण । बढाता नहीं इसका व्याख्यान ।
होती है इससे निष्फल जान । वाचा-शक्ति ॥ १३ ॥
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः ।
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः ॥ ९ ॥
लोक-क्षयके लिये ही आसुरी लोगोंका जन्म होता है—
तथा ईश्वरका तिरस्कार । यही होता इनका विचार ।
विश्वमें नहीं कोई ईश्वर । यह निश्चय उनका ॥ १४ ॥
अथवा खुलकर बाहर । देहमें पाखंड भरकर ।
नास्तिकताकी अस्थि अंदर । रोपते हैं ॥ १५ ॥
लेकर दृष्टिको ऐसी नष्टात्मा ज्ञान-हीन जो ।
नाशार्थ विश्वके सारे निकले रिपु हिंसक ॥ ९ ॥
३५३ दैवासुर-संपद्विभागयोग