ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइससे वे सभी ज्ञान । किये हैं स्वप्न-समान ।
वातोर्मियोंको गगन । निगलता जैसे ॥ ४५ ॥
अथवा उदित रश्मि-राज । छिपाता है चंद्रबिका तेज ।
अथवा नाना प्रलयांबुज । नदी नदादिको ॥ ४५ ॥
वैसे इसके होते ही उदय । अन्य सभी ज्ञान होते हैं लय ।
इसीलिये कहा है धनंजय । मैंने यह उत्तम ॥ ४७ ॥
अनादिसे जो मुक्त । स्थिति है पांडुसुत ।
होती है हस्तगत । इसी ज्ञानसे ॥ ४८ ॥
अंतर्मुख दृष्टिसे वह ज्ञान प्राप्त होता है--
जिसको कर प्रतीत । विचार-वीर समस्त ।
संसारको हैं सतत । दबाते जो ॥ ४९ ॥
मनसे पीछे हटाके मन । लेता है जहां विश्रांति तन ।
तब अनुभवता तन । तन-भाव ऐसा ॥ ५० ॥
फिर कर वे देह पार । दोनों ही जो एक ही बार ।
वे तोलमें पांडुकुमार । होते मेरे सम ॥ ५१ ॥
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥ २ ॥
इस ज्ञानसे मेरे समान होते हैं -
जो है मेरी नित्यता । उसीको वह पाता ।
परि-पूर्ण पूर्णता । मेरी उसको ॥ ५२ ॥
जैसे मैं आनंदानंद । सत्य-सिंधु हूं अगाध ।
नहीं है हममें भेद । रहा कोई ॥ ५३ ॥
हुए वे मुझ जैसे ही इसी ज्ञान-प्रतीतिसे ।
आना जाना उन्हे एक वे अभंग सदा सम ॥ २ ॥
५३५ गुण-निस्तारयोग