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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 606

गुण हैं कितने औ' कैसे । बांधते है उनको कैसे ।
या वह गुणातीत कैसे । उसके लक्षण क्या ? ॥ ३६ ॥
करने इसका स्पष्टीकरण । इस चतुर्दशका है कथन ।
कहता है सविस्तर श्रीकृष्ण । अर्जुनसे यहां ॥ ३७ ॥
अब यहां यह ऐसा । प्रस्तुत करेगा कैसा ।
साभिप्राय जो विश्वेश । बैकुंठका ॥ ३८ ॥
कहता है वह अर्जुन । अवधानकी सर्व सेना ।
लाकर है अब भिड़ाना । ज्ञानसे यहां ॥ ३९ ॥
कहा तुझे कई प्रकारसे । करके युक्ति-वाद जिससे ।
किंतु तू उस प्रतीतिसे । भरा नहीं ॥ ४० ॥
भगवानुवाच
परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् ।
यज्ज्ञात्वामुनयः सर्वे परां सिद्धिमितोगताः ॥ १ ॥
इस समयमें अर्जुन । तुझसे कहता हूं सुन ।
कहा है जो महान-ज्ञान । श्रुतिने सर्वत्र ॥ ४१ ॥
ज्ञान मनुष्यके हृदयमें ही होता है—
वैसे ज्ञान है रूप अपना । पर उसका है जो फैलना ।
भव स्वर्गादिक जब जाना । इससे हुवा पराया ॥ ४२ ॥
अजी ! केवल इसी कारण । अन्य ज्ञान सब मानो तृण ।
शेष है यह अग्नि-समान । कहता हूं मैं ॥ ४३ ॥
भव स्वर्गको जो जानते । यज्ञको ही भला कहते ।
तथा द्वैतको है मानते । भली भांति ॥ ४४ ॥
श्री भगवानने कहा
जो सभी ज्ञानमें श्रेष्ठ ज्ञान मैं कहता तुझे ।
इसको जानके मोक्ष पाये हैं सब ही मुनि ॥ १ ॥
ज्ञानेश्वरी ५३४