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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 608

क्योंकि मैं हूं जैसा जितना । वह भी है वैसा उतना ।
घट-संगसे है गगन । होता घटाकाश जैसे ॥ ५४ ॥
नहीं हो तो दीप-मूल है एक । उसमें मिली शाखायें अनेक ।
किंतु वास्तवमें है वह एक । इसी प्रकार ॥ ५५ ॥
इसी प्रकार हे अर्जुन । द्वैत अनुभवके बिन ।
नामार्थ रूपमें हो लीन । हुए एक ॥ ५६ ॥
यही है जो एक कारण । होती जब सृष्टि निर्माण ।
तब भी है जन्म-धारण । नहीं उसको ॥ ५७ ॥
होती है जब सृष्टि निर्माण । तब न जिसे देह-धारण ।
आया उसको कहां मरण । प्रलय-कालमें ॥ ५८ ॥
इसीलिये जन्म-क्षय । अतीत है वे धनंजय ।
मद्रूप हुये निश्चय । मेरे ज्ञानसे ॥ ५९ ॥
ऐसा जो महत्व ज्ञानका । प्रिय विषय श्रीकृष्णका ।
बढाने रस अर्जुनका । बखानता है ॥ ६० ॥
स्वरूप-विस्मरण ही अज्ञान है--
तब मानो वह अर्जुन । बना लेता सर्वांग कान ।
अथवा होता अवधान- । मूर्ति केवल ॥ ६१ ॥
तब श्रीकृष्णका व्याख्यान । कर सका है आकलन ।
तथा वह हुवा निरूपण । गगनसे विशाल ॥ ६२ ॥
तब कहता है हे प्रज्ञा-कांत । उजली है आज जो वक्तृता
उसके समान ही जो श्रोता । मिला आज ॥ ६४ ॥
अजी ! यदि मैं हूं एक । देह-पाशमें अनेक ।
पकडा जाता हूं देख । गुणोंसे कैसे ॥ ६४ ॥
कैसा क्षेत्रका संग करता । कैसे जगतको मैं प्रसवता ।
इसीको मैं तुझसे कहता । सुन तू अब ॥ ६५ ॥
ज्ञानेश्वरी ५३६