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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 605

अजी ! हे विश्वैक धाम । तेरा प्रसाद चंद्रमा ।
करें मुझको पूर्णिमा । उदय होके ॥ २३ ॥
करेंगे आप यदि अवलोकन । उन्मेष-सागरमें नित-नवीन ।
आयेगा रस-वृत्तिमें उफान । स्फूर्तिमय जो ॥ २४ ॥
श्री गुरु तब हो मुदित । तूने किया है स्तवनार्थ ।
विनीत भावसे है द्वैत । बोले ऐसे ॥ २५ ॥
छोड दे यह व्यर्थके बोल । गीतार्थ कह तू अनमोल ।
श्रोताओंकी इच्छा जो निर्मल । न कर व्यर्थ ॥ २६ ॥
अजी ! हां श्रीगुरुदेव । मेरा भी यही था भाव ।
श्रीमुखसे कहे देव । कहो ग्रंथ ॥ २७ ॥
दूर्वांकुरकी मूलिका । अमर जो स्वाभाविक ।
उस पर पीयूषका । आया पूर ॥ २८ ॥
अजी ! श्रीगुरु-प्रसादसे । वर्णूंगा अभी विस्तारसे ।
मूल शास्त्रको चातुर्यसे । आपके समक्ष ॥ २९ ॥
जिससे जीवके अंतर्गत । नांव जो है संशय-भरित ।
डूबकर वह सुनिश्चित । बढेगी श्रवणेच्छा ॥ ३० ॥
वाणीमें उतरे माधुर्य । गुरु-गृहका भिक्षा-चर्य ।
वास्तविक जो है सौंदर्य । गुरु-कृपासे ॥ ३१ ॥
त्रयोदशमें श्रीकृष्ण । बोले हैं यह वचन ।
सुन तू वह अर्जुन । ध्यान देकर ॥ ३२ ॥
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ संयोगसे । बनता है जगत जैसे ।
औ' होता है गुण-संगसे । आत्मा संसारी ॥ ३३ ॥
तथा यह प्रकृतिगत । सुखदुःख भोगके हित ।
अथवा रहा गुणातीत । होकर केवल ॥ ३४ ॥
हुवा है कैसे असंगको संग । कैसे यह क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-योग ।
अथवा कैसे सुख-दुख भोग । होता है उसे ॥ ३५ ॥
५३३ गुण-निस्तारयोग