ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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अबतक उस कृपासे । निकला जो मेरे मुखसे ।
मान्य हुवा आप सबसे । यहां गीतार्थ ॥ ६५ ॥
फिर आप संत चरण । देते हैं मुझको शरण ।
न रही है इसी कारण । कोई न्यूनता ॥ ६६ ॥
कभी क्या सरस्वर्तिका मूक । सहज भी होता है बालक ।
तथा न्यूनता क्या सामुद्रिक । महा-लक्ष्मीको ॥ ६७ ॥
ऐसे आप संतोंके पास । अज्ञानका कैसे वास ।
तभी मैं अब नव-रस । वर्षा करूंगा ॥ ६८ ॥
क्या कहूं अब गुरुवर । मुझे दे इक अवसर ।
ज्ञानदेव कहे सुंदर । कहूंगा गीतार्थ ॥ ६९ ॥
गीता श्लोक ३४
ज्ञानेश्वरी ओवी ११६९.