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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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आनंदमय अब संपूर्ण । करेगा जगतको श्रीकृष्ण ।
राजन् ! करें उसको श्रवण । कहता संजय ॥ ५२ ॥
महाभारतमें इस प्रकार । श्रीव्यासने जो प्रतिभा-सागर ।
शांति-कथा गायी है जो अमर । भीष्म-पर्वमें ॥ ५३ ॥
वह कृष्णार्जुन संवाद । देश-भाषामें मैं विशद ।
कह दिखलाऊंगा प्रबंध । ओवी छंदमें ॥ ५४ ॥
केवल वह शांति-कथा । चलेगी शब्दका वाक्पथ ।
पग रख श्रृंगार माथा- । पर अबिरल ॥ ५५ ॥
देशीके बोल सुंदर । सजायेंगे अलंकार ।
लजायेंगे जो मधुर । अमृतको यहां ॥ ५६ ॥
उन शब्दोंका जो शांति-गुण । दिखाएगा चंद्रमा है उष्ण ।
करेगा रसना लुबुधन । नादका लोप ॥ ५७ ॥
इससे पिशाचका भी मन । बनेगा सात्विकताकी खान ।
श्रवण-मात्रसे है सुमन । पायेगा समाधि ॥ ५८ ॥
वाग्विलास बिस्तार कर । गीतार्थसे विश्वको भर ।
बांधेंगे विशाल मंदिर । इस जगतका ॥ ५९ ॥
मिटेगी न्यूनता विवेककी । सार्थकता हो कान-मनकी ।
खुलेगी खान ब्रह्म-विद्याकी । चाहे जिसको ॥ ११६० ॥
पर-तत्त्व देखें नयन । पाये सुख-वसंतोद्यान ।
आकंठ ब्रह्म रस पान । करे विश्व ॥ ६१ ॥
होगा सब यह साकार । ऐसा बोलूंगा मैं सुंदर ।
कृपासे किया है स्वीकार । मेरा श्रीगुरुने ॥ ६२ ॥
स्पष्ट शब्दार्थसे तब ऐसे । उपमादिके अधिकतासे ।
समझाऊं प्रति -पदमैसे । भावार्थ-सार ॥ ६३ ॥
मेरे गुरुवर श्रीमंत । पूर्ण-बोधसे विद्यावंत ।
किया मुझे हो कृपायुत । श्रीगुरुने ॥ ६४ ॥
५२९ क्षेत्र क्षेत्रज्ञयोग
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