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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 603

१४
गुणोत्कर्ष-गुण-निस्तारयोग
आचार्य वंदना—
जय जय आचार्य । समस्त गुरुवर्य ।
प्रज्ञा-प्रभात सूर्य । सुखोदय ॥ १ ॥
जय जय सर्व-विश्राम-स्थान । सोऽहं-भाव बोध-दाता महान ।
अनेक लोक-तरंग निदान । महा-समुद्र तू ॥ २ ॥
सुनिये आर्त-बंधू । सदा कारुण्य-सिंधू ।
विशद-विद्या- वधू । वल्लभाजी ॥ ३ ॥
जिनसे तू अदृश्य होता । उनको तू विश्व दिखाता ।
जिनसे तू प्रकट होता । तू ही सर्वस्व ॥ ४ ॥
कोई अन्योंकी दृष्टि चुराता । किंतु अपनेको है दीखता ।
तेरे लाघवकी कौतुकता । आपही अदृश्य ॥ ५ ॥
विश्वका सर्वस्व तू महान । किसे ज्ञान औ' किसे अज्ञान ।
ऐसा सहज लाघव-स्थान । नमन तुझको ॥ ६ ॥
विश्वमें जो सलिल द्रवित । तेरे द्रवसे है प्रवाहित ।
तुझसे ही सहन समर्थ । हुई पृथ्वी ॥ ७ ॥
रवि-चंद्रादि सिकता-कण । विश्वको दे प्रकाश-दान ।
तेरी ही दीप्तिके कारण । तेजका तेज तू ॥ ८ ॥
अनिलकी जो दृढ चल । उसकी नींव तेरा बल ।
गगनका जो चला खेल । तुझमें ही देव ॥ ९ ॥