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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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आकाशसे भी जो महान । अव्यक्तका पैल-तीर मान ।
पाके उसे साम्या-साम्य-भान । नहीं रहता ॥ ११४० ॥
आकार वहां मिटता । जीवत्व सभी घुलता ।
द्वैत-नाम भी खो जाता । वह है अद्वय ॥ ४१ ॥
परम-तत्व वे पार्थ । होते हैं वहां सर्वथा ।
आत्म-अनात्म-व्यवस्था । उसके वे राजहंस ॥ ४२ ॥
तेरहवे अध्यायका उपसंहार—
इस भांति यह संपूर्ण । पांडवको वह श्रीकृष्ण ।
देता ज्ञान हो स-करुण । जीवनका सब ॥ ४३ ॥
एक कलशमें रहता जो जल । दूसरेमें डालते जैसे सकल ।
वैसे श्रीकृष्णने दिया सकल । ज्ञान पार्थको ॥ ४४ ॥
तथा किसको देगा कौन । वह है नर-नारायण ।
फिर अर्जुनको श्रीकृष्ण । कहाता मैं यह ॥ ४५ ॥
रहने दो यह सकल । बिना प्रइनके बोल ।
अपना सर्वस सकल । दिया श्रीहरिने ॥ ४६ ॥
अगले अध्यायकी भूमिका—
किंतु मनमें वह अर्जुन । अब तक तृप्ति नहीं मान ।
अधिकाधिक इच्छा महान । बढाते रहा ॥ ४७ ॥
स्नेहसे भरी ज्योति । जैसे बढते जाती ।
ऐसे श्रवण-भक्ति । बढी पार्थकी ॥ ४८ ॥
जहां सु-गृहिणी उदार । रसज्ञ औ' भोजनहार ।
मिले जब बढता कर । उसी भांति ॥ ४९ ॥
उभर आया श्रीकृष्णका मन । देखकर उल्हसित अर्जुन ।
उमड अया तब प्रवचन । छलकता हुवा ॥ ११५० ॥
सु-वायुसे मेघ उमड़ता । चंद्रमासे सिंधु उमड़ता ।
वक्तृतामें रस भर आता । श्रोताके आदरसे ॥ ५१ ॥
ज्ञानेश्वरी · ५२८