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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 116

जान तू ऐसी है यह माया । भ्रममें तू है व्यर्थ ही गया ।
शस्त्रसे वध किया तो छाया । न टूटता अंग ॥ १४० ॥
अथवा पूर्ण कुंभ उलट । दीखता बिंबाकार है टूटा ।
किंतु भानु-बिंब है अटूट । वैसे ही ॥ ४१ ॥
अथवा जैसे मठमें आकाश । मठकृतिसे बना मठाकाश ।
भंगनेसे मठके समावेश । महदाकाशमें ॥ ४२ ॥
लोप होनेसे वैसे शरीरका । नाश न होता कभी स्वरुपका ।
तभी आरोप न कर नाशका । भ्रांतिसे तू ॥ ४३ ॥
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्
अन्यानि संयाति नवानि देही ॥ २२ ॥
जैसे जीर्ण वस्त्रको त्यजते । फिर नवीनको हैं ओढते ।
वैसे देहान्तर स्वीकारते । चैतन्यके ॥ ४४ ॥
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥ २३ ॥
अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयम् अक्लेद्योऽशोष्य एव च ।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥ २४ ॥
उतारके जर्जर जीर्ण वस्त्र
मनुष्य लेता दुसरे नवीन ।
तथैव तजके शरीर जीर्ण
आत्मा भी लेता दुसरे नवीन ॥ २२ ॥
इसे न चुभते शस्त्र इसे अग्नि न बालता ।
न गलाता इसे पानी इसे वायू न सोखता ॥ २३ ॥
छिदता जलता ना जो गलता सूखता नहीं ।
स्थिर निश्चल है नित्य सर्व-व्यापी सनातन ॥ २४ ॥
ज्ञानेश्वरी ४८