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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 115

नष्ट होना शरीरका स्वभाव है-
तथा सारा शरीर जात । स्वभावसे है नाशवंत ।
इसलिये हो युद्धरत । ऊठ अर्जुन ॥ ३६ ॥
य एनं वेत्ति हंतारं यश्चैनं मन्यते हतम् ।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हंति न हन्यते ॥ १९ ॥
परिवर्तन देहोंका है, बाहरी है -
धर तू देहका अभिमान । शरीरको ही सर्वस्व मान ।
मारता मैं मरते आप्त जन । कह रहा है ॥ ३७ ॥
अर्जुन ! तू यह नहीं जानता । यदि विचार करे तो तत्वता ।
तू नहीं हैं किसीका वधिता । न ये हैं बध्य ॥ ३८ ॥
न जायते म्रियते वा कदाचित्
नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ २० ॥
वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् ।
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥ २१ ॥
जैसे स्वप्नका है दृश्य । स्वप्नमें ही है सत्य ।
जगकर देखें तो अदृश्य । वैसे ही ॥ ३९ ॥
कहे जो मारता आत्मा और जो मरता कहे ।
दोनों न जानते तत्व मार या मरता न जो ॥ १९ ॥
न जन्म पाता न कदापि मृत्यु
होता न पीछे न आगे न होगा ।
अजन्म जो नित्य सदा पुराण
देही न मरता नाशे भी देह ॥ २० ॥
जानता जो निर्विकार अनाशी नित्य अव्यय ।
कैसे वह मरता या मारता किसको कब ॥ २१ ॥
४७ सांख्ययोग.