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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 117

अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते ।
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ॥ २५ ॥
है यह अनादि नित्य सिद्ध । निरुपाधि तथा विशुद्ध ।
इससे शस्त्रादिकोंसे छिद्र । न होता यह ॥ ४५ ॥
प्रलयोदकसे यह न भीगता । अग्निदाह यहां न संभवता !
महाशोषका प्रभाव न होता । मारुतके ॥ ४६ ॥
अर्जुन यह है नित्य । अचल तथा शाश्वत ।
सर्वत्र यह सदोदित । परिपूर्ण होता है ॥ ४७ ॥
अजी ! दृष्टिसे तर्ककी । भेंट न होती इसकी ।
ध्यानको इसकी भेंटकी । उत्कंठा है ॥ ४८ ॥
मनसे न होता प्राप्त । साधनासे अप्राप्त ।
निःसीम यह पार्थ । पुरुषोत्तम ॥ ४९ ॥
है गुणत्रय रहित । व्यक्तिकेलिये अतीत ।
अनादि औ' अविकृत । स्वरुप इसका ॥ ५० ॥
अर्जुन इसको ऐसे जानना । सकलात्मक रूप ही देखना ।
इससे सहज ही शोक पूर्ण । मिटेगा तेरा ॥ ५१ ॥
अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् ।
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ॥ २६ ॥
यदि तू ऐसा नहीं जानता । अन्तवन्त ही इसे मानता ।
तब भी कहो कैसी है चिन्ता । पांडुकुमार ॥ ५२ ॥
जो है आदि स्थिति अंत । है निरंतर औ' नित ।
प्रवाह है अनुस्यूत । गंगा जलका-सा ॥ ५३ ॥
अचिंत्य वह अव्यक्त निर्विकारी कहे सब ।
ऐसी है जानके आत्मा तेरा शोक अकारण ॥ २५ ॥
अथवा देखता तू है जन्म-मृत्यु प्रति-क्षण ।
तो भी तुझे न है कोयी शोकका योग्य कारण ॥ २६ ॥
४९ सांख्ययोग
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