ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 1149, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंउर्वरा- उपजाऊ, भूमि.
उल्लसित- उत्साहित, प्रफुल्ल, हर्षित.
उष्मा- गरमी, क्रोध, ताप, धूप.
ऊस- अख, गन्ना.
ऋ
ऋजुता- अंतःकरणकी सरलता, ज्ञानका
एक लक्षण, ब्राह्मणोंका स्वभाव,
इंद्रियोंको स्वैर न जाने देना,
सत्कार्यतत्परता,
ऋतु- कालखंड विशेष-वसंतऋतु ग्रीष्म,
वर्षा, शरद, हेमंत, शिशिर.
ऋद्धि- समृद्धि, ऋद्धि-सिद्धि, समृद्धि
सफलता.
ऋषि- मंत्रद्रष्टा, आध्यात्मिक तथा
वैज्ञानिक तत्वोंका दर्शन करनेवाला,
चिंतनशील, विशिष्ट प्रकारकी
जीवन-दृष्टि रखकर उसके
अनुसार जीवन बितानेवाले एक-
निष्ठ ऋषियोंको देवर्षि, राजर्षि,
तथा ब्रह्मर्षि कहते हैं. इसके
अलावा महर्षि एक सामान्य संज्ञा
भी है.
ए
एकनिष्ठ- निश्चयात्मक, किसी एकपर
पक्का निष्ठावाला.
एकसर- एकदा, एकनिष्ठासे अनुकरण.
एकांगुष्ठानतप-एक ही अंगूठेके बलपर खडा
रह कर तप करना.
एकांत- निर्जन प्रदेशमें एकाएकी रहना.
एकार्णव- प्रलयकालका सर्वत्र व्याप्त पानी,
केवलमात्र समुद्र, सर्वव्यापी
महासागर.
ओ
ओप- चकाकी, चमक, तजेला.
ओस- वीरान, शून्य, हवासे मिला पानी.
क
कंकण- हाथमें पहननेका आभूषण.
किसी शुभकार्यमें, धर्मकार्यमें,
कार्य निष्ठाकी प्रतिज्ञाका द्योतक
मंत्र पूर्त सूतका ताग, कंकण
बद्ध प्रतिज्ञाबद्ध
कंगूरा- शिखर, बडे महलका ऊपरी भाग.
कंचुकी- अंगिया, चोली.
कंठनाल- गलेकी नली, कंठनसिका.
कंदर्प- काम, मन्मथ.
कंदर्पसर्पदर्प- कामरूपी अजगरका अभिमान
कंदर्पशरण- कामके आधीन
कदली- कदलीवृक्ष, केलेका पेड.
कनकद्रुम- स्वर्णवृक्ष.
कमलकोश- कमल परागका स्थान, कमल
सिकुडनेके बाद वहां भ्रमर
फंसता है ! कमलका मध्य भाग.
करण- इंद्रिय.
कर्तव्य- करनेकी आवश्यकता, विहित कर्म
आवश्यक करना तथा अनावश्यक
टालना, प्राप्त कर्म, समाजजीव-
नमें अपने हिस्सेमें आनेवाला,
तथा स्वधर्मके कारण करणीय
कर्म, नैतिक प्रेरणा स्वरूप कर्म,
नैतिक दृष्टिसे आवश्यक कर्म.
कर्तृत्व- कर्ताका भाव, कर्म-स्वामित्व,
कर्मणोंमेसे एक.
कर्म- करने तथा सहज बननेवाली
क्रिया गीतामें १ शुभाशुभ
ज्ञानदाय कर्म, (२) क्रिया-
विशेष (३) शास्त्रोक्त कर्म
(४) स्वधर्मरूप कर्तव्य कर्म,
(५) हलचल (६) शरीरश्रम,
(७) लोकसंग्रहात्मक, (८)
प्रकृतिके कार्यरूप, (९) वर्णा-
श्रमानुसार आदि अनेक प्रकारके
कर्म कहे गये हैं जो
निष्काम भावसे फलकी
अपेक्षा रहित हो कर करने
चाहिए.
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