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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 1145, कुल 1172 में से

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पृष्ठ 1145

परिशिष्ट छठा
अंकुरना- अंकुर आना, अंकुआ फूटना.
अकर्ता- कर्मसे अलिप्त, कर्म-मुक्त, कर्तव्य रहित, करनेसे अलिप्त.
अकर्म- निषिद्ध कर्म, कर्म समाप्तिकी अवस्था, करके भी न करनेकी सी स्थिति.
अकल्पनाख्य कल्पतरु- कल्पना रहित ऐसी जिसकी प्रसिद्धि है ऐसे परमात्म प्राप्ति करानेवाला कल्पवृक्ष.
अक्रिय- क्रिया रहित.
अक्रोध- क्रोधका उपशमन, क्रोधका उदय न होने देना, क्रोधावेगको पचाना.
अखंड- खंड रहित, निरंतर, दीर्घकालतक, सदैव, सतत, नित्य.
अगाध- गहन, गहरा, कठिनाईसे प्राप्त होनेवाला, न समझनेवाला.
अग्निस्यान-योगशास्त्रमें कहा हुवा द्विदल चक्र जो भ्रुकुटिमध्यमें रहता है.
अग्र- नोक, आलंबन, अवधान, एकाग्र, नासिकाग्र आदि.
अग्रहार- ब्राह्मणोंको दी हुई भूमि, केवल ब्राह्मणोंका गांव.
अचक्षु- जिसकी आंखें नहीं.
अचरण- जिसके पैर नहीं.
अच्युत- अपने स्थानसे न गिरनेवाला, जहांसे चलन नहीं, जिसमें कच्चापन नहीं, निश्चल.
अंजनांचल-काजलका पर्वत.
अजत्व- जन्मरहितता, अजन्मत्व, स्वयंभू स्थिति.
अडगोडा- बदमाश जानवरोंके गलेमें बांधा जानेवाला अडंगा.
अड्लंग- टेढामेडा, विचित्र, ऊंचानीचा, दुर्गम.
अंतरंग- अंतर्मुख, आत्मीय, गुह्य, अंतःकरण.
अंतर्यामी- ईश्वर, हृदयस्थ, अंतःकरणपर अधिकार रखनेवाला.
अंतवंत- नाशवान, जिसका नाश होता है वह.
अतिकृतकंदर्पसर्पदपं- कंदर्परूपी सर्पका दर्प तोडनेवाला.
अतीत-अतिक्रमण किया हुआ, उस पार पहुंचा हुवा, जिसका स्पर्श न हो सकता हो ऐसा, पार करके गया हुआ.
अतींद्रिय- इंद्रियोंसे अगम्य, इंद्रियोंसे जिसका अनुभव नहीं होता हो वह.
अद्रोह- किसीका द्रोह न करना, प्राणि-मात्रोंसे अविरोधी जीवन, स्पर्धा रहित जीवन.
अद्वय- दूसरे संबंधरहित.
अद्वयकमलिनी विकास- अद्वैतस्थितिरूपी कमलका विकास.
अद्वयबोधपुर- जहां अद्वयबोध होता हो वह स्थान.
अद्वयानुभव- एकत्वका अनुभव.
अद्वितीय-निरुपम, अनुपम, अकेला, एकमात्र, बेजोड, वैसा दूसरा कोई न हो.
अधिदैवत- अधिष्ठात्री देवता, अभिमानी, भोक्ता पुरुष, साहंकार जीवतत्व.
अधिभूत- साकारभूत सृष्टि, पंचतत्वसे बनने बिघडनेवाला सब, विनाशी जगत्.
अधियज्ञ- यज्ञाधिष्ठाता, शरीर भाव रहित आत्मा, स्थूल और सूक्ष्म यज्ञोंसे परिशुद्ध निरहंकारी पुरुष.
अधिष्ठान- आश्रयरूप भूमि, आश्रयस्थान, विशिष्ट अर्थ शरीर.
अधिष्ठि- अधिष्ठात्री
अधेय- न ध्यान करने योग्य.
अध्यात्म- आत्मनिष्ठ निरहंकारवृत्ति, आत्म संबंधी, आत्माकी सहजस्थिति, सहज नित्यत्व.
अध्वर- यज्ञ.