ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदृष्टिसे चातुवर्ण्य व्यवस्था अत्यंत स्वाभाविक समाज व्यवस्था है। यह समाज-व्यवस्था सार्वभौमिक
है। भारतमें ये वर्ण संस्कारांकित थे। आगे चल कर, इन चारो वर्णमें भिन्न संस्कार विकसित हुए।
जैसे, वर्ण-संस्कार, ब्राह्मणोंका कर्म शूद्रोंमें । इसी कारण धर्म शास्त्रोंमें आपद्धर्म जैसे विचार
प्रसूत हो गये ।
गुणोंके कारण इन चारो वर्णोंमें उत्कर्ष अपकर्ष होते हैं। किंतु गुणभेदसे वर्ण न मान कर
जन्मसे वर्ण माननेकी परंपराके कारण चातुर्वण्यावस्था भाज विकृत सी गयी है और समाज भी
टूटने लगा है।
चित्त—अंतःकरण पंचकमेंसे चौथा । (१) सत्व (२) मन (३) बुद्धि (४) चित्त
(५) अहंकार मिलकर अंतःकरण होता है। अंतःकरणका अर्थ अंदरका इंद्रिय । पंच कर्मेंद्रिय
और पंच ज्ञानेंद्रिय बाह्य इंद्रिय है। ज्ञान प्राप्तिके ये बाह्य साधन हैं और अंतःकरण आंतरिक
साधन । ये जीवके कार्य-साधन हैं और बाह्य साधनोंसे अत्यंत सूक्ष्म और शक्तिशाली है। इसीको
अंतःकरण चतुष्टय (१) मन (२) बुद्धि (३) चित्त (४) अहंकार भी कहा गया है।
चिंतनसे विचारोंके संस्कारचित्रोंको अंतःकरणमें संग्रह करके उसको कार्यका रूप देनेवाला
अंतरेंद्रिय चित्त है। इस चित्तके (१) क्षिप्त (२) मूढ (३) विक्षिप्त (४) एकाग्र
(५) निरुद्ध ऐसे पांच प्रकार हैं। (१) रज प्रधान चंचल चित्तको क्षिप्त कहते हैं (२) तमप्रधान
सुस्त चित्तको मूढ चित्त कहते हैं (३) सत्वरज प्रधान करुणादि भावग्रस्त चित्त विक्षिप्त चित्त
कहलाता है। (४) सत्व प्रधान मांगल्यमें स्थिर चित्तको एकाग्र चित्त कहते हैं। (५) निवृत्त
शांत चित्तको निरुद्ध कहते हैं। यही स्थिति योगकी सिद्धावस्था है। चित्त पर कोई लहरें नहीं
उठे । कहीं किसी प्रकारकी प्रेरणा न हो । यही आत्मस्वरूपका बोध होता है। अथवा चित्तकी
संपूर्ण निरुद्धावस्था निर्विकल्प समाधि है। यह अवस्था जब सतत टिकी रहती है तब वह सहज
समाधि है। ऐसा सिद्ध पुरुष सब कुछ करके कुछ भी नहीं करता । अनंत वक्तृत्वसे मौन रहता
है। बिना ओर छोरका कर्म करके भी निष्क्रियसा रहता है !!
चिदाकाश—शुद्ध ज्ञानमय स्थिति दर्शानेके लिये इस शब्दका उपयोग किया गया है।
आकाशका अर्थ है शून्य । केवल खोखलापन । अर्थात् आकाश शब्दसे अभावका भी भाव आता
है। ज्ञानका अभाव ही अज्ञान है। इस लिये ज्ञानके साथ आकाशकी विशालता और अलिप्तता
दर्शानेके लिये चिदाकाश कहा गया है। चिदाकाश, विशुद्ध ज्ञानावस्था जो सबसे विलिप्त है और
बिना ओर छोरका भी ।
चौबीस तत्व—सांख्य दर्शनके अनुसार सारा विश्व चौबीस तत्वोंसे बना है। इन
चौबीस तत्वोंमें प्रधान तत्व है प्रकृति। इसी प्रकृतिका अव्यक्त, माया, प्रसवधर्मिणी, गुणक्षोभिणी
आदि विशेषणोंसे वर्णन किया है। (१) प्रकृति (२) महत्-बुद्धि (३) अहंकार (४) मन
(५) चक्षु (६) घ्राण (७) श्रवण (८) त्वचा (९) रसना-ये ५ ज्ञानेंद्रिय और (१०)
हाथ (११) पाय (१२) मुख (१३) गुदा (१४) शिश्न ये पांच कर्मेंद्रियां (१५) शब्द
(१६) स्पर्श (१७) रूप (१८) रस (१९) गंध ये पांच तन्मात्राएं तथा (२०) पृथ्वी
१३३ परिशिष्ट ५