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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

१०८ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः

परिकरश्लोकश्चात्र—
व्यङ्ग्यव्यञ्जकसम्बन्धनिबन्धनतया ध्वनेः ।
वाच्यवाचकचारुत्वहेत्वन्तःपातिता कुतः ॥
ननु यत्र प्रतीयमानस्यार्थस्य वैशद्येनाप्रतीतिः स नाम मा
भूद् ध्वनेर्विषयः । यत्र तु प्रतीतिरस्ति, यथा—समासोक्त्याक्षेपानुक्त-
निमित्तविशेषोक्तिपर्यायोक्तापह्नुतिदीपकसङ्करालङ्कारादौ, तत्र ध्वनेरन्त-
र्भावो भविष्यतीत्यादि निराकर्तुमभिहितम्-‘उपसर्जनीकृतस्वार्थौ’ इति ।
अर्थो गुणीकृतात्मा, गुणीकृताभिधेयः शब्दो वा यत्रार्थान्तर-
मभिव्यनक्ति स ध्वनिरिति । तेषु कथं तस्यान्तर्भावः । व्यङ्ग्य-
प्राधान्ये हि ध्वनिः । न चैतत्समासोक्त्यादिष्वस्ति ।
और यहाँ एक परिकर श्लोक है—
'ध्वनि के मूल में व्यङ्ग्यव्यञ्जकभाव के सम्बन्ध के होने के कारण वाच्य और
वाचक के चारुत्व के हेतुओं में उसका अन्तर्भाव कैसे हो सकता है ?'
जहाँ प्रतीयमान अर्थ की विशदतापूर्वक प्रतीति नहीं होती है वह ध्वनि का
विषय मत हो, किन्तु जहाँ प्रतीति है, जैसे—समासोक्ति, आक्षेप, अनुक्तनिमित्ता
विशेषोक्ति, अपह्नुति, दीपक, सङ्कर आदि में, वहाँ ध्वनि का अन्तर्भाव होगा,
इत्यादि (शङ्का) के निवारण के लिए अभिहित किया है—'उपसर्जनीकृतस्वार्थौ ।'
अर्थात् अर्थ अपने आपको (आत्मा को) गुणीभूत करके, जहाँ दूसरे अर्थ को
अभिव्यक्त करता है वह 'ध्वनि' है । उनमें उसका अन्तर्भाव कैसे हो सकता है ? क्योंकि
व्यङ्ग्य अर्थ के प्राधान्य में ध्वनि होता है । और यह समासोक्ति आदि में नहीं है ।
लोचनम्
परिकरश्लोकः । यत्रेत्यलङ्कारे । वैशद्येनेति । चारुतया स्फुटतया चेत्यर्थः ।
अभिहितमिति । भूतप्रयोग आदौ व्यङ्क्त इत्यस्य व्याख्यातत्वात् । गुणीकृता-
त्मेति । आत्मेत्यनेन स्वशब्दस्यार्थो व्याख्यातः । न चैतदिति । व्यङ्ग्यस्य
प्राधान्यम् । प्राधान्यं च यद्यपि ज्ञप्तौ न चकास्ति; 'बुद्धौ तत्त्वावभासिन्याम्'
श्लोक होता है वह परिकर श्लोक है । जहाँ—। अलङ्कार में । विशदतापूर्वक—। अर्थात्
चारुतापूर्वक और स्फुटतापूर्वक । 'अभिहित' यह 'भूत' प्रयोग है, क्योंकि पहले 'व्यङ्क्तः'
( 'व्यञ्जित करते हैं' ) इसका व्याख्यान किया गया है । गुणीकृतात्मा—। 'आत्मा'
द्वारा 'स्व' शब्द का अर्थ व्याख्यान किया है । यह……नहीं है—। व्यंग्य का प्राधान्य
(नहीं है )। यद्यपि व्यंग्य का प्राधान्य ज्ञप्ति (ज्ञान) में नहीं भासित होता है, क्योंकि

प्रथम उद्योतः १०९
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ध्वन्यालोकः
समासोक्तौ तावत्—
उपोढरागेण विलोलतारकं तथा गृहीतं शशिना निशामुखम् ।
यथा समस्तं तिमिरांशुकं तया पुरोऽपि रागाद्गलितं न लक्षितम् ॥
समासोक्ति में—प्रवृद्धराग शशी ने निशा के मुख को इस प्रकार ग्रहण किया कि
उस (निशा) ने राग के कारण (सामने = पूर्व दिशा में) ढले हुए पूरे अन्धकार के
अंशुक को नहीं लक्षित किया।
लोचनम्
इति नयेनाखण्डचर्वणाविश्रान्तेः, तथापि विवेचकैर्जीवितान्वेषणे क्रियमाणे
यदा व्यङ्ग्योऽर्थः पुनरपि वाच्यमेवानुप्राणयन्नास्ते तदा तदुपकरणत्वादेव
तस्यालङ्कारता । ततो वाच्यादेव तदुपस्कृताच्चमत्कारलाभ इति । यद्यपि पर्यन्ते
रसध्वनिरस्ति, तथापि मध्यकक्षानिविष्टोऽसौ व्यङ्ग्योऽर्थो न रसोन्मुखीभवति
स्वातन्त्र्येण, अपि तु वाच्यमेवार्थं संस्कृतुं धावतीति गुणीभूतव्यङ्ग्यताक्ता ।
समासोक्ताविति ।
यत्रोक्तौ गम्यतेऽन्योऽर्थस्तत्समानैर्विशेषणैः ।
सा समासोक्तिरुदिता संक्षिप्तार्थतया बुधैः ॥
इत्यत्र समासोक्तेर्लक्षणस्वरूपं हेतुर्नाम तन्निर्वचनमिति पादचतुष्टयेन
क्रमादुक्तम् । उपोढो रागः सान्ध्योऽरुणिमा प्रेम च येन । विलोलास्तारका
ज्योतींषि नेत्रत्रिभागाश्च यत्र । तथेति । झटित्येव प्रेमरभसेन च । गृहीतमाभा-
सितं परिचुम्बितुमाक्रान्तं च । निशाया मुखं प्रारम्भो वदनकोकनदं चेति ।
यथेति । झटिति ग्रहणेन प्रेमरभसेन च । तिमिरं चांशुकञ्च सूक्ष्मंशावस्तिम-
'बुद्धौ तत्त्वावभासिन्याम्' इस न्याय के अनुसार अखण्ड चर्वणा में विश्रान्ति होती है,
तथापि विवेचक लोगों द्वारा जीवित (आत्मा) के अन्वेषण किए जाने पर जब व्यंग्य
अर्थ फिर भी वाच्य ही को अनुप्राणन करता है तब उस (वाच्य) का उपकरण होने
के कारण उसका अलङ्कारत्व माना जाता है। ऐसी स्थिति में, उस व्यंग्य के द्वारा
उपस्कृत उस वाच्य से ही चमत्कार का लाभ होता है। यद्यपि पर्यवसान में रसध्वनि
है, तथापि बीच वाली कक्षा में पड़ा व्यंग्य अर्थ रस की ओर उन्मुख नहीं होता, बल्कि
स्वतन्त्रतापूर्वक वाच्य अर्थ को ही संस्कृत करने के लिए दौड़ लगाता है, इसलिए(उसका)
गुणीभूतव्यंग्यत्व कहा है। समासोक्ति में—।
जिस उक्ति में अन्य अर्थ (प्रस्तुत से अतिरिक्त अप्रस्तुत अर्थ) समान विशेषणों से
प्रतीत होता है उसे विद्वान् लोग संक्षिप्तार्थ होने से समास कहते हैं।
यहाँ श्लोक के चार चरणों द्वारा क्रम से समासोक्ति का लक्षण-स्वरूप, हेतु, नाम
और उसका निर्वचन (व्युत्पत्ति) बताया गया है। प्रवृद्ध है राग अर्थात् सन्ध्याकाल की
लाली और प्रेम जिससे । विलोल (चंचल) तारक अर्थात् तारे और नेत्रत्रिभाग हैं जहाँ ।
तथा—। झट ही और प्रेम के वेग से। गृहीत (ग्रहण किया) अर्थात् आभासित और

११० सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
इत्यादौ व्यङ्ग्येनानुगतं वाच्यमेव प्राधान्येन प्रतीयते समारो-
पितनायिकानायकव्यवहारयोर्निशाशशिनोरेव वाक्यार्थत्वात् ।
इत्यादि ( उदाहरण ) में व्यङ्ग्य से अनुगत वाच्य ही प्राधान्यतः प्रतीत होता है,
क्योंकि जिस पर नायिका और नायक के व्यवहारों का आरोप किया गया है ऐसे
निशा और शशी ही वाक्यार्थ हैं।
लोचनम्
रांशुकं रश्मिशबलीकृतं तमःपटलं, तिमिरांशुकं नीलजालिका नवोढाप्रौढवधू-
चिता । रागाद्रक्तत्वात् सन्ध्याकृतादनन्तरं प्रेमरूपाच्च हेतोः । पुरोऽपि पूर्वस्यां
दिशि अग्रे च । गलितं प्रशान्तं पतितं च । रात्र्या करणभूतया समस्तं मिश्रि-
तम्; उपलक्षणत्वेन वा । न लक्षितं रात्रिप्रारम्भोऽसाविति न ज्ञातं, तिमिर-
संवलितांशुदर्शने हि रात्रिमुखमिति लोकेन लक्ष्यते न तु स्फुट आलोके ।
नायिकापक्षे तु तयेति कर्तृपदम् । रात्रिपक्षे तु अपिशब्दो लक्षितमित्यस्यान-
न्तरः । अत्र च नायकेन पश्चाद्गतेन चुम्बनोपक्रमे पुरो नीलांशुकस्य गलनं
पतनम् । यदि वा ‘पुरोऽग्रे नायकेन तथा गृहीतं मुखमि’ति सम्बन्धः । तेनात्र
व्यङ्ग्ये प्रतीतेऽपि न प्राधान्यम् । तथाहि नायकव्यवहारो निशाशशिनावेव
परिचुम्बन के लिए आक्रान्त । निशा का मुख अर्थात् प्रारम्भ और मुख-कमल ।
यथा—। झट पकड़ लेने से और प्रेम के वेग से । तिमिर और अंशुक ( चन्द्र की सूक्ष्म
किरणें ) । तिमिरांशुक अर्थात् रश्मि से मिला-जुला अन्धकार-पटल, तिमिरांशुक अर्थात्
नवोढा प्रौढवधू द्वारा पहनी हुई नीली साड़ी । राग अर्थात् सन्ध्या की लाली के कारण
और प्रेमरूप राग के कारण । 'पुरोऽपि'—पूर्व दिशा में, और सामने । गलित अर्थात्
प्रशान्त और पतित ( ढला हुआ ) । रात्रि करणभूत रात्रि द्वारा समस्त अर्थात् मिश्रित,
अथवा उपलक्षण के रूप में रात्रि से । नहीं लक्षित किया—। यह रात्रि का प्रारम्भ
है यह नहीं जाना, क्योंकि अन्धकार से मिश्रित किरणों को देखने पर ही 'रात्रिमुख'
को लोग लक्षित करते हैं—समझते हैं, न कि स्फुट आलोक में । नायिका-पक्ष में 'तया'
( उसने ) यह कर्तृपद है । रात्रिपक्ष में 'अपि' ( भी ) शब्द 'लक्षितम्' के बाद है । यहाँ
पीछे की ओर से पहुँचे हुए नायक के द्वारा चुम्बन का उपक्रम किए जाने पर सामने
नीलांशुक का गलन या पतन है । यदि वा, 'आगे नायक ने उस प्रकार मुख को पकड़ा'
यह सम्बन्ध करते हैं, ऐसी स्थिति में यहाँ व्यंग्य के प्रतीत होने पर भी उसका प्राधान्य
नहीं बनेगा । क्योंकि नायक का व्यवहार शृंगार के विभावरूप निशा और शशी को
ही उपस्कृत करता हुआ अलङ्कारभाव को प्राप्त कर रहा है, तब तो विभावीभूत
वाच्य से रसनिष्यन्द होगा । जिसने व्याख्यान किया है—'तया निशया' यह कर्तृपद है,
निशा के अचेतन होने के कारण उसका कर्तृत्व बन नहीं सकता, इस प्रकार यहाँ
शब्द ही के द्वारा नायक का व्यवहार उन्नीत होने से अभिधेय ही है न कि व्यंग्य,

प्रथम उद्योतः १११
ध्वन्यालोकः
आक्षेपेऽपि व्यङ्ग्यविशेषाक्षेपिणोऽपि वाच्यस्यैव चारुत्वं प्राधान्येन
वाक्यार्थ आक्षेपोक्तिसामर्थ्यादेव ज्ञायते । तथाहि—तत्र शब्दोपारूढो
विशेषाभिधानेच्छया प्रतिषेधरूपो य आक्षेपः स एव व्यङ्ग्यविशेषमाक्षि-
पन्मुख्यं काव्यशरीरम् ।
‘आक्षेप’ अलङ्कार में भी व्यङ्ग्यविशेष का आक्षेप करने वाले वाच्य अर्थ की ही
चारुता है, प्राधान्यतः वाक्यार्थ आक्षेपोक्ति की सामर्थ्य से ही जाना जाता है ।
जैसा कि—विशेष बात कहने की इच्छा से शब्द द्वारा वाच्य जो प्रतिषेध रूप
आक्षेप है वही व्यङ्ग्य विशेष को व्यञ्जित करता हुआ मुख्य काव्यशरीर है ।
लोचनम्
शृङ्गारविभावरूपौ संस्कुर्वाणोऽलङ्कारतां भजते, ततस्तु वाच्याद्विभावीभूताद्र-
सनिःष्यन्दः । यस्तु व्याचष्टे—'तया निशयेति कर्तृपदं, न चाचेतनायाः कर्तृ-
त्वमुपपन्नमिति शब्देनैवात्र नायकव्यवहार उन्नीतोऽभिधेय एव, न व्यङ्ग्य
इत्यत एव समासोक्तिः' इति । स प्रकृतमेव ग्रन्थार्थमत्यजद्व्यङ्ग्येनानुगत-
मिति । एकदेशविवर्ति चेत्थं रूपकं स्यात्, 'राजहंसैरवीज्यन्त शरदैव सरोनृपाः'
इतिवत्, न तु समासोक्तिः; तुल्यविशेषणाभावात् । गम्यत इति चानेनाभि-
धाव्यापारनिरासादित्यलमवान्तरेण बहुना । नायिकाया नायके यो व्यवहारः
स निशायां समारोपितः; नायिकायां नायकस्य यो व्यवहारः स शशिनि समा-
रोपित इति व्याख्याने नैकशेषप्रसङ्गः । आक्षेप इति ।
अतएव समासोक्ति है ।' उस ( व्याख्याता ) ने 'व्यंग्येनानुगतम्' यह प्रस्तुत अर्थ छोड़
दिया है । इस प्रकार 'एकदेशविवर्ति' रूपक होगा, जैसा कि—'सरोवररूपी राजे
राजहंसरूपी शरत्काल द्वारा हवा दिए गए ।' समासोक्ति नहीं है, क्योंकि समान
विशेषण नहीं है । समासोक्ति में 'गम्यते' ( प्रतीत होता है' ) इस पद का प्रयोग करके
अभिधा व्यापार का निराकरण किया है । यह बहुत अवान्तर चर्चा व्यर्थ है ! नायिका
का नायक में जो व्यवहार है उसका निशा में समारोप किया है और जो व्यवहार
नायिका में नायक का है उसका शशी में समारोप किया है, इस प्रकार व्याख्यान करने
पर एकशेष' का प्रसंग नहीं उपस्थित होगा । आक्षेप—।
१. स्वयं लोचनकार ने प्रस्तुत 'समासोक्ति' के उदाहरण 'उपोढरागेण' का विशद व्याख्यान
प्रस्तुत कर दिया है । यहाँ वृत्तिग्रन्थ में 'नायिका और नायक' जो कहा गया है वहाँ पाणिनि के
'पुमान् स्त्रिया' इस नियम के अनुसार एकशेष होना चाहिए यह शङ्का उपस्थित होती है मतलब यह
कि 'नायक' कह देने मात्र से स्वतः नायिका का भी ग्रहण हो सकता था । इस शङ्का के समाधान में
आचार्य अभिनवगुप्त ने इस प्रकार व्याख्यान किया है दोनों के उल्लेख की आवश्यकता हो जाती
है। उनका कहना है कि कवि ने नायिका के नायक में नीलांशुक के गलन को लक्षित न करने
आदि व्यवहार ( व्यापार ) को निशा में आरोपित किया है और नायिका में नायक के

११२ सलोचन-ध्वन्यालोकः
लोचनम्
प्रतिषेध इवेष्टस्य यो विशेषाभिधित्सया ।
वक्ष्यमाणोक्तविषयः स आक्षेपो द्विधा मतः ॥
तत्राद्यौ यथा—
अहं त्वां यदि नेक्षेय क्षणमप्युत्सुका ततः ।
इयद्देवास्त्वतोऽन्येन किमुक्तेनाप्रियेण ते ॥
इति वक्ष्यमाणमरणविषयो निषेधात्माक्षेपः । तत्रेयदस्त्वित्येतदेवात्र म्रिये
इत्याक्षिप्तच्चारुत्वनिबन्धनमित्याक्षेपेणाक्षेपकमलङ्कृतं सत्प्रधानम् । उक्तवि-
षयस्तु यथा ममैव—
भो भोः किं किमकाण्ड एव पतितस्त्वं पान्थ कान्‍या गति-
स्तत्तादृक्तृषितस्य मे खलमतिः सोऽयं जलं गूहते ।
अस्थानोपनतामकालसुलभां तृष्णां प्रति क्रुध्य भो-
स्त्रैलोक्यप्रथितप्रभावमहिमा मार्गः पुनर्मारवः ॥
अत्र कश्चित्सेवकःप्राप्तः प्राप्तव्यमस्मात्किमिति न लभ इति प्रत्याशाविशास्य-
मानहृदयः केनचिदमुनाक्षेपेण प्रतिबोध्यते । तत्राक्षेपेण निषेधरूपेण
विशेष कथन की इच्छा से इष्ट वस्तु का प्रतिषेध-सा किया जाय तो वह 'वक्ष्यमाण-
विषय' और 'उक्तविषय' के भेद से दो प्रकार का 'आक्षेप' होता है ।
उसमें पहला जैसे—
'यदि उत्सुक मैं क्षण भर भी तुझे न देखूँ तब···इतना ही रहने दो, इसके बाद की
दूसरी तेरी अप्रिय बात कहने से क्या लाभ ?'
यह वक्ष्यमाण मरणविषय निषेधरूप आक्षेप है । 'इतना रहने दो' केवल यही
यहाँ 'मर जाऊँगी' इस बात को आक्षिप्त ( व्यञ्जित ) करता हुआ चारुत्व का निबन्धन
( आधार ) है । इस प्रकार आक्षेप्य द्वारा आक्षेपक अलंकृत होता हुआ प्रधान ठहरता है ।
'उक्तविषय', जैसे मेरा ही—
'हे हे पथिक ! तुम क्यों गलत जगह में आ पहुँचे ?' 'मुझे ऐसी प्यास ही लगी है,
मैं क्या करता ?' यह दुष्ट मार्ग तो जल को छिपा लेता है !' अरे गलत जगह में उत्पन्न
हुई अकाल सुलभ मेरी तृष्णा के प्रति क्रोध करो, अन्यथा ( किसे नहीं मालूम कि )
यह तीनों लोकों में प्रसिद्ध प्रभाव और महिमा वाला मरु का मार्ग है ( यहाँ जल की
आशा व्यर्थ है ) ।'
यहाँ कोई सेवक अपने मालिक के पास पहुँचा है, इस प्रत्याशा से कि क्यों नहीं
इससे वह अपने प्राप्तव्य का लाभ करेगा ? उसका हृदय विश्वास कर रहा है, तभी
कोई उसे इस 'आक्षेप' के द्वारा प्रतिबोधन करता है । वहाँ निषेधरूप आक्षेप के द्वारा
मुखचुम्बनादि व्यापार को शशी में आरोपित किया है । यदि एकशेष कर दिया जायगा तब इस
प्रकार नायिका और नायक के शशी और निशा में व्यवहार के समारोपण का स्पष्टीकरण नहीं
हो सकेगा ।

प्रथम उद्योतः ११३
लोचनम्
वाच्यस्यैवासत्पुरुषसेवा तद्वैफल्यतत्कृतोद्वेगात्मनः शान्तरसस्थायिभूतनिर्वेद-
विभावरूपतया चमत्कृतिदायित्वम् । वामनस्य तु 'उपमानाक्षेपः' इत्याक्षेपलक्ष-
णम् । उपमानस्य चन्द्रादेश्चाक्षेपः; अस्मिन्सति किं त्वया कृत्यमिति । यथा—
तस्यास्तन्मुखमस्ति सौम्यसुभगं किं पार्वणेनेन्दुना
सौन्दर्यस्य पदं दृशौ यदि च तैः किं नाम नीलोत्पलैः ।
किं वा कोमलकान्तिभिः किसलयैः सत्येव तत्राधरे
ही धातुः पुनरुक्तवस्तुरचनारम्भेष्वपूर्वो ग्रहः ॥
अत्र व्यङ्ग्योऽप्युपमार्थो वाच्यस्यैवोपस्कुरुते । किं तेन कृत्यमिति त्वप-
हस्तनारूप आक्षेपो वाच्य एव चमत्कारकारणम् । यदि वोपमानस्याक्षेपः
सामर्थ्यादाकर्षणम् । यथा—
ऐन्द्रं धनुः पाण्डुपयोधरेण शरद्घनाद्र्रनखक्षताभम् ।
असत्पुरुष की सेवा और उसके वैफल्य तथा उससे उत्पन्न उद्वेगरूप वाच्य का शान्तरस
के स्थायीभाव निर्वेद के (उद्दीपक) विभाव होने के कारण चमत्कृतिकारित्व १ है ।
परन्तु वामन का 'आक्षेप' लक्षण 'उपमान का आक्षेप' है । उपमान चन्द्र आदि का
आक्षेप, इसके रहते तुझसे क्या होगा ? जैसे—
'सौम्य एवं सुभग उस रमणी का वह मुख विद्यमान है तो पूर्णिमा के चन्द्र से
क्या ? यदि सौन्दर्य का स्थानभूत उसकी आँखें हैं तब उन नीले कमलों से क्या ?
वहाँ उसके अधर के रहते कोमल कान्ति वाले किसलयों से क्या ? ओह ! एक वस्तु
के बाद पुनः उसी के समान दूसरी वस्तु के निर्माण में विधाता का अपूर्व आग्रह है !'
यहाँ उपमारूप अर्थ व्यंग्य होता हुआ भी वाच्य का ही उपस्कारक है । 'उससे
क्या काम ?' यह 'अपहस्तना' (निराकरण) रूप 'आक्षेप' वाच्य होकर ही चमत्कार
का कारण है । अथवा यदि उपमान का आक्षेप अर्थात् '(अर्थ की) सामर्थ्य से
आकर्षण' है । जैसे—
'अपने पाण्डु वर्ण वाले पयोधर (मेघ, पक्ष में स्तन) से गीले नखक्षत की भाँति
१. पहले प्रस्तुत उदाहरण के मूल स्वरूप पर विचार कर लेना चाहिए । इसका दूसरा
चरण, जैसा कि 'तत्तादृक् तृषितस्य मे खलमतेः सोऽयं जलं गूहते' मुद्रित है, अर्थ होगा 'उस
प्रकार मुझ प्यासे की और दूसरी गति क्या हो सकती है ?' यह दुष्ट मति का (मार्ग अथवा व्यक्ति)
जल को छिपा लेता है । किन्तु 'बालप्रिया' में इस चरण के अन्य पाठभेद को मानकर कि 'भे खल !
सृतिः सेयं' अर्थात् रे दुष्ट पथिक ! मुझ प्यासे के लिए और दूसरी गति क्या है ?' 'यह मार्ग (सृति)
जल को छिपा लेता है।' व्याख्या किया है । मैंने इन दोनों पाठों से कुछ मिलता-जुलता अर्थ
किया है । यहाँ असत्पुरुष की सेवा की विफलता वाच्य हो रही है और शान्तरस व्यङ्ग्य है ।
'अस्थान में पहुँचने से इष्ट का लाभ होनेवाला नहीं' इस 'आक्षेप' से वाच्य की शोभा हो रही
है । चमत्कार के कम-वेश होने पर ही अप्रधानता और प्रधानता का निर्णय होता है यह सिद्धान्त
मूल वृत्तिग्रन्थ में, इसी प्रसंग में आचार्य ने निर्देश कर दिया है । इस उदाहरण में 'आक्षेप' का
विषय उक्त है ।
८ ध्व०

११४ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
चारुत्वोत्कर्षनिबन्धना हि वाच्यव्यङ्ग्ययोः प्राधान्यविवक्षा।
यथा—
अनुरागवती सन्ध्या दिवसस्तत्पुरस्सरः।
अहो दैवगतिः कीदृक्तथापि न समागमः॥
अत्र सत्यामपि व्यङ्ग्यप्रतीतौ वाच्यस्यैव चारुत्वमुत्कर्षवदिति
तस्यैव प्राधान्यविवक्षा।
क्योंकि, वाच्य और व्यङ्ग्य के प्राधान्य की विवक्षा चारुत्व के उत्कर्ष के आधार
पर होती है। जैसे—
सन्ध्या (नायिका) अनुराग (सन्ध्याकालीन लाली, अथवा प्रेम) से भरी है
और दिवस (नायक) उसके सामने सरक रहा है। अहो, दैव की गति वैसी है कि
तब भी समागम नहीं होता।
यहाँ व्यङ्ग्य की प्रतीति होने पर भी वाच्य का ही चारुत्व उत्कर्षयुक्त है, अतः
उसीके प्राधान्य की विवक्षा है।
लोचनम्
प्रसादयन्ती सकलङ्कमिन्दुं तापं रवेरभ्यधिकं चकार॥
इत्यत्रेर्ष्याकलुषितनायकान्तरमुपमानमाक्षिप्तमपि वाच्यार्थमेवालङ्करोती-
त्येषा तु समासोक्तिरेव। तदाह—चारुत्वोत्कर्षेति। अत्रैव प्रसिद्धं दृष्टान्तमाह—
अनुरागवतीति। तेनाक्षेपप्रमेयसमर्थनमेवापरिसमाप्तमिति मन्तव्यम्। तत्रोदा-
हरणत्वेन समासोक्तिश्लोकः पठितः। अहो दैवगतिरिति। गुरुपारतन्त्र्यादि-
निमित्तोऽसमागम इत्यर्थः। तस्यैवेति। वाच्यस्यैवेति यावत्। वामनाभिप्राये-
इन्द्र-धनुष को धारण किए हुई और सकलंक चन्द्रमा को प्रसन्न करती हुई शरद् ने
सूर्य के ताप को बढ़ा दिया।¹
यहाँ ईर्ष्या से कलुषित अन्य 'नायकरूप उपमान आक्षिप्त होकर भी वाच्यार्थ को
ही अलंकृत करता है। इस प्रकार यह तो 'समासोक्ति' ही है। जैसा कि कहा है—
चारुत्व के उत्कर्ष—। यहीं पर प्रसिद्ध दृष्टान्त को कहते हैं—सन्ध्या अनुराग से—।
इसलिए यह मानना चाहिए कि 'आक्षेप' अलङ्कार के प्रमेय (उदाहरण) का समर्थन
अभी पूरा समाप्त नहीं हुआ है। वहाँ उदाहरण के रूप में 'समासोक्ति' का श्लोक
पढ़ा है। अहो दैवगतिः—। अर्थात् गुरुजनों की परतन्त्रता आदि के कारण समागम
नहीं होता। उसी के—मतलब कि वाच्य की ही। वामन के अभिप्राय से यह 'आक्षेप'
१. शरद् नायिका है और चन्द्र उसका प्रिय नायक। सूर्य उसका ईर्ष्यालु नायक है। यह
नायक-नायिका व्यवहार यहाँ जो श्लिष्ट प्रयोगों से व्यञ्जित हो रहा है उससे वाच्य की शोभा ही

प्रथम उद्योतः ११५
ध्वन्यालोकः
यथा च दीपकापह्नुत्यादौ व्यङ्ग्यत्वेनोपमायाः प्रतीतावपि
प्राधान्येनाविवक्षितत्वान्न तया व्यपदेशस्तद्वदत्रापि द्रष्टव्यम् ।
और, जैसे दीपक, अपह्नुति आदि में व्यङ्ग्य रूप से उपमा की प्रतीति होने पर
भी प्राधान्यतः विवक्षित न होने के कारण उससे व्यपदेश नहीं होता, उसी प्रकार
यहाँ भी देखना चाहिए ।
लोचनम्
णायमाक्षेपः, भामहाभिप्रायेण तु समासोक्तिरित्यमुमाशयं हृदये गृहीत्वा
समासोक्त्याक्षेपयोः युक्त्येदमेकमेवोदाहरणं व्यतरद् ग्रन्थकृत् । एषापि
समासोक्तिर्वाऽस्तु आक्षेपो वा, किमनेनास्माकम् । सर्वथालङ्कारेषु व्यङ्ग्यं
वाच्ये गुणीभवतीति नः साध्यमित्यत्राशयोऽत्र ग्रन्थेऽस्मद्गुरुभिर्निरूपितः ।
एवं प्राधान्यविवक्षायां दृष्टान्तमुक्त्वा व्यपदेशोऽपि प्राधान्यकृत एव
भवतीत्यत्र दृष्टान्तं स्वपरप्रसिद्धमाह—यथा चेति । उपमाया इति । उपमानो-
पमेयभावस्येत्यर्थः तयेत्युपमया । दीपके हि 'आदिमध्यान्तविषयं त्रिधा
दीपकमिष्यते' इति लक्षणम् ।
मणिः शाणोल्लीढः समरविजयी हेतिदलितः
कलाशेषश्चन्द्रः सुरतमृदिता बालललना ।
मदक्षीणो नागः शरदि सरिदाश्यानपुलिना
तनिम्ना शोभन्ते गलितविभवाश्चार्थिषु जनाः ।।
है, किन्तु 'भामह' के अभिप्राय से समासोक्ति है, इस आशय को हृदय में रखकर
ग्रन्थकार ने युक्ति से समासोक्ति और आक्षेप का यह एक ही उदाहरण दिया है । यह
'समासोक्ति' हो अथवा आक्षेप, इससे हमें क्या ? सर्वथा हमारा साध्य यह है कि
अलङ्कारों में व्यंग्य वाच्य में गुणीभूत होकर रहता है—इस आशय को इस ग्रन्थ में
हमारे गुरुदेव ने निरूपण किया है ।
इस प्रकार प्राधान्य की विवक्षा के सम्बन्ध में दृष्टान्त कहकर व्यपदेश ( नाम का
व्यवहार ) भी प्राधान्य के कारण ही होता है, इसका यहाँ अपने और दूसरे के अनुसार
प्रसिद्ध दृष्टान्त देते हैं—और जैसे—। उपमा की—। अर्थात् उपमानोपमेयभाव की ।
उससे—। अर्थात् उपमा से । 'दीपक' में, 'आदिविषय, मध्यविषय और अन्तविषय के
भेद से तीन प्रकार का दीपक होता है' यह लक्षण है ।
शान पर निखारा हुआ मणि, शस्त्रों के प्रहार से आहत समरविजयी वीर, एक
कलामात्र शेषवाला चन्द्र, सुरत के प्रसंग में मसली हुई बालललना, क्षीण मद वाला
रहीं हैं। इस प्रकार वामन के पक्ष से यहाँ 'आक्षेप' है किन्तु भामह के मान्य मत के अनुसार
'समासोक्ति' है। वामन का लक्षण सर्वमान्य नहीं हो सका ।

११६ सलोचन-ध्वन्यालोकः

लोचनम्
इत्यत्र दीपनकृतमेव चारुत्वम्। 'अपह्नुतिरभीष्टस्य किञ्चिदन्तर्ग॑तोपमा'
इति। तत्रापह्नुत्यैव शोभा। यथा—
नेयं विरौति भृङ्गाली मदेन मुखरा मुहुः।
अयमाकृष्यमाणस्य कन्दर्पधनुषो ध्वनिः।। इति।
एवमाक्षेपं विचार्योद्देशकमेणैव प्रमेयान्तरमाह-अनुक्तनिमित्तायामिति।
एकदेशस्य विगमे या गुणान्तरसंस्तुतिः।
विशेषप्रथनायासौ विशेषोक्तिरिति स्मृता॥
यथा—
स एकस्त्रीणि जयति जगन्ति कुसुमयुधः।
हरतापि तनुं यस्य शम्भुना न हृतं बलम्॥
इयं चाचिन्त्यनिमित्तेति नास्यां व्यङ्ग्यस्य सद्भावः। उक्तनिमित्तायामपि
वस्तुस्वभावमात्रत्वे पर्यवसानमिति तत्रापि न व्यङ्ग्यसद्भावशङ्का। यथा—
कर्पूर इव दग्धोऽपि शक्तिमान् यो जने जने।
नमोऽस्त्ववार्यवीर्याय तस्मै कुसुमधन्वने॥
हाथी, शरत्काल में सूखे पुलिन वाली सरिता और याचकों को दान देकर क्षीण धन वाले
लोग अपनी कृशता से शोभित होते हैं।
यहाँ चारुत्व दीपन—(अनेक में एक धर्म का अन्वयरूप दीपन—) कृत है।
'अभीष्ट (अर्थात् वर्ण्यविषय) का निषेध, जिसमें उपमा व्यंग्य होती हो, अपह्नुति
कहलाता है।' वहाँ अपह्नुति (निषेध) से ही शोभा होती है। जैसे—
'यह मदमुखर भ्रमर-पङ्क्ति बार-बार नहीं गुञ्जार कर रही है, बल्कि यह खींचे हुए
कामदेव के धनुष की आवाज है।'
इस प्रकार 'आक्षेप' का विचार करके निर्दिष्ट क्रम के अनुसार ही प्रमेयान्तर को
कहते हैं—अनुक्तनिमित्ता—।
'एकदेश के न रहने पर, कुछ अतिशय बात के ख्यापन के लिए जो गुणान्तर का
कथन होता है उसे 'विशेषोक्ति' कहते हैं।'
जैसे—
'वह फूल को बाणों वाला कामदेव अकेले ही तीनों जगत् पर विजय प्राप्त करता
है, जिसके शरीर को नष्ट करते हुए भी शिवजी ने बल को नष्ट नहीं किया।
यह विशेषोक्ति अचिन्त्यनिमित्ता है (क्योंकि शरीर के हरण होने पर भी बल के
हरण न होने का कारण नहीं कहा जा सकता)। इसलिए इसमें व्यंग्य का सद्भाव नहीं
है। 'उक्तनिमित्ता' (अर्थात् जिस विशेषोक्ति में निमित्त या कारण का कथन किया
गया होता है) में भी वस्तु के स्वभावमात्र में पर्यवसान हो जाता है, इसलिए वहाँ भी
व्यंग्य के सद्भाव की शंका नहीं। जैसे—
'कपूर के समान जला हुआ भी जो जन-जन में शक्तिमान् है उस फूलों के धनुषवाले
अवार्यवीर्य कामदेव के लिए नमस्कार है।'

प्रथम उद्योतः ११७
ध्वन्यालोकः
अनुक्तनिमित्तायामपि विशेषोक्तौ—
आहूतोऽपि सहायैर्रोमित्युक्त्वा विमुक्तनिद्रोऽपि ।
गन्तुमना अपि पथिकः सङ्कोचं नैव शिथिलयति ॥
इत्यादौ व्यङ्ग्यस्य प्रकरणसामर्थ्यात्प्रतीतिमात्रं न तु तत्प्रतीति-
निमित्ता काचिच्चारुत्वनिष्पत्तिरिति न प्राधान्यम्। पर्यायोक्तेऽपि यदि
अनुक्तनिमित्ता ‘विशेषोक्ति’ में भी—
'अपने साथियों द्वारा पुकारे जाने पर भी, 'हाँ' कहकर नींद छोड़ देने पर भी
एवं जाने की इच्छा रखता हुआ भी पथिक अधिक संकोच को शिथिल नहीं करता है।'
इत्यादि (उदाहरण) में प्रकरण की सामर्थ्य से व्यङ्ग्य की प्रतीतिमात्र हो जाती
है, न कि उस प्रतीति के कारण कोई चारुत्व की निष्पत्ति होती है अतः (व्यङ्ग्य का)
प्राधान्य नहीं है। 'पर्यायोक्त' में भी यदि प्राधान्यतः व्यङ्ग्य है तो उसका 'ध्वनि' में
लोचनम्
तेन प्रकारद्वयमवधीर्य तृतीयं प्रकारमाशङ्कते—अनुक्तनिमित्तायामपीति।
व्यङ्ग्यस्येति। शीतकृता खल्वार्तिरत्र निमित्तमिति भट्टोद्भटः, तदभिप्रायेणाह-
न त्वत्र काचिच्चारुत्वनिष्पत्तिरिति। यत्तु रसिकैरपि निमित्तं कल्पितम्-‘कान्ता-
समागमे गमनादपि लघुतरमुपायं स्वप्नं मन्यमानो निद्रागमबुद्ध्या सङ्कोचं
नात्यजत्' इति तदपि निमित्तं चारुत्वहेतुतया नालङ्कारविद्भिः कल्पितम्, अपि
तु विशेषोक्तिभाग एव न शिथिलयतीत्येवम्भूतोऽभिव्यज्यमाननिमित्तोपस्कृत-
श्चारुत्वहेतुः। अन्यथा तु विशेषोक्तिरेवेयं न भवेत्। एवमभिप्रायद्वयमपि
साधारणोक्त्या ग्रन्थकृन्न्यरूपयन्न त्वौद्भटेनैवाभिप्रायेण ग्रन्थो व्यवस्थित इति
मन्तव्यम्। पर्यायोक्तेऽपीति—
(यहाँ 'अवार्यवीर्यं' इस निमित्त का कथन है, अतः यह 'उक्तनिमित्ता' है)।
अतः (विशेषोक्ति के इन) दोनों प्रकारों को छोड़कर तीसरे प्रकार की आशङ्का
करते हैं—अनुक्तनिमित्ता में भी—। व्यङ्ग्य की—। 'भट्ट उद्भट' के अनुसार
'यहाँ शीत के कारण कष्ट निमित्त है।' इस अभिप्राय से कहते हैं—न कि उस
व्यङ्ग्य की प्रतीति के कारण कोई चारुत्व की निष्पत्ति होती है—। जो कि रसिक
जनों ने भी (यहाँ) 'निमित्त' की कल्पना की है, कि—'कान्ता के समागम के लिए
गमन करने से भी लघुतर (शीघ्रतर) उपाय स्वप्न को मानते हुए पथिक ने, जिससे
कि नींद लग जाय, इस बुद्धि से, सङ्कोच नहीं छोड़ा।' इस निमित्त को भी अलङ्कारज्ञों ने
चारुत्वहेतु के रूप में नहीं स्वीकार किया है, बल्कि अभिव्यक्त होते हुए निमित्त के द्वारा
उपस्कृत नहीं होता 'नहीं शिथिल करता है' इस प्रकार का विशेषोक्ति-अंश ही चारुत्व
का हेतु है। अन्यथा, यह विशेषोक्ति ही न होगी। इस प्रकार (उद्भट और रसिकों के)
दो अभिप्रायों को ग्रन्थकार ने सामान्य उक्ति ('व्यङ्ग्य की' यह उक्ति) द्वारा निरूपण

११८ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
प्राधान्येन व्यङ्ग्यत्वं तद्भवतु नाम तस्य ध्वनावन्तर्भावः । न तु ध्वने-
अन्तर्भाव हो भी जाय, परन्तु ध्वनि का उसमें अन्तर्भाव नहीं होगा । क्योंकि उसका
लोचनम्
पर्यायोक्तं यदन्येन प्रकारेणाभिधीयते ।
वाच्यवाचकवृत्तिभ्यां शून्येनावगमात्मना ।।
इति लक्षणम् । यथा—
शत्रुच्छेददृढेच्छस्य मुनेरुत्पथगामिनः ।
रामस्यानेन धनुषा देशिता धर्मदेशना ।। इति ।
अत्र भीष्मस्य भार्गवप्रभावाभिभावी प्रभाव इति यद्यपि प्रतीयते, तथापि
तत्सहायेन देशिता धर्मदेशनेत्यभिधीयमानेनैव काव्यार्थोऽलंकृतः । अत एव
पर्यायेण प्रकारान्तरेणावगमात्मना व्यङ्ग्येनोपलक्षितं सद्यदभिधीयते तदभिधी-
यमानमुक्तमेव सत्पर्यायोक्तमित्यभिधीयत इति लक्षणपदम्, पर्यायोक्तमिति
लक्ष्यपदम्, अर्थालङ्कारत्वं सामान्यलक्षणं चेति सर्वं युज्यते । यदि त्वभिधीयत
इत्यस्य बलाद्व्याख्यानमभिधीयते प्रतीयते प्रधानतयेति, उदाहरणं च 'भम
धम्मिअ' इत्यादि, तदालङ्कारत्वमेव दूरे सम्पन्नमात्मतायां पर्यवसानात् । तदा
चालङ्कारमध्ये गणना न कार्या । भेदान्तराणि चास्य वक्तव्यानि । तदाह—
यदि प्राधान्येनेति । ध्वनाविति । आत्मन्यन्तर्भावादात्मैवासौ नालङ्कारस्स्यादि-
किया है, न कि उद्भट के ही अभिप्राय से ग्रन्थ व्यवस्थित है, ऐसा मानना चाहिए ।
'जो प्रकारान्तर से अभिधान किया जाता है, अर्थात् और वाचक के व्यापारों से
रहित, व्यञ्जन रूप व्यापार से जो कहा जाता है वह पर्यायोक्त ( अलङ्कार ) है ।'
यह लक्षण है । जैसे—'शत्रु के विनाश की दृढ़ इच्छा वाले, उन्मार्गगामी मुनि
( परशुराम ) को ( भीष्म के ) इस धनुष ने धर्म-पालन की शिक्षा दी ।'
यहाँ यद्यपि भीष्म का भार्गव-परशुराम के प्रभाव को अभिभूत करने वाला
प्रभाव प्रतीत होता है, तथापि उस ( प्रतीयमानार्थ ) की सहायता से 'धर्म-पालन की
शिक्षा दी' इस अभिधीयमान ( वाच्यार्थ ) से ही काव्यार्थ अलङ्कृत है । अत एव
पर्याय अर्थात् प्रकारान्तर से अवगम रूप व्यङ्ग्य से उपलक्षित होकर जो अभिहित
होता है वह अभिधीयमान उक्त ही होकर 'पर्यायोक्त' कहलाता है, यह लक्षण-पद है,
एवं 'पर्यायोक्त' यह लक्ष्य-पद है । और इसका अर्थालङ्कारत्व रूप अलङ्कार का
सामान्य लक्षण है । यह सब कुछ उसमें लग जाता है । यदि—'अभिधीयते' ( 'अभिहित
होता है' ) इसका बलाद् व्याख्यान 'प्रधान रूप से प्रतीत होता है, यह करते हैं,
और 'भम धम्मिअ' इत्यादि का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं तब इसका अलङ्कारत्व ही
दूर हट जायगा, क्योंकि 'आत्मा' के रूप में इसका पर्यवसान होगा । तब अलङ्कारों
के बीच गणना न होगी । इसके भेदान्तर भी कहे जायेंगे । इसे कहते हैं—यदि प्रधान
रूप से— । ध्वनि में— । अर्थात् आत्मा में अन्तर्भाव होने से वह आत्मा ही होगा,

प्रथम उद्योतः ११५
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ध्वन्यालोकः
स्तरान्तर्भावः । तस्य महाविषयत्वेनाङ्गित्वेन च प्रतिपादयिष्यमाण-
त्वात् । न पुनः पर्यायो भामहोदाहृतसदृशे व्यङ्ग्यस्यैव प्राधान्यम् ।
वाच्यस्य तत्रोपसर्जनीभावेनाविवक्षितत्वात् ।
महाविषय रूप एवं अङ्गीरूप से प्रतिपादन करेंगे । ऐसा नहीं कि जैसा भामह ने
जिस 'पर्यायोक्त' को कहा है उसके सदृश पर्यायोक्त में व्यङ्ग्य का ही प्राधान्य है,
क्योंकि वहाँ वाच्य के उपसर्जनीभाव ( गुणीभाव ) की विवक्षा नहीं की गयी है ।
लोचनम्
त्यर्थः । तत्रेति । यादृशोऽलङ्कारत्वेन विवक्षितस्तादृशे ध्वनिर्नान्तर्भवति, न
तादृगस्माभिर्ध्वनिरुक्तः । ध्वनिहिं महाविषयः सर्वत्र भावाव्यापकः समस्तप्र-
तिष्ठास्थानत्वाच्चाङ्गी । न चालङ्कारो व्यापकोऽन्यालङ्कारवत् । न चाङ्गी,
अलङ्कार्यतन्त्रत्वात् । अथ व्यापकत्वाङ्गित्वे तस्योपगम्येते, त्यज्यते चालङ्का-
रता, तर्ह्यस्मन्नय एवायमवलम्ब्यते केवलं मात्सर्यग्रहात्पर्यायोक्तवाचेति भावः ।
न चेयदपि प्राक्तनैर्दृष्टमपि त्वस्माभिरेवोन्मीलितमिति दर्शयति-न पुनरिति ।
भामहस्य यादृक्तदीयं रूपमभिमतं तादृगुदाहरणेन दर्शितम् । तत्रापि नैव
व्यङ्ग्यस्य प्राधान्यं चारुत्वाहेतुत्वात् । तेन तदनुसारितया तत्सदृशं यदुदाहर-
णान्तरमपि कल्प्यते तत्र नैव व्यङ्ग्यस्य प्राधान्यमिति सङ्गतिः ।
यदि तु तदुक्तमुदाहरणमनादृत्य 'भम धम्मिअ' इत्याद्युदाह्रियते, तदस्म-
च्छिष्यतैव । केवलं तु नयमनवलम्ब्यापह्नवशेनात्मसंस्कार इत्यनार्यचेष्टितम् ।
अलङ्कार नहीं । वहाँ— । अलङ्कार के रूप में जैसा विवक्षित है वैसे में ध्वनि का
अन्तर्भाव नहीं होगा, हमने उस प्रकार 'ध्वनि' को नहीं कहा है । क्योंकि 'ध्वनि'
महाविषय है, सर्वत्र होने से व्यापक और सबका प्रतिष्ठान ( आधार ) होने से अङ्गी
है । अलङ्कार दूसरे अलङ्कारों की तरह व्यापक नहीं है और अङ्गी भी नहीं है, क्योंकि
वह अपने अलङ्कार्य के अधीन होता है। अगर उस ( अलङ्कार ) का व्यापकत्व एवं
अङ्गत्व मानते हैं और अलङ्कारता छोड़ देते हैं तो केवल मात्सर्यग्रह के कारण
'पर्यायोक्त' के कथन द्वारा भी हमारा पक्ष ही अवलम्बन किया जाता है—यह
मतलब है । न कि इतना भी ( व्यङ्ग्य का प्राधान्य भी ) प्राचीनों ने देखा है,
अपितु हमने ही उसका उन्मीलन किया है, इस बात को दिखाते हैं—ऐसा नहीं— ।
भामह को जैसा उसका ( पर्यायोक्त का ) रूप अभिमत था वैसा उदाहरण से दिखाया
जा चुका है। वहाँ भी व्यङ्ग्य का प्राधान्य नहीं है, क्योंकि व्यङ्ग्य वहाँ चारुत्व का
कारण नहीं है। इसलिए उसका अनुसरण करके जो कुछ दूसरा भी तत्सदृश
उदाहरण देंगे वहाँ भी व्यङ्ग का प्राधान्य नहीं होगा—यह ( ग्रन्थ की ) सङ्गति है ।
यदि उन ( भामह ) के कहे उदाहरण को हटाकर 'भम धम्मिअ०' इत्यादि को
उदाहरण देते हैं तो हमारा शिष्य ही बनते हैं। केवल न्याय का अवलम्बन न करके

१२० सलोचन-ध्वन्यालोकः
लोचनम्
यदाहुरैतिहासिकाः—'अवज्ञाप्यापवच्छाद्य शृण्वन्नरकमृच्छति' इति । भामहेन
ह्युदाहृतम्—
'गृहेष्वध्वसु वा नान्नं भुञ्ज्महे यदधीतिनः ।
विप्रा न भुञ्जते' इति ।
एतद्धि भगवद्वासुदेववचनं पर्यायेण रसदानं निषेधति । यत्स एवाह—'तच्च
रसदाननिवृत्तये' इति । न चास्य रसदाननिषेधस्य व्यङ्ग्यस्य किञ्चिच्चारुत्व-
मस्ति येन प्राधान्यं शङ्क्येत । अपि तु तद्व्यङ्ग्योपोद्वलितं विप्रभोजनेन विना
यन्नभोजनं तदेवोक्तप्रकारेण पर्यायोक्तं सत्प्राकरणिकं भोजनार्थमलङ्कुरुते । न
ह्यस्य निर्विषं भोजनं भवत्विति विवक्षितमिति पर्यायोक्तमलङ्कार एवेति
अपश्रवण द्वारा आत्मा का संस्कार यह अनार्य-चेष्टा है । जैसा कि ऐतिहासिकों ने
कहा है—'(विद्या में एवं गुरु के प्रति) अवज्ञा से आत्मापप्लव करके सुनता हुआ
व्यक्ति नरक जाता है।' भामह ने उदाहरण दिया है—
'जिस अन्न को स्वाध्याय करने वाले विप्रलोग नहीं खाते उसे हम लोग घरों में
और मार्गों में नहीं खाते हैं।'
यह भगवान् वासुदेव का वचन 'पर्याय' द्वारा (प्रकारान्तर से) रसदान
(विषदान) का निषेध करता है। जो कि वे ही कहते हैं—'रसदान (विषदान) की
निवृत्ति के लिए।' इस विषदान के निषेध रूप व्यङ्ग्य का कोई चारुत्व नहीं है, जिससे
उसके प्राधान्य की शङ्का होगी। बल्कि उस व्यङ्ग्य से उपोद्वलित 'विप्रभोजन के
बिना जो नहीं भोजन है' वही उक्त (पर्याय के) प्रकार से पर्यायोक्त होकर प्राकरणिक
भोजन के अर्थ को अलङ्कृत करता है। वासुदेव श्रीकृष्ण का (शिशुपाल के प्रति)
यह विवक्षित नहीं है कि विषरहित भोजन हो इस² प्रकार पर्यायोक्त अलङ्कार ही
१. यह निर्देश पहले ही कर चुके हैं कि आचार्य भामह ने जो 'पर्यायोक्त' अलङ्कार का
उदाहरण दिया है उसमें व्यङ्ग्य की प्रधानता नहीं है। स्वयं उन्होंने 'अभिधीयते' कह-कर व्यङ्ग्य
की अपेक्षा वाच्य को प्रधानता दी है। यदि इस बात को न स्वीकार करके 'भम धम्मिअ' इत्यादि
को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते हैं तब स्वयं ध्वनिमार्ग के पक्षपाती बनकर हमारी शिष्यता
स्वीकार करते हैं। क्योंकि इस स्थल में व्यंग्य की प्रधानता है और तदपेक्षया वाच्य गुणीभूत है।
इस प्रकार यह 'ध्वनि' का उदाहरण है। ऐसी स्थिति में 'पर्यायोक्त' कोई अलङ्कार नहीं रह जाता
है बल्कि वह अलङ्कार्य होकर अलङ्कार-ध्वनि की स्थिति को प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार अनायास
ध्वनि का यहाँ प्रसंग उपस्थित हो जाता है। इस प्रकार वादी ने स्वयं ध्वनि को स्वीकार कर लिया
और ध्वनिवादी आचार्य का बेढंगा 'शिष्य' हुआ। 'बेढंगा' इसलिए कि उसने परम्परा से गुरु के
यहाँ उपस्थित होकर अध्ययन नहीं किया और स्वयं गुरु की बात तक जैसे-तैसे पहुँच गया।
नियमतः शिष्य को गुरु के मुख से ही शास्त्रार्थ का श्रवण करना चाहिए, यही आर्य-परम्परा है।
यदि शिष्य ने ऐसा न किया और विद्या ग्रहण कर लिया तो उसके इस प्रयत्न को 'अपश्रवण' और
'अनार्यचेष्टित' कहा जाता है।
२. भगवान् कृष्ण का यह अभिप्राय है कि शिशुपाल कहीं अन्न के साथ मुझे विष न दे दे, इस
लिए वह पहले ब्राह्मणों को खिला कर स्वयं खाने की बात करते हैं। इस प्रकार प्रस्तुत उदाहरण में

२. द्वितीय उद्योत: अविवक्षितवाच्य एवं विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि-भेद निरूपण

प्रथम उद्योतः १२१
ध्वन्यालोकः
अपह्नुतिदीपकयोः पुनर्वाच्यस्य प्राधान्यं व्यङ्ग्यस्य चानुयायित्वं
प्रसिद्धमेव ।
और फिर अपह्नुति और दीपक (अलङ्कारों) में वाच्य का प्राधान्य और व्यङ्ग्य का
अनुयायित्व प्रसिद्ध ही है ।
लोचनम्
चिरन्तनानामभिमत इति तात्पर्यम् । अपह्नुतिदीपकयोरिति । एतत्पूर्वमेव
निर्णीतम् । अत एवाह—प्रसिद्धमिति । प्रतीतं प्रसाधितं प्रामाणिकं चेत्यर्थः ।
पूर्वं चैतदुपमादिव्यपदेशभाजनमेव तद्यथा न भवतीत्यमुया छायया दृष्टान्त-
तयोक्तमप्युद्देशकूमपूरणाय ग्रन्थशय्यां योजयितुं पुनरप्युक्तं 'व्यङ्ग्यप्राधान्या-
भावान्न ध्वनिरि'ति छायान्तरेण वस्तु पुनरेकमेवोपमाया एव व्यङ्ग्यत्वेन
ध्वनित्वाशङ्कनात् । यत्तु विवरणकृत्—दीपकस्य सर्वत्रोपमान्वयो नास्तीति
बहुनोदाहरणप्रपञ्चेन विचारितवांस्तदनुपयोगि निस्सारं सुप्रतिक्षेपं च ।
प्राचीनों का अभिमत है, यह तात्पर्य है । अपह्नुति और दीपक में— । यह पहले
ही निर्णय कर चुके हैं । अत एव कहते हैं—प्रसिद्ध— । अर्थात् प्रतीत, प्रसाधित
एवं प्रामाणिक है । पहले तो यह 'उपमादि के व्यपदेश का भाजन ही जिस प्रकार
नहीं हो सकता' इस प्रकार से दृष्टान्त के रूप में उक्त होकर भी उद्देश क्रम की पूर्ति
के लिए एवं ग्रन्थशय्या की योजना¹ के लिए फिर भी कहा है—'व्यङ्ग्य का प्राधान्य
न होने के कारण ध्वनि नहीं है ।' प्रकारान्तर से ( अप्राधान्य रूप ) वस्तु एक ही है
इस प्रकार उपमा के व्यङ्ग्य होने से 'ध्वनि' की शङ्का नहीं । जो कि विवरणकार ने—
'दीपक का सर्वत्र उपमा से सम्बन्ध नहीं है' यह बहुत से उदाहरण—प्रपञ्च द्वारा
विचार किया है, वह उपयोगी नहीं, तथा निःसार एवं सहज ही निराकरणीय है ।
रस अर्थात् विष के दान का निषेध पर्याय या प्रकारान्तर से है व्यंग्य, किन्तु यह व्यङ्ग्य आगे
की 'तच्च रसदाननिवृत्तये' ( विषदान की निवृत्ति के लिए ) इस उक्ति से अभिहित हो जाता है ।
इस प्रकार यह पर्यायोक्त अलङ्कार है । क्योंकि अभिहित हो जाने के कारण व्यंग्य का चमत्कार
जाता रहता है ।
१. पहले 'समासोक्ति' और 'आक्षेप' के प्रसंग में यह भी सिद्धान्ततः आचार्य ने कहा था कि
व्यंग्य और वाच्य में जो चारुत्वयुक्त होने के कारण प्रधान होता है उसी के आधार पर व्यपदेश
भी होता है । इसके उदाहरणस्वरूप उन्होंने वहाँ दीपक और अपह्नुति की चर्चा की थी, जिनमें
उपमा व्यंग्य होती हुई भी प्राधान्यतः विवक्षित नहीं है । प्रस्तुत में पुनः अपह्नुति और दीपक
अलङ्कारों के उल्लेख पहले उल्लिखित अलङ्कारों के उद्देशक्रम की पूर्ति करने एवं ग्रन्थशय्या की
योजना के उद्देश्य से ग्रन्थकार ने किया है । समासोक्ति, आक्षेप, अनुक्तनिमित्त विशेषोक्ति,
पर्यायोक्त, अपह्नुति, दीपक और सङ्कर अलङ्कारों का नामोल्लेख किया है । इसी क्रम में पर्यायोक्त
के बाद अपह्नुति और दीपक की यहाँ चर्चा हुई है ।

१२२ सलोचन-ध्वन्यालोकः

ध्वन्यालोकः

सङ्करालङ्कारेऽपि यदालंकारोऽलंकारान्तरच्छायामनुगृह्णाति, तदा
व्यङ्ग्यस्य प्राधान्येनाविवक्षितत्वान्न ध्वनिविषयत्वम् ।
सङ्करालङ्कार में भी जब अलङ्कार दूसरे अलङ्कार की छाया (सौन्दर्य) को
अनुगृहीत (पुष्ट) करता है तब व्यङ्ग्य के प्राधान्यतः विवक्षित न होने पर ध्वनि
का विषय नहीं होता।

लोचनम्

'मदो जनयति प्रीतिं सानङ्गं मानभञ्जनम् ।
स प्रियासङ्गमोत्कण्ठां सासह्यां मनसः शुचम् ॥ इति ॥
अत्राप्युत्तरोत्तरजन्यत्वेऽप्युपमानोपमेयभावस्य सुकल्पत्वात् । न हि
क्रमिकाणां नोपमानोपमेयभावः । तथा हि—
राम इव दशरथोऽभूद्दशरथ इव रघुरजोऽपि रघुसदृशः ।
अज इव दिलीपवंशश्चित्रं रामस्य कीर्तिरियम् ॥
इति न न भवति। तस्मात्क्रमिकत्वं समं वा प्राकरणिकत्वमुपमां
निरुणद्धीति कोऽयं त्रास इत्यलं गर्द्दभीदोहानुवर्तनेन । सङ्करालङ्कारेऽपीति ।
'मद प्रीति उत्पन्न करता है, वह (प्रीति) मान को दूर करने वाले अनङ्ग को,
वह (अनङ्ग) प्रियतमा के सङ्गम की उत्कण्ठा को और वह (उत्कण्ठा) मन के
शोक को।'
यहाँ उत्तरोत्तर उत्पन्न होने पर भी उपमानोपमेयभाव सहज ही बन सकता है। यह
नहीं कि क्रमिकों का उपमानोपमेयभाव नहीं होता। जैसा कि—
राम के सदृश दशरथ हुए, दशरथ के सदृश रघु, रघु के सदृश अज एवं अज के
समान दिलीप का वंश। इस प्रकार राम की कीर्ति आश्चर्ययुक्त है।
यहाँ (उपमानोपमेयभाव) नहीं है यह नहीं। इस लिए क्रमिकत्व, सम अथवा
प्राकरणिकत्व उपमा को रोक लेता है, यह कौन सा त्रास है ? अब गर्दभी को बार-बार
दुहना ठीक नहीं। सङ्करालङ्कार में भी— ।


१. 'लोचन' में निर्दिष्ट 'सङ्करालङ्कार' के सम्बन्ध में संक्षिप्त किन्तु स्पष्टार्थ विचार यह है कि
भामह आदि ने 'सङ्कर' के चार प्रकार गिनाए हैं, जब कि आगे चल कर उसके तीन ही प्रकार
निर्दिष्ट किए जाते हैं। तीन प्रकार हैं—अङ्गाङ्गिभावसङ्कर, एकाश्रयानुप्रवेशसङ्कर और सन्देहसङ्कर ।
भामह ने एकाश्रयानुप्रवेश को एकवाक्यानुवर्तन और एकवाक्यांशसमावेश इन दो रूपों में विभक्त
कर दिया है !
जैसा कि 'सन्देह' सङ्कर का उदाहरण 'सरसिजवदना' आदि है वहाँ रूपक के अनुसार समास
करने पर, कि 'शशी एव वदनं यस्याः सा' और उपमा के अनुसार समास करने पर, 'शशिवद्
वदनं यस्याः सा' रूप होंगे। तीनों विशेषण क्रमशः आकाश, जल और स्थल से सम्बन्ध होने से
नायिका का उसमें सम्भव होना बोधित होता है। यहाँ पर कोई प्रमाण नहीं जिसके आधार पर

प्रथम उद्योतः १२३
लोचनम्
विरुद्धालंक्रियोल्लेखे समं तद्वृत्त्यसम्भवे ।
एकस्य च ग्रहे न्यायदोषाभावे च सङ्करः ॥
इति लक्षणादेकः प्रकारः । यथा ममैव-
शशिवदनाऽसितसरसिजनयना सितकुन्ददशनपङ्क्तिरियम् ।
गगनजलस्थलसम्भवहृद्याकारा कृता विधिना ॥ इति ॥
अत्र शशी वदनमस्याः तद्वद्वा वदनमस्या इति रूपकोपमोल्लेखाद्युगपद्
द्वयासम्भवादेकतरपक्षत्यागग्रहणे प्रमाणाभावत्सङ्कर इति व्यङ्ग्यवाच्यतया
एवानिश्चयात्क्व ध्वनिसम्भावना । योऽपि द्वितीयः प्रकारः- शब्दार्थालङ्काराणा-
मेकत्रभाव इति तत्रापि प्रतीयमानस्य का शङ्का । यथा-‘स्मर स्मरमिव प्रियं
रमयसे यमालिङ्गनात्’ इति । अत्रैव यमकमुपमा च । तृतीयः प्रकारः-यत्रैकत्र
वाक्यांशेऽनेकोऽर्थालङ्कारस्तत्रापि द्वयोः साम्यात्कस्य व्यङ्ग्यता । यथा-
विरुद्ध दो अलङ्कारों के उपस्थित होने पर, एक ही स्थान में दोनों की स्थिति
सम्भव न होने पर और उनमें से एक को छोड़कर दूसरे के ग्रहण करने में साधक एवं
बाधक के अभाव में सङ्कर ( सन्देह सङ्कर ) होता है ।
इस लक्षण से एक प्रकार का सङ्कर हुआ । जैसे, मेरा ही-
‘शशिवदना, नीलकमलनयना, उज्ज्वलकुन्ददन्तावली इस नायिका को विधाता ने
आकाश, जल और स्थल में उत्पन्न होने वाले मनोहर पदार्थों के आकार वाली
बनाया है ।’
यहाँ शशी वदन है इसका, अथवा शशी के समान वदन है इसका, यह रूपक
और उपमा दो अलङ्कारों के उल्लेख से एक स्थान में दोनों के सम्भव न होने के
कारण तथा एकतर पक्ष के त्याग अथवा ग्रहण में प्रमाण के अभाव होने से ‘सङ्कर’
अलङ्कार है, इस प्रकार जब ‘सङ्कर’ के व्यङ्ग्य होने अथवा वाच्य होने में ही कोई
निश्चय नहीं तब इसके ‘ध्वनि’ होने की सम्भावना कैसी ? जो कि दूसरा (सङ्कर
अलङ्कार का ) प्रकार है-शब्दालङ्कार और अर्थालङ्कार का एकत्र भाव, वहाँ भी
प्रतीयमान की सम्भावना कैसी ? जैसे-‘काम के सदृश प्रिय को याद कर जिसे
आलिङ्गन के द्वारा तू रमाती है ।’ यहीं यमक और उपमा है । तीसरा प्रकार-जहाँ
एक वाक्यांश में अनेक अर्थालङ्कार हैं, वहाँ भी दो के बराबर होने से किसकी व्यङ्ग्यता
होगी ? जैसे-
यह माना जाय कि उपमा और रूपक में से कोई एक है। इस प्रकार यहाँ दोनों का सन्देह रूप
सङ्कर है।
दूसरा प्रकार है, शब्द और अर्थ के अलङ्कारों का एक वाक्य में प्रवेश । तीसरा प्रकार है एक
वाक्यांश में अनेक अर्थालङ्कार । द्वितीय प्रकार के उदाहरण में ‘स्मर-स्मर’ इस आवृत्ति से यमक
( शब्दालङ्कार ) है और ‘स्मर’ ( काम ) के सदृश’ ( स्मरमिव ) यह उपमा ( अर्थालङ्कार ) । इस
प्रकार दोनों का एकाश्रयानुवेश है । तीसरे प्रकार के उदाहरण में सूर्य स्वामी है और वासर सेवक
हैं । सूर्य का अस्त होना स्वामी पर विपत्ति है और वासर का तमोगुहा में प्रवेश समुचित

१२४सलोचन-ध्वन्यालोकः

लोचनम्
तुल्योदयावसानत्वादृतेऽस्तं प्रति भास्वति ।
वासाय वासरः क्लान्तो विशतीव तमोगुहाम् ॥ इति ॥
अत्र हि स्वामिविपत्तिसमुचितव्रतग्रहणहेवाकिकुलपुत्रकरूपणमेकदेशविव-
र्त्तिरूपकं दर्शयति । उत्प्रेक्षा चेवशब्देनोक्ता । तदिदं प्रकारद्वयमुक्तम् ।
शब्दार्थवर्त्त्यलङ्कारा वाक्य एकत्र वर्त्तिनः ।
सङ्करश्चैकवाक्यांशप्रवेशाद्वाऽभिधीयते ॥ इति च ॥
चतुर्थस्तु प्रकारो यत्रानुग्राह्यानुग्राहकभावोऽलङ्काराणाम् । यथा—
प्रवातनीलोत्पलनिर्विशेषमधीरविप्रेक्षितमायताक्ष्या ।
तया गृहीतं नु मृगाङ्गनाभ्यस्ततो गृहीतं नु मृगाङ्गनाभिः ॥
अत्र मृगाङ्गनावलोकनेन तदवलोकनस्योपमा यद्यपि व्यङ्ग्या, तथापि
वाच्यस्य सा सन्देहालङ्कारस्याभ्युत्थानकारिणीत्वेनानुग्राहकत्वाद् गुणीभूता,
अनुग्राह्यत्वेन हि सन्देहे पर्यवसानम् । यथोक्तम्—
'जिसका उदय और अस्त दोनों समान ही हैं ऐसे सूर्य के अस्तङ्गत होने पर
म्लान वासर मानों अन्धकार की गुहा में प्रवेश कर रहा है।'
यहाँ ('अन्धकार की गुहा' इस स्थल का) एकदेशविवर्तिरूपक स्वामी की विपत्ति
के समय समुचित व्रतग्रहण में प्रयत्नशील कुलपुत्र के रूपण को दर्शाता है। और
'इव' शब्द से उत्प्रेक्षा उक्त है। इस सङ्कर के दो प्रकार कहे गए।
एक ही वाक्य में शब्दालङ्कार और अर्थालङ्कार दोनों होते हैं, यह सङ्कर है,
अथवा एक ही वाक्यांश में अनेक अर्थालङ्कारों का प्रवेश होता है तब भी सङ्कर
कहा जाता है।
चौथा प्रकार वह है अलङ्कारों का अनुग्राह्यानुग्राहकभाव होता है, जैसे—
'दीर्घ लोचनों वाली उस (पार्वती) ने वायु से हिलते हुए नीलोत्पल के सदृश अधीर
दृष्टिपात को मृगाङ्गनाओं से ग्रहण किया है अथवा मृगाङ्गनाओं ने उससे ग्रहण किया।'
यहाँ मृगाङ्गनाओं के अवलोकन से पार्वती के अवलोकन की उपमा यद्यपि व्यङ्ग्य
हो रही है, तथापि वाच्य सन्देहालङ्कार के अभ्युत्थान करने वाली होने के कारण वह
(व्यङ्ग्य उपमा) गुणीभूत है। क्योंकि अनुग्राह्य होने के कारण सन्देह में उसका
(अनुग्राहिका व्यङ्ग्य उपमा का) पर्यवसान है। जैसा कि कहा है—


व्रतग्रहण है। पर इनका आरोप नहीं हुआ है, केवल 'तमोगुहा' में एकदेशविवर्ती रूपक है।
'विशतीव' 'मानों प्रवेश करता है', यहाँ उत्प्रेक्षा है। यहाँ रूपक और उत्प्रेक्षा दोनों समानरूप
से वाच्य हैं।
चतुर्थ प्रकार है अङ्गाङ्गिभावरूप सङ्कर। उदाहरण में जो पार्वती के चञ्चल नेत्रों और हरिणी
के चञ्चल नेत्रों में जो अधीर-विप्रेक्षित के आदान-प्रदान का सन्देह कवि ने किया है वहाँ 'पार्वती
की चञ्चल आँखें हरिणी की आँखों के समान हैं, यह उपमा व्यंग्य हो रही है, किन्तु वह वाच्य
सन्देह अलङ्कार का अभ्युत्थान करती है अतः अनुग्राहक होने के कारण गुणीभूत हो गई है।
उसका पर्यवसान सन्देह में होता है।

प्रथम उद्योतः १२५
ध्वन्यालोकः
अलङ्कारद्वयसम्भावनायां तु वाच्यव्यङ्ग्ययोः समं प्राधान्यम् ।
अथ वाच्योपसर्जनीभावेन व्यङ्ग्यस्य तत्रावस्थानं तदा सोऽपि
ध्वनिविषयोऽस्तु, न तु स एव ध्वनिरिति वक्तुं शक्यम् । पर्यायोक्त-
निर्दिष्टन्यायात् ।
दो अलङ्कारों की सम्भावना में तो वाच्य और व्यङ्ग्य का प्राधान्य बराबर
है । यदि कहिये कि वाच्य को गुणीभूत करके व्यङ्ग्य का वहाँ अवस्थान है तब
वह भी 'ध्वनि' का विषय हो सकता है, न कि वही 'ध्वनि' है, ऐसा कह सकते
हैं । जैसा कि 'पर्यायोक्त' में ढंग दिखा चुके हैं ।
लोचनम्
परस्परोपकारेण यत्रालङ्कृतयः स्थिताः ।
स्वातन्त्र्येणात्मलाभं नो लभन्ते सोऽपि सङ्करः ॥
तदाह-यदालङ्कार इत्यादि । एवं चतुर्थेऽपि प्रकारे ध्वनिता निराकृता ।
मध्यमयोस्तु व्यङ्ग्यसम्भावनैव नास्तीत्युक्तम् । आद्ये तु प्रकारे 'शशिवदने'त्या-
युदाहृते कथञ्चिदस्ति सम्भावनेत्याशङ्क्य निराकरोति—अलङ्कारद्वयेति ।
सममिति । द्वयोरप्यान्दोल्यमानत्वादिति भावः । ननु यत्र व्यङ्ग्यमेव प्राधान्येन
भाति तत्र किं कर्तव्यम् । यथा—
होइ ण गुणाणुराओ खलाणं णवरं प्रसिद्धिसरणाणम् ।
किर पहिणुसइ ससिमणं चन्दे पिआमुहे दिट्ठे ॥
अत्रार्थान्तरन्यासस्तावद्वाच्यत्वेनाभाति, व्यतिरेकापह्नुती तु व्यङ्ग्यत्वेन
प्रधानतयेत्यभिप्रायेणाशङ्कते—अथेति । तत्रोत्तरम्—तदा सोऽपीति । सङ्करा-
'जहाँ परस्पर उपकार-पूर्वक अलङ्कार स्थित हैं और स्वतन्त्र रूप से आत्मलाभ
नहीं प्राप्त करते हैं, वह भी 'सङ्कर' है ।'
उसे कहते हैं—जब अलङ्कार इत्यादि— । इस प्रकार (सङ्कर) के चौथे प्रकार
में भी ध्वनित्व का निराकरणीय किया । बिचले दो प्रकारों में तो व्यङ्ग्य की
सम्भावना ही नहीं है, यह कहा । 'शशिवदना०' इत्यादि उदाहृत (सङ्कर के) पहले
प्रकार में किसी प्रकार सम्भावना है, यह आशङ्का करके निराकरण करते हैं—दो
अलङ्कारों— । बराबर— । भाव यह कि क्योंकि दोनों ही आन्दोल्यमान (सन्दिह्यमान)
हैं । जहाँ व्यङ्ग्य ही प्राधान्यतः मालूम होता है—वहाँ क्या करेंगे ? जैसे—
'केवल प्रसिद्धि पर ही ध्यान देने वाले (वस्तुतत्त्व का विचार न रखने वाले)
खल जनों के गुणानुराग नहीं होता । चन्द्रकान्त मणि चन्द्र को देखकर प्रस्रुत होता है,
प्रिया के मुख को देखकर नहीं प्रस्रुत होता ।'
यहाँ¹ 'अर्थान्तरन्यास' वाच्यरूप से मालूम पड़ता है, किन्तु 'व्यतिरेक' और
१. सामान्य का विशेष से समर्थनरूप यहाँ 'अर्थान्तरन्यास' अलङ्कार है, जो वाच्य है । क्योंकि

१२६ | सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
अपि च सङ्करालङ्कारेऽपि च क्वचित् सङ्करोक्तिरेव ध्वनि-
सम्भावनां निराकरोति ।
दूसरे यह कि सर्वत्र 'सङ्करालङ्कार' में ( कहीं भी सङ्करालङ्कार में ) 'सङ्कर'
यह कथन ही ध्वनि की सम्भावना का निराकरण कर देता है ।
लोचनम्
लङ्कार एवायं न भवति, अपि त्वलङ्कारध्वनिनामायं ध्वनेर्द्वितीयो भेदः । यच्च
'पर्यायोक्ते निरूपितं तत्सर्वमत्राप्यनुसरणीयम् । अथ सर्वेषु सङ्करप्रभेदेषु व्यङ्ग्य-
सम्भावनानरासप्रकारं साधारणमाह—अपि चेति । 'क्वचिदपि सङ्करालङ्कारे
चे'ति सम्बन्धः, सर्वभेदभिन्न इत्यर्थः । सङ्कीर्णता हि मिश्रत्वं लोलीभावः, तत्र
कथमेकस्य प्राधान्यं क्षीरजलवत् ।
अधिकारादपेतस्य वस्तुनोऽन्यस्य या स्तुतिः ।
अप्रस्तुतप्रशंसा सा त्रिविधा परिकीर्त्तिता ॥
'अपह्नुति' व्यङ्ग्य रूप से प्रधानतया मालूम पड़ते हैं, इस अभिप्राय से आशङ्का
करते हैं—यदि कहिए कि— । उस सम्बन्ध में उत्तर है—तब वह भी— ।
सङ्करालङ्कार ही यह नहीं है, अपितु अलङ्कार-ध्वनि नाम का यह 'ध्वनि' का दूसरा
भेद है । और पर्यायोक्त के प्रसङ्ग में जो निरूपण किया है वह सब यहाँ अनुसरणीय
है । अब, 'सङ्कर' के समस्त प्रभेदों में व्यङ्ग्य की सम्भावना के साधारण निरास का
प्रकार कहते हैं—'कहीं भी सङ्करालङ्कार में' यह वाक्य का सम्बन्ध है, अर्थात् सब
भेदों से भिन्न ( सङ्कर के किसी भेद में ) । क्योंकि सङ्कीर्णता अर्थात् मिश्रित होना,
लोलीभाव ( बिल्कुल एक में मिलकर एकाकार हो जाना ) है । वहाँ क्षीर और जल की
भाँति एक ही प्रधानता कैसे होगी ?
'अधिकार ( प्रस्तुतत्व ) से रहित ( अप्रस्तुत ) अन्य वस्तु की जो स्तुति ( कथन या
वर्णन ) होती है उसे 'अप्रस्तुत' प्रशंसा' कहते हैं, वह तीन प्रकार की कही जाती है ।'
यहाँ प्रसिद्धि के पक्षपाती खलजनों का गुणों में अनुराग नहीं होता इस सामान्य अर्थ का समर्थन
'चन्द्रकान्त चन्द्र के दिखने पर पिघलता है, प्रियामुख के नहीं' इस विशेष अर्थ द्वारा समर्थन
अभिहित हुआ है । इससे 'प्रियामुख चन्द्र से भी ज्यादा सुन्दर है' यह 'व्यतिरेक' तथा यह चन्द्र
नहीं है प्रियामुख ही चन्द्र है यह 'अपह्नुति' व्यंग्य प्राधान्यतः प्रतीत होता है ।
१. अप्रस्तुत प्रशंसा अर्थात् अप्रस्तुत से प्रस्तुत का आक्षेप । तात्पर्य यह कि अप्रस्तुत अभिधीय-
मान होता है और प्रस्तुत प्रतीयमान । किन्तु इतने से 'ध्वनि' का प्रसंग उपस्थित नहीं होता,
बल्कि अभिधीयमान से प्रतीयमान में अधिक चारुत्व होना चाहिए, तत्प्रयुक्त प्राधान्य होना
चाहिए । अप्रस्तुत प्रशंसा के तीन भेद हैं—सामान्यविशेषभावमूलक, कार्यकारणभावमूलक
( निमित्तनिमित्तिभावमूलक ) और सादृश्यमूलक । पहले दो भेदों के दो-दो रूप हैं—अप्रस्तुत
सामान्य से प्रस्तुत विशेष का आक्षेप और अप्रस्तुत विशेष से प्रस्तुत सामान्य का आक्षेप तथा
अप्रस्तुत कारण से प्रस्तुत कार्य का आक्षेप और अप्रस्तुत कार्य से प्रस्तुत कारण का आक्षेप । ये चार

प्रथम उद्योतः १२७
ध्वन्यालोकः
अप्रस्तुतप्रशंसायामपि यदा सामान्यविशेषभावान्निमित्तनिमित्ति-
भावाद्वा अभिधीयमानस्याप्रस्तुतस्य प्रतीयमानेन प्रस्तुतेनाभिसम्बन्ध-
स्तदाभिधीयमानप्रतीयमानयोः सममेव प्राधान्यम् ।
'अप्रस्तुतप्रशंसा' में भी जब सामान्य विशेष भाव से अथवा निमित्त-निमित्तिभाव
से अभिधीयमान अप्रस्तुत का प्रतीयमान प्रस्तुत से सम्बन्ध होता है तब अभिधीय-
मान और प्रतीयमान का प्राधान्य सम ( बराबर ) ही होता है ।
लोचनम्
अप्रस्तुतस्य वर्णनं प्रस्तुताक्षेपिण इत्यर्थः । स चाक्षेपस्त्रिविधो भवति—
सामान्यविशेषभावात्, निमित्तनिमित्तिभावात्, सारूप्याच्च । तत्र प्रथमे प्रकार-
द्वये प्रस्तुताप्रस्तुतयोस्तुल्यमेव प्राधान्यमिति प्रतिज्ञां करोति-अप्रस्तुतेत्यादिना
प्राधान्यमित्यन्तेन । तत्र सामान्यविशेषभावेऽपि द्वयी गतिः—सामान्यमप्राकर-
णिकं शब्देनोच्यते, गम्यते तु प्राकरणिको विशेषः स एकः प्रकारः । यथा—
अहो संसारनैर्घृण्यमहो दौरात्म्यमापदाम् ।
अहो निसर्गजिह्मस्य दुरन्ता गतयो विधेः ॥
अत्र हि दैवप्राधान्यं सर्वत्र सामान्यरूपमप्रस्तुतं वर्णितं सत्प्रकृते वस्तुनि
क्वापि विनष्टे विशेषात्मनि पर्यवस्यति । तत्रापि विशेषांशस्य सामान्येन व्याप्त-
अर्थात् प्रस्तुत का आक्षेप करने वाले अप्रस्तुत का वर्णन । वह 'आक्षेप' तीन
प्रकार का होता है—सामान्यविशेषभाव से, निमित्तनिमित्तिभाव से और सारूप्य से ।
उनमें प्रथम दो प्रकारों में प्रस्तुत और अप्रस्तुत का प्राधान्य तुल्य ( बराबर ) ही है,
यह प्रतिज्ञा करते हैं—अप्रस्तुत से लेकर प्राधान्य—इस अन्त तक । उनमें, सामान्य-
विशेषभाव में भी दो अवस्थाएं हैं—जहाँ सामान्य अप्राकरणिक है और शब्द से कहा
जाता है, तथा विशेष प्राकरणिक है और व्यञ्जित होता है, वह एक प्रकार है । जैसे—
'उफ, संसार की यह कितनी कठोरता है, उफ, आपत्तियों की यह कितनी क्रूरता
है, उफ, स्वभावतः कुटिल दैव की गतियों का पार पाना कितना कठिन है !'
यहाँ दैव ( विधाता ) का प्राधान्य सामान्यरूप अप्रस्तुत कहा जाता हुआ किसी
प्रकृत विनष्ट वस्तु के विशेष रूप में पर्यवसन्न होता है । वहाँ भी विशेष अंश के
सामान्य से व्याप्त होने के कारण व्यङ्ग्य विशेष की भाँति वाच्य सामान्य का भी
भेद तथा एक सादृश्यमूलक भेद मिलकर अप्रस्तुतप्रशंसा पाँच प्रकार की होती है । सादृश्यमूलक
के भी तीन प्रभेद किए गए हैं—श्लेषनिमित्तक, समासोक्तिनिमित्तक एवं सादृश्यमात्रनिमित्तक ।
इनमें सादृश्यमूलक भेद को छोड़कर अन्य चार भेदों में अप्रस्तुत (वाच्य) और प्रस्तुत (प्रतीयमान)
दोनों सम-प्राधान्य होते हैं । इसलिए उनमें ध्वनि का अवसर ही नहीं । किन्तु सादृश्यमूलक भेद
में जब अभिधीयमान अप्रस्तुत का अप्राधान्य और प्रतीयमान प्रस्तुत का प्राधान्य विवक्षित
होगा तब अलङ्कारध्वनि का प्रसंग होगा और यदि विवक्षित नहीं होगा तब केवल अप्रस्तुतप्रशंसा
अलङ्कार होगा ।