ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम उद्योतः ११७
ध्वन्यालोकः
अनुक्तनिमित्तायामपि विशेषोक्तौ—
आहूतोऽपि सहायैर्रोमित्युक्त्वा विमुक्तनिद्रोऽपि ।
गन्तुमना अपि पथिकः सङ्कोचं नैव शिथिलयति ॥
इत्यादौ व्यङ्ग्यस्य प्रकरणसामर्थ्यात्प्रतीतिमात्रं न तु तत्प्रतीति-
निमित्ता काचिच्चारुत्वनिष्पत्तिरिति न प्राधान्यम्। पर्यायोक्तेऽपि यदि
अनुक्तनिमित्ता ‘विशेषोक्ति’ में भी—
'अपने साथियों द्वारा पुकारे जाने पर भी, 'हाँ' कहकर नींद छोड़ देने पर भी
एवं जाने की इच्छा रखता हुआ भी पथिक अधिक संकोच को शिथिल नहीं करता है।'
इत्यादि (उदाहरण) में प्रकरण की सामर्थ्य से व्यङ्ग्य की प्रतीतिमात्र हो जाती
है, न कि उस प्रतीति के कारण कोई चारुत्व की निष्पत्ति होती है अतः (व्यङ्ग्य का)
प्राधान्य नहीं है। 'पर्यायोक्त' में भी यदि प्राधान्यतः व्यङ्ग्य है तो उसका 'ध्वनि' में
लोचनम्
तेन प्रकारद्वयमवधीर्य तृतीयं प्रकारमाशङ्कते—अनुक्तनिमित्तायामपीति।
व्यङ्ग्यस्येति। शीतकृता खल्वार्तिरत्र निमित्तमिति भट्टोद्भटः, तदभिप्रायेणाह-
न त्वत्र काचिच्चारुत्वनिष्पत्तिरिति। यत्तु रसिकैरपि निमित्तं कल्पितम्-‘कान्ता-
समागमे गमनादपि लघुतरमुपायं स्वप्नं मन्यमानो निद्रागमबुद्ध्या सङ्कोचं
नात्यजत्' इति तदपि निमित्तं चारुत्वहेतुतया नालङ्कारविद्भिः कल्पितम्, अपि
तु विशेषोक्तिभाग एव न शिथिलयतीत्येवम्भूतोऽभिव्यज्यमाननिमित्तोपस्कृत-
श्चारुत्वहेतुः। अन्यथा तु विशेषोक्तिरेवेयं न भवेत्। एवमभिप्रायद्वयमपि
साधारणोक्त्या ग्रन्थकृन्न्यरूपयन्न त्वौद्भटेनैवाभिप्रायेण ग्रन्थो व्यवस्थित इति
मन्तव्यम्। पर्यायोक्तेऽपीति—
(यहाँ 'अवार्यवीर्यं' इस निमित्त का कथन है, अतः यह 'उक्तनिमित्ता' है)।
अतः (विशेषोक्ति के इन) दोनों प्रकारों को छोड़कर तीसरे प्रकार की आशङ्का
करते हैं—अनुक्तनिमित्ता में भी—। व्यङ्ग्य की—। 'भट्ट उद्भट' के अनुसार
'यहाँ शीत के कारण कष्ट निमित्त है।' इस अभिप्राय से कहते हैं—न कि उस
व्यङ्ग्य की प्रतीति के कारण कोई चारुत्व की निष्पत्ति होती है—। जो कि रसिक
जनों ने भी (यहाँ) 'निमित्त' की कल्पना की है, कि—'कान्ता के समागम के लिए
गमन करने से भी लघुतर (शीघ्रतर) उपाय स्वप्न को मानते हुए पथिक ने, जिससे
कि नींद लग जाय, इस बुद्धि से, सङ्कोच नहीं छोड़ा।' इस निमित्त को भी अलङ्कारज्ञों ने
चारुत्वहेतु के रूप में नहीं स्वीकार किया है, बल्कि अभिव्यक्त होते हुए निमित्त के द्वारा
उपस्कृत नहीं होता 'नहीं शिथिल करता है' इस प्रकार का विशेषोक्ति-अंश ही चारुत्व
का हेतु है। अन्यथा, यह विशेषोक्ति ही न होगी। इस प्रकार (उद्भट और रसिकों के)
दो अभिप्रायों को ग्रन्थकार ने सामान्य उक्ति ('व्यङ्ग्य की' यह उक्ति) द्वारा निरूपण