धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)
Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary
महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा
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लगावे सिद्धान्त यह हुआ कि, सूर्य सदा पीठ पीछे वा दाहिनी ओर
हो॥५॥
षष्टिधन्वंतरे लक्ष्यं ज्येष्ठं लक्ष्यं प्रकीर्तितम् ।
चत्वारिंशन्मध्यमं च विंशतिश्च कनिष्ठकम् ॥६॥
६० साठ वाण धनुष के लिये रखो, वह श्रेष्ठ निशाना कहता है, ४०
वाणों से मध्यम और २० बीस वाणों से कनिष्ठ लक्ष्य कहाता
है॥६॥
शरोंका यह प्रमाण कह दिया
अब नाराचोंका कहते हैं
चत्वारिंशच्च त्रिंशच्च षोडशैव भवेत्ततः ॥७॥
चालीस, तीन और पीछे सोलह नाराचों का अर्थात् समस्त लोहमय
बाणों को रखने वाला क्रम से उत्तम मध्यम और कनिष्ठ कहाता
है॥७॥
चतुःशतैश्च काण्डानां यो हि लक्ष्यं विसर्जयेत् ।
सूर्योदये चास्तमाने स ज्येष्ठो धन्विनां भवेत् ॥८॥
सूर्य के उदय में और अस्त में चार सौ बाणों का जो लक्ष्य छोड़े वह
धनुषधारियो में बड़ा होता है॥८॥
त्रिशंतैर्मध्यमश्चैव द्विशताभ्यां कनिष्ठकः ।
लक्ष्यं च पुरुषोन्मान कुर्याच्चन्द्रकसंयुतम् ॥९॥
तीन सौ से मध्यम और दो सौ से कनिष्ठ इतना उन्मान मनुष्य का है,
यह निशाना चन्द्रक के संयुत करे अर्थात् चांदमारी से करे॥९॥
ऊर्ध्वभेदी भवेज्ज्येष्ठो नाभिभेदी च मध्यमः ।
पादभेदी तु लक्ष्यस्य स कनिष्ठो मतो भृगो ॥१०॥
हे परशुराम! ऊर्ध्वभेदी तो ज्येष्ठ कहाता है और जो बीच में वेध करे,
वह मध्यम और निशाने का पादवेधी जो हो वह कनिष्ठ कहाता
है॥१०॥
अथाऽनध्यायः
अष्टमी च ह्यमावास्या वर्जनीया चतुर्दशी ।