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धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary

महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा

DevanagariHindipublished76 पृष्ठ

पृष्ठ 27, कुल 76 में से

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पृष्ठ 27

हिन्दीटीकासमेता २१
श्रमेणास्खलिता कृष्टिः शीघ्रसंधानमाप्यते ॥९९॥
श्रम से छोड़ा हुआ निशाना, और बहुत दूर का भेदन और श्रम से
मर्यादा के साथ खिंचा हुआ बाण शीघ्र संधान को प्राप्त होता
है॥९९॥
श्रमेण चित्रयोधित्वं श्रमेण प्राप्यते जयः ।
तस्माद्गुरुसमक्षं हि श्रमः कार्यो विजानता ॥१००॥
श्रम से चित्रयोद्धा होता है और श्रम से ही जय प्राप्त होता है। इससे
जानने वाले को गुरु के सामने ही परिश्रम करना चाहिये॥१००॥
प्रथमं वामहस्तेन यः श्रमं कुरुते नरः ।
तस्य चापक्रियासिद्धिरचिरादेव जायते ॥१॥
पहले बायें हाथ से जो मनुस्य श्रम करे, उसको धनुष की क्रिया सिद्धि
शीघ्र ही हो जाती है॥१॥
वामहस्ते सुसंसिद्धे पश्चाद्दक्षिणमारभेत् ।
उभाभ्यां च श्रमं कुर्यान्नाराचैश्च शरैस्तथा ॥२॥
बाँयाँ हाथ सिद्ध हुए पीछे दाहिने से आरंभ करे, फिर दोनों से नाराच
और बांणों से श्रम करे॥२॥
वामेनैव श्रमं कुर्यात्सुसिद्धे दक्षिणे करे ।
विशाखेनासमेनैव रथी व्याये च कैशिके ॥३॥
जब दाहिना हाथ सिद्ध हो जाय तब बाँये से ही श्रम करे, विशाखगति
और असमपादगति से रथी कैशिक नाम व्याय से॥३॥
उदिते भास्करे लक्ष्यं पश्चिमायां निवेशयेत् ।
अपराह्ने च कर्तव्यं लक्ष्यं पूर्वदिगाश्रितम् ॥४॥
सूर्य के उदय से दोपहर तक पश्चिम दिशा में निशाना करे और अपराह्न
अर्थात् दोपहर ढले पीछे पूर्व दिशा में लक्ष्य साधन करे॥४॥
उत्तरेण सदा कार्यमवश्यमवरोधिकम् ।
संग्रामेण विना कार्यं न लक्ष्यं दक्षिणामुखम् ॥५॥
उत्तर दिशा को सदा अवश्य ही अवरोध से निशाना करना चाहिये,
परंतु संग्राम के विना दक्षिण के सामने मुख करके निशाना कभी न