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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

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पृष्ठ 78

११—जरावग्गो
जेतवन विसाखाकी संगिनी
१४६-कोनु हासो किमानन्दो निच्चं पज्जलिते सति ।
अन्धकारेण ओनद्धा प्रदीपं न गवेस्सथ ॥१॥
(को नु हासः क आनन्दो नित्यं प्रज्वलिते सति ।
अन्धकारेणाऽवनद्धाः प्रदीपं न गवेषयथ ॥१॥)
अनुवाद—जब नित्य ही (आग) जल रही हो, तो क्या हँसी है,
क्या आनन्द है ? अंधकारसे घिरे तुम दीपकको (क्यों)
नहीं ढूंढते हो ?
राजगृह (वेणुवन) सिरिमा
१४७-पस्स चित्तकतं बिम्बं अरुकायं समुस्सितं ।
आतुरं बहुसङ्कप्पं यस्स नत्थि धुवं ठिति ॥२॥
(पश्य चित्रीकृतं बिम्बं अरु-कायं समुच्छ्रितम् ।
आतुरं बहुसंकल्पं यस्य नास्ति ध्रुवं स्थितिः ॥२॥)
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